Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 73
________________ डिसेम्बर २०११ आणंदवर्धन-रचित नवतत्त्व-चउपई ६७ साध्वी दीप्तिप्रज्ञाश्री पत्र - ७, शेठ डोसाभाई अभेचंद जैनसंघ भावनगरना संग्रहनी हस्तप्रतिनी झेरोक्स उपरथी आ सम्पादन कर्तुं छे. तेना कर्ता खरतरगच्छना श्री धनवर्द्धनसूरिना शिष्य श्री आणंदवर्द्धनसूरि छे. (गाथा २८४-२८५) रचना संवत १६०७ छे, लेखन संवत - १६०८ महा सुद- १ - मंगळवार छे. लेखक - देवगुप्तसूरि छे. आ नवतत्त्व चउपईनी रचना पछी १ वर्षमां ज आ प्रति लखायेली छे. आ चउपईनी कुल गाथा - २८९ छे. जेमां गाथा १ थी ५८मां जीवतत्त्व । ५९ थी ९९मां अजीवतत्त्व । १००थी १२३मां पुण्यतत्त्व । १२४ थी ९६१मां पापतत्त्व । १६२ थी १८४मां आश्रवतत्त्व । १८५ थी २१७मां संवरतत्त्व । २१८ थी २३०मां निर्जरातत्त्व । २३१ थी २४५मां बंधतत्त्व । २४६ थी २८०मां मोक्षतत्त्वनुं निरूपण छे । गाथा २८१ थी २८३मां नवतत्त्वने जाणवाथी थतो लाभ वगेरे दर्शाव्या छे । अन्ते गुरुपरम्परा अने लाभ बतावेल छे । श्री अरि[हं]तनां पह( द ) युगल । प्रणमीय परमाणंदि । नवइतत्त्व विवरण कहुं । जे भाख्यां वीरजिणंदि ॥१॥ नवनिधांन चक्रवर्त्तिनां । जिम धन पार न होइ । तिम नवतत्त्व विचारनु । कहीय न पामइ कोइ ॥२॥ नव नंदे नव डुंगरी । कनकतणी जलनिधि । तिम नवतत्त्व विचारणा । राखुं हीयडा मधि ॥३॥ ग्रीवां नव ग्रीवेकि छ । लोकनालि ब्रह्मंडि । मुखमंडण कंठं धरिं । तत्त्व नवइ निज पिंड ॥४॥ नव वार्ड रख्या करिं । ब्रह्मचारि नीय ब्रह्म । तिम नवतत्त्वे राखज्यो । विनय मूल जिनधर्म ॥५॥

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