Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-५७
हिव चउपई । एकसउ वीस शुभाशुभ कर्म । पुण्य प्रकृति बइतालीस शर्म । वर्ण गंध रस फरिस विचारि । शुभ कइ अशुभ गणउ एक ठारि ॥६२।। ब्यासी भेद पातक जे समुं । आश्रव तत्त्व कहुं पांचमुं । जेहना छइ बइतालीस भेद । किंचनमात्र विचार विछेद ॥६३॥ काया कांन आंखि नासिका । भव रलवु सवि रसना थका । ए पांचइ इंद्री मोकलां । प्रेरक च्यारि कसाय ओकलां ॥६४॥ नवइ एह आश्रव मूलगां । पंचाणुव्रत छइ ओलगां । हणइ जीव जंपइ अलीक । चोरी चांब चोरी निरभीक ॥६५॥ अलकसमल कस मेलु करइ । ए पांचइ आश्रव आचरइ । मन वचन काया त्रिण्णि योग । सतर भेद संयम संयोग ॥६६॥ जेह वैरागी रुंधइ सहू । पापी ते प्रवर्त्तावइ बहू । सहजिं लागि क्रिया पंचवीस । कहितां कोइ न धरज्यो रीस ॥६७॥ पहिली जे कायाकी क्रिया । चपलपणिं चालइ विक्रिया । बीजी अधिकरणिं ऊपजइ । खटक शाल पांचे नीपजइ ॥६८॥ त्रीजी कहीइ प्रद्वेषिकी । राग-द्वेष आणइ मन थकी । पारितापनकी चउथी खरी । आपघात परघाति करी ॥६९॥ प्राणातिपातकी मांड अजाण । स्वर्ग वांछता काढिं प्राण । ए पांचइ क्रिया मूलगी । वीस ऊपजिं एहं लगी ॥७०॥ गाडावाही खेत्रारंभ । आरंभकी क्रियानां थंभ । दास दीकोलां ढोर अन्नादि । वहुरइ वेचइ गृही बनीआदि ॥७१॥ जैनधर्म मायां आचरइ । मिथ्या श्रुत सद्दहणा करइ । नही पचखाण अवरती होइ । हड कूकड कलि जोणां जोइ ॥७२।। पृष्टिकी क्रिया सुकुमाल । फरसइ रोम पशू स्त्री बाल । प्रातिकी परघरि जे घटइ । रूडी वस्त देखी आवटइ ॥७३॥ निज सामंतोपात अवास । लोक वखाणिं धरइ उल्हास । अथवा दूध दही घी तेल । पडि जीव ते पातल वेलि ॥७४॥

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