Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 55
________________ डिसेम्बर २०११ सुरपरि पूरी करइं पजत्त एकत्रीसमानी एहज २°वत्त बत्रीसमई काया जीव एक वनसपती ते नाम प्रत्येक ॥१२॥ जे दृढ दांत दाढांदिक हाड ते थिरकर्म तेत्रीसमुं जाड नाभि उपरि सुभ काया२१ अंग चोत्रीसमई शुभ नामनो रंग ॥१३॥ सकल लोक मोहई २२एकलो शुभगकर्म पांत्रीसमई भलो सुस्वर नामकर्म छत्रीसमई मीठी वांणि सुरनर मन गमई ॥१४॥ बोल्युं वचन मानइं सहु कोय आदेअकर्म सात्रीसमुं सोय पूठि जसकीरति बोलाय अडत्रीसमइं जस नांम पसाय ॥१५॥ पूरुं सुर-नर-तिरि आउखुं ए त्रिहुं स्युं एकतालीस लखें। अदभूत बेंइतालींसमुं पूण्य तीर्थंकर पद आपइं धन्य ॥१६।। इणि परि पुण्य प्रकृति परमाण बइतालीस कही जिनभाण श्रीभानुचंदवाचक गुरुतणो सीस देवचंद कई भवि सुणो ॥१७॥२३ चोथं पापतत्व हवई सुणो ब्यासी भेद तेहना पणि २४गणो पुण्यइं ज्ञानवंत नर थाय ते पांचइं पणि पापइं जाय ॥१॥ ज्ञानांतराय ते कहीइं सही मति आवरण मति चोखी नहीं अक्षर मात्र मुखई नवि चढइं श्रुतनाणावरणइं नवि पढइं ॥२॥ अवधिनाण वार्यु आवतुं अवधिज्ञानावरण ते छतुं चोथु मणपज्जव न उपजइं मणनाणावरण ते भजइं ॥३॥ सर्व जीवनुं लहइं स्वरूप लोकालोक प्रकाशक रूप भवकोटी भाजई आमलो ते केवल कहीइं निर्मलो ॥४॥ एहवं नावइं पंचमनाण ते केवलावरण- प्राण छतुं वित्त पात्रे२५ नवि दीइं ते दानांतर फल लीइं ॥५॥ लाभ वांछतां साहमुं जाय ते लाभांतराय पसाय घरि खावा-पीवा छई घणुं भोगांतराय ते अलखामणुं ॥६॥ कर्म योगिं मल्यां दंपती नीरस कंइ नवि २६बाझइं रती सुखनी वात रही वेगली अहनिसि करतां दीसई कली ॥७॥ ए तो अंतरायनो योग पाम्या २७चूकई जे उपभोग यौवनवय नीरोगी काय पणि निर्बल ते वीर्यांतराय ॥८॥

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