Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 108
________________ १०२ अनुसन्धान-५७ आ समग्र सन्दर्भे विचारतां अम लागे छे के आगमोनी रचनाकाले अर्हत्नुं वर्णन वास्तविकताने अनुलक्षीने थतुं हतुं, तेओने अन्य मनुष्योतीर्थप्रवर्तको करतां विशिष्ट कोटिना अवश्य जणावाता हता, तेओनी पासे देवोनुं आवागमन पण वर्णवातुं हतुं, पण ओ बधुं ओक हद सुधी सीमित हतुं. पाछळथी जेम बौद्धादि अन्य परम्पराओनी जेम जैन परम्परामां पण तेवा देशकालने अनुलक्षीने अर्हत्नुं चमत्कारिक वर्णन आरंभायुं होय. लौकिक, चमत्कारिक, वातो-वर्णनोथी अंजायेला लोकोने आवर्जवा माटे तेम करवू जरूरी पण हशेज. आ वर्णन माटे अर्हत्नी विविध विलक्षण विभूतिओने ३४ अतिशयोमां स्थान आपवामां आव्यु, अटलुं ज नहीं पण समावायाङ्ग जेवा आगममां आवा ३४ अतिशयो वर्णवाया छे ओम पण जणाववामां आव्यु.१ केटलाक अतिशयोनुं समवायाङ्गमा जे स्वरूप हतुं तेना करतां घणुं जुदुं वर्णन, पण करवामां आव्यु. जेमके- इन्द्रध्वज के सिंहासनना वर्णनमां आवता 'आगासगं' शब्दनो अर्थ तद्दन जुदो हतो, (प्रकाशक) ओने बदले इन्द्रध्वज अने सिंहासन (आकाशगामी) आकाशमां अद्धर रहे छे' अवो अर्थ करवामां आव्यो. मारि, दुर्भिक्ष व.ना निवारणनी मर्यादा २५ योजनथी वधारीने १२५ योजननी करवामां आवी. 'भगवाननी देशना बधा वेरझेर वीसरीने ओकसाथे सांभळे' ओवा अतिशयने स्थाने 'भगवानना स्थानथी १२५ योजन सुधी कोईने वेर-विरोध न रहे' अवो अतिशय प्ररूपायो के जेनी महावीरस्वामीना जीवनमा बनेली केटलीये घटनाओ साथे विसंगति आवे छे. अन्ते, श्वेताम्बर परम्परानी ३४ अतिशयनी प्ररूपणा साथे तुलना माटे दिगम्बर परम्पराने मान्य ३४ अतिशय तिलोयपण्णत्तिने आधारे जोइशुं.. जन्मजात १० अतिशय- १. स्वेदरहितता २. निर्मलशरीर ३. दूध जेवू श्वेत रुधिर ४. वज्रऋषभनाराचसंघयण ५. समचतुरस्रसंस्थान ६. अनुपम रूप ७. नृपचम्पक जेवी उत्तम गन्ध ८. १००८ उत्तमलक्षण ९. अनन्त बल १. "चार अतिशय मूळथी, ओगणीश देवना कीध । कर्म खप्याथी अग्यार, चोत्रीश एम अतिशया समवायांगे प्रसिद्ध ।" आ गाथामां वर्णवाया प्रमाणे समवायाङ्गजीमां अतिशयो न होवा छतां अमने समवायाङ्गनी साखथी ज प्रमाणित कराय छे.

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