Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 18
________________ अनुसन्धान-५७ क आस्ते सप्तम्यास्तदिवदवचः (?) कोऽम्बुनि चितो धनु:कोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥१॥ स्फुरन्नागेशेन स्वकवपुषि वक्रत्वसहिते धृते श्यामे पार्वे कमठरचितापायसमये । फणोच्चैराटोपे निबिड उपरिश्राविणि घने धनुःकोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥२॥ पुरस्यान्ते दृष्ट्वा वनमभिनवं नीलरुचियुक् परिक्षेपे तस्योन्नततरगिरिं वीक्ष्य च दृशा । सरद्वार्यापूर्णं तदुपरि पुनः कुण्डममलं धनुःकोटौ भृगस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥३॥ लसत्क्रीडाकाले करनखशिखाग्रे भ्रमरके मुहुर्गुञ्जत्यास्ये भ्रमदतिगृहीतेऽत्र शिशुना तदीयोच्चैः भृङ्गे शितिसजलचञ्च्वीक्षणवशाद् धनुःकोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥४॥ ललाटे लोलाक्ष्याः शशकरदलौपम्यकलिते तदूर्ध्वस्थानस्थभ्रमरविधृते पूर्णकलशे । तदन्तःस्थायिन्यप्यमृतनिवहे दृष्टिपतिते धनु:कोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥५॥ शिशोः कस्यापि भूपरिगतमषीकृष्णतिलकैः कृते मात्रा रूपाधिकगुणरमारक्षणकृते । दृशा दृष्टे श्रोत्रोपरि खचितरत्नाभरणके धनु:कोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥६॥ सुपर्वाद्रेः शृङ्गे जननमहिमायां शितिरुचेरमुष्य श्रीनेमीश्वरजिनपतेरत्र विबुधैः । सदुष्णीषस्याग्रे कुसुमनिकरे चापि निभृते धनुःकोटौ भृङ्गस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलधिः ॥७॥

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