Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 13
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 46
________________ 41 विवाह ओछव कीधो रे मोटे मंडाणे जश लीधो रे निरागपणे वितराग रे भोगवता पुन्य भाग रे ॥९॥ पद्मावति सुत जायो रे मघवा नाम गवायो रे सुतनी सुता पुण्यवंति रे रोहिणी अशोक विलसंति रे ॥१०॥ जन्मथी वरस अढार लक्ष रे कर्म फल जांणि नांणे प्रत्यक्ष रे जया-वसुपूज्य समझावी रे संयम दिलमांहे लावि रे ॥११॥ ढाल ॥ [९] ( वीर वखांणि रांणि चेलणाजी - ए देशी ॥) पंचम स्वर्गथी आवीयाजी देव लोकांतिक जेह वीनती करे वासुपूज्यनें जी संयम लहो गुंण गेह ॥१॥ वसुपूज्यनंदन वंदिइंजी ॥ दांन संवच्छर देइनेंजी । खटसय नरवर साथ अमावासिं फागुणनीं भलीजी दीक्षा लीइं जगनाथ ॥२॥ व० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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