Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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डिसेम्बर २०११
पाप तत्त्व हिव ब्यासीं भेद । ते कहितां कोइ म धरु खेद । पहिलूं जोईइ नरनइं न्यांन । ते पांचइ जिणि कीधां यान ||२४|| मतिन्यान मति सुंदर नही । श्रुतन्यान जाइ श्रुत वही । अवधिन्यान पापिं न ऊपजइ । मनपर्य्यव अंतराई भजइ ॥२५॥ अढाई दीपि नर तिरि जेतला । मनोगत भाव जाणई तेतला । न्यान पंचम छइ केवलनाण । चऊद राज आमला प्रमाण ||२६|| भव कोटी भाजिं संदेह । ते जिणि पापिं दीधु छेह ।
छती लाछि अवसर पामीइ । दिवराइ नही जिणि ठा (वा) मीइ ||२७|| उद्यम करतां लाभ न होइ । पोतानी नीमी सवि खोइ ।
घरि खावा छइ संपत्ति घणी । पणि रोगं काया रेवणी ॥२८॥ भोगांतराई विलसइ नही । सकल लाछि जास्यइ ते सही । हिव उपभोग करूं जिणि रुलिउ । दंपति योग सरीसु मिलिउ ॥ २९॥ हुइ नपुंसक कइ रूसणुं । जोड विहंडइ लाजइ घणुं ।
नव ए दशमुं वीर्यांतराय । समरथ रोगिं बल नवि थाय ||३०|| पापकर्मि अंतराई दसइ । अदाप देखइ हाथ जि घसइ ।
नव आवरण बीजां छई जिस्यां । कहुं छतां दीपिं नही तिस्यां ॥३१॥ चक्षुदर्शन नयण निलाडि । उरम छायादिक आविं आडि । अचक्षुदर्शन अभिप्राय । अपर इंद्रय बल हीणां जाय ||३२|| एक भेद हिव बीजउ कहइ । विशेष वस्तु न्यानिं निरवइ । ए चिहुंनइं पातक आवरण । निद्रा पंच कहितां दिउ कर्ण ||३३|| निद्रा ते संचलि जागीइ । सुखिं समाधिं वतइ लागीइ । निद्रानिद्रा बीजी सुणउ । जागइ जुधं धूणइ घणउ ॥ ३४ ॥ प्रचुला नामि हिव सांभलउ । बइठां ऊभां नर घांघलउ । प्रचुला प्रचुला नामि नरींद्र । हीडइ हालइ नयणे नीद्र ||३५|| पंचम निद्रा छइ थीणधी । तेहना गुण न कहिं खीणधी । दृढ संघेण धणीनई तेह । वासुदेव बल आधुं जेह ||३६|| गजेंद्र विणास निद्रा समइ । नारि नरगि छ नर सातमइ । बांधइ कर्म हुइ नारकी । पापकर्म ओगणीसइ बकीं ॥३७॥
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