Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 47
________________ डिसेम्बर २०११ ४१ अहनिस सेवामें रहें, पण कोइनें न बोलावे रे ॥८॥ सांभलजो० अचरिज ओक तिणे कीयो, तेह सकरमी कहावें रे। तेहनां ध्यान थकी घणां सीवपद पदवी पावे रे ॥९॥ सांभलजो० नग्न नहीं नभ छे वस्त्र, नहीं वस्त्र धरतो रे निज शत्रुने जीपवा, जोगमुद्रा अनुसरतो रे ॥१०॥ सांभलजो० अहवा नरने वांदतां, मिथ्या मोहथी विघटें रे अमृत पद लहें रंगथी, निज आतम गुण प्रगटे रे ॥११॥ सांभलजो० इतिश्री हरियाली गर्भित स्तवन संपूर्ण शुभं भवतू । ललितसागरकृत (४) लोभनी सज्झाय लोभ न करीइं प्राणीया, लोभ बुरो रे संसार. लोभ सरीखो को नही, दुरगतीनो दातार रे ॥१॥ भविकजन लोभ तणो परिहार, तुमें करज्यो निरधार. अतिलोभ लक्ष्मीपती, सागर नामें सेव. पूर पयोनिधिमां पड्यो, जई बेठो तस हेठ. भ० ॥२॥ सोवनमृगना लोभथी, दसरथसुत श्री राम. सिता नारि गमाविने,भमिआ ठांमोठांम. भ० ॥३॥ दसमा गुंणठांणा लगे, लोभ तणो छे चोर, सीवपूर जाते जीवनें, ओहि ज मोटो चोर. भ० ॥४॥ नव विधि परिग्रह लोभथी, बहु दुख पांमें जीव, परवस पडिया बापडा, पाडे अहो निसरीव. भ० ॥५॥ परिग्रहना परिहारथी, लहीइं सुख सरिकार, देव दानव नरपति थई, जइव्यै मुगति मोझार. भ० ॥६।। भावसागर पंडित तणो, ललितसागर बुध सीस, लोभ तणें त्यागे करी, पूगे सयल जगीस. ॥भ० ॥७॥ इति लोभ सज्झाय.

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