Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-५७
पापि नीचइ कुलि अवतरइ । दुर्गतिमाहिं असातां फिरइ । नरग तिर्यचि दुख भोगवइ । पापोदय एकवीसइ हवइ ॥३८॥ साचा देव अनइ गुरु धर्म । आस्ता नावइ पातक कर्म । कुगुरु कुदेव अनइ कुधर्म । तेह ऊपरि सद्दहणा शर्म ॥३९॥ बावीसमु जे भेद मिथ्यात । थावर दसइ कहुं सुणि वात । पाप बहुल एकेंद्री थाय । तावडथी च्छायां न जवाय ॥४०॥ गमण छांहथी तावडि नही । एक भेद एहु ते सही । सूखिमकर्म निगोदी हुआ । ए बिहू भेद अच्छि जूजूआ ॥४१॥ अनंतकाय मिली एक शरीर । थावर च्यारि भेदि सुणि वीर । कर्म अथिर जीव सघलां अंग । अशुभकर्म पुरुषारथ भंग ॥४२॥ दरशन दीर्छ कहि न सुहाइ । कर्म दुभागी ए कहिवराइ । दुःस्वरकर्म वचन कर्णमूल । अनादेय कहण समतूल ॥४३॥ अयशकर्म यश नु इह निटोल । दशइ भेद थावरना बोल । नरय त्रिक्क होइ नारकी । मरवा वंछइ नारक थकी ॥४४॥ न मराइ पूरइ नरकायु । नरगानुपूरवी ते कहिवराय । अंत समइ ऊरधगति करइ । कर्म ताणीनइ नारकि धरइ ॥४५॥ विचिं भव पूरी तिरिआं तणउ । कर्म बहुल जीव नरकिं घणउ । पातक भेद कहिया पांत्रीस । हिव कसाय सुणिज्यो पंचवीस ॥४६॥
वस्तु - ३ च्यारि चउकुं च्यारि चउकुं भेद इम जाणि । नोकसाय नव अपर छइं क्रोध मान मायातिलोभी । पक्ष चउमासुं वरसनइ जन्म शुद्ध ते रहइं थोभी । संज्वलनु पचखाणनइ अपच्चखाणु अनुबंध । आणंदवर्द्धन इम कहइ सोल कसाय बंध ॥४७॥
हिव - दूहा । अनंतानु नामि सबल । क्रोध मांन माया लोभ । समकित ते पामइ नही । मरणिं नारकि थोभ ॥४८॥

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