Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 13
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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यः स्वभावज यः स्वभावज - भक्तिभावेन भवतो जिनराज ! नतिमभितनोति ननुकृतसमीहित ! हितशासन ! सनरेन्द्रसुरकिंनरेन्द्रखेचरेन्द्रसेवित ! ॥ वितमाः स भवति भवतिरस्कारविशारद ! धीर ! । धीरमणीयवचःप्रचय ! सकलजगत्त्रयवीर !
इति चतुर्विंशतिजिननमस्काराः समाप्ताः ॥
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पाठान्तर :
१. सरससभा० ॥ २. शम० ॥ ३. शम्भव० 1 ४. ० वन्दारु ॥ ५. पांथपति० ॥ ६. भवमावमार्गगत० ॥ ७ मा ॥ ८. रत्नोज्ज्वलमुकुटफण-विकटरोचिरोचितदिगन्तर || ९. ० कुलवचनसंनिभ ॥ १०. चन्द्रप्रभजिन साति० ॥ ११. ० शासिन० ॥
१२.
२१.
० जननिश्रेय० ॥ १३. ०धव धर धीर० ।। १४. ० पवित्रतनु० ॥ १५. प्रवर० ।। १६.१७. ० राजत ॥ १८. हरभासुर ।। १९. ०पदपदविलास ॥ २०. ० क्लम ॥ जिन० ॥ २२. जन्म० ।। २३. ०घन ॥ २४. सुमुनि ॥ २५.२६. तानवागत ॥ जननो० ॥ २८. रसवससमधि० ।। २९. नतकृत० ॥ ३०. सुनरसुर० ॥
२७.
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