Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
View full book text
________________
डिसेम्बर २०११
७३
धर्माधर्म अलोकिं नथी । पुदगल जीव गमण नवि कथी । जिम खोडा नर काठी थोभ । तावडि जातां च्छाया क्ष्योभ ॥७१।। पर्वत थांभा भीति पखाणि । पाणी खीला मूल अहिनाणि । थूल पदारथ करिं प्रवेश । तउ सघले आकाश प्रदेश ॥७२।। अलोकमाहि अनंतानंत । च्छइ आकाश न जीव भमंत । परमाणू खंधादिक च्यारि । वर्ण गंध रस फरिस विचारि ॥७३।। विविध वर्ण धरि बापडा । कृष्ण नील सित पीत रातडा । गंध सुगंध दुर्गंधा होइ । खारा खाटा मधुरा सोइ ॥७४॥ कडूआ तीखिण कसायला । सरस विरस लागि केतला । फरिस कठिन कोमल छई जेह । वर्ण स्वाद पालटीइं तेह ॥७५।। एक पुदगल पोला वाटुला । एक त्रिखूण चउखूणा भला ।। एक निघट भारी लघु सही । एक चीता एक लांबा कही ॥७६।। इम पुदगलना भेद अनंत । केवलन्यानी जाणइ अंत । काल भेद कहुं हिव सुणउ । समय मांन सूखिम घणउ ॥७७|| कमल पांन ऊपरि ऊपरी । सबल पुरुष तनुइं करी । वींधइ पांन सवे समकाल । पांन विचिं वहई एतु काल ॥७८॥ असंख्यात समय तिहां कहिय । भविक जीव तीणे सद्दहिया । वली वस्त्र जूनुं फाडीइ । त्रागिं त्रागि सोइ जि मांडीइ ॥७९॥ असंख्यात समयेकावली । बिसि छपन्न संख्यान ही अली ।। सूक्ष्मनिगोद जीव एह आयु । सासोसासि सतर भव जाय ॥८०॥ एक कोडिनइ सतसढि लाख । सहस सत्युत्तिरि बि शत भाख । सोलोत्तर एतली आवली । हुई बि घडी महूरत ते वली ॥८१॥ अवर मांन कहिं सूरीश । पांसठि सहस साढा छत्रीस ।। एतले निगोद क्षुल्लक भवे । बीजु महूरत इणिपरे मवे ॥८२॥ त्रीजुं त्रिण्णि सहस सातमि । ऊपरि त्रिहुतरि सासोससिं । ते महूरत त्रीसे अहोराति । तिणि पनरे पखवाडि जाति ॥८३।। बिहु पाखे मास ते बारि । वच्छर हुइ ते असंख विचारि । एक पल्ल्योपमि जाइ वही । एह विवक्षा आगमि कही ॥८४।।

Page Navigation
1 ... 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135