Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 77
________________ डिसेम्बर २०११ ७१ हाड रुहिर आमिरुं त्वचा- । रहित देह सुर मुनि कर वचा । दश सहसमाहिं नही आयु । सुर नारक बे सम वरसायु ॥४७|| पंचानुत्तरनइ ग्रीवेकि । वैक्रय सयरनु हि ते छेकि । लाख जोयण वैक्रय परमाण । अवर देव- ए करमाण ॥४८॥ मानव कोस त्रिहुंनु देह । पुंणा करमांहिं नही छेह । त्रिण्णि पल्योपमनुं परमायु । पूरवकोडि तिरि असंन्नी आयु ॥४९।। सत्तिरि कोडि लाख वच्छरिं । छप्पन कोडि सहस ऊपरि । एति एक पूरव निरमाण । इस्यां कोडि आउं परिमाण ॥५०॥ मानव सम संनीआ तिरियंच । जघन्य अंतरमहूरत अखंच । आरइ आयु देह निरमाण । भरहेरव जूजूआं बंधाण ॥५१॥ युगलीआं सुरगति इक होइ । देव-नारकी बि गति जोइ । नर-तिर्यंच थाई एह चवी । मानव पंचइ गति केलवी ॥५२॥ दस संज्ञा सवि हुँ जीवमाहि । नर छ लेश्या धरइ उच्छाहि । सुर तिरि नारक चउ चउ लाख । मानव चऊद लाख योनि भाख ॥५३।। लाख चउरासी सविहुं तणी । जीव योनि सरवालइ भणी । नर-तिरि-गर्भज काय बंधाण । छ संघेण च्छई नर संस्ठाण ॥५४॥ जलचर बार लक्ख कुल कोडि । ऊपरि कोडि पंचासह जोडि । खेचर लाख कोडि कुल बार । दसइ कोडि लख कुल थलचार ॥५५।। कोडि लाख नव भुजपरिसर्प । दाह कोडि लख उरपरिसर्प । बार कोडि लक्ष कुल मानवी । नारक पणवीसइ मानवी ॥५६॥ देव छव्वीस लक्ष कुल कोडि । सर्व थई सरवालु जोडि । पंच सात नव एक अपार । आगलि मीडा दिउ अग्यार ॥५७॥ १९७५०००००००००००. _वस्तु - १ सूक्ष्म बादर सूक्ष्म बादर भेद एकेंद्र ।। विगलेंदीय त्रिण्णइ कहिया । गर्भजात तिरि मणुअ देवा । संमूच्छिम पंचेदीआ पज्जत्ता अपजत्त लेवा ।

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