Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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डिसेम्बर २०११
हवें सात तत्त्व निर्ज्जरा बारे भेदे तप शिवसुखकरा । बाहिरि अभ्यंतर तप तपिं तप तपतां सघलां कर्म खपइ ॥ १॥ बाह्य तपना षट भेद थाय पहिलो अणसण कहे जिनराय । उपवासादि छमासी करई तेथी कर्म कोडि निर्जर ||२|| बीजो ऊंणोदरी तप सार नरनें कवल बत्रीस आहार । स्त्रीनइं कवल कह्या अठावीस नपुंसकनई उत्कृष्ट पणवीस ॥३॥ जो वृतिसंक्षेप साधु धरई दत्त द्रव्यनी संख्या करें । चऊद नेम श्रावकने जेह संभारि संखेपि तेह ||४|| H चोथो रसत्याग तप जांणि षटरस विगय संख्या मनिं आणि । लोचादिक कायक्लेस पांचमो संलीनता तप छडो (ठो) खमो ॥५॥ ते बीहुं भेद बाहिर अंगोपांग संवरइ कषाय च्यार अंतरंग । षट्विध तप अभ्यांतर शुद्धि धुरि तप आलोअण ल्यइं बुद्धि ||६|| बीजौ विनय तप वडां गुणवंत जांणी वाद पूजें संच । अभ्यंतर तप त्रीजो भणो वेयावच्च दशविधि ते सुणो ||७|| आचार्य उवज्झाय ने ग्नाननई तपसी ज्ञानीनई Mबालनई । धइं आणी ओषध अन्नपांन वेयावचनु नो हई यान ॥८॥ चोथो तप ते पंचविधि सज्झाय अभ्यंतर ए मुगति उपाय । भणें गणें अर्थनी पृछना धर्मकथा पांचमी चिंता ॥९॥ पांचमो तप ते धर्म शुक्लध्यांन आर्त्तरौद्रनुं नही अभिधांन छठो काउसग तिप यथाशक्ति निर्दोष करतां पांमिं मुक्ति ॥१०॥ इम तप बारेइ भेदे करे कर्म कठिन सघलां निर्जरई । देवचंद कवि कहिए सार सातमुं निर्जरा बार प्रकार ॥११॥ "इति निर्जरातत्त्व संपूर्ण ॥७॥
आठमुं बंधन तत्त्व गंभीर सूक्षम छे पणि तेहनुं हीर । कहस्युं करवा परउपगार बंधतत्त्वना च्यार प्रकार ॥१॥ एणिपरि जीव मिल्यों कर्मबंध जिम एकठां फुल नि गंध । तिलनई तेल जिम छई एकठां दुध पांणी जिम मल्यां सामठां ॥२॥ इणिपरि जीव मिश्रबंधे कर्म लोक दैव कहिं ते कर्म ।
कर्म भेट्यो सुखदुख सहे वईरभावि बे एकठां रहइ ||३||
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