Book Title: Anekant 1941 09
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जै (६). अनेका एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुतवमितरेण । अन्तेन जयति जैनी नीतिर्मन्धाननेत्रमिव गोपी ॥ उभयानुभव दृष्टि नयापेक्षा वर्ष ४ किरण ८ नात्मिका निषेधाऽनुभय-दृष्टि उभयानुभय तत्त्व निषेध्यानुमय स्यात तत्व * विध्यनुभयदृष्टि विधेयानुभय तत्त्व भंगरुपा Piter Registered No. -731 स्यात् अनुभय-दृष्टि (सहार्पिता) विधि-दृष्टि elhet अनेकान्तात्मक स्पात् वस्तुतत्त्व गुणमुख्य कल्पा यात् अनुभय तत्त्व विधेय तत्त्व 181 निषेध्य तत्त्व (उभय तत्त्व "निषेध-दृष्टि उभय-दृष्टि (कमा न सम्यग्वस्तु-ग्राहिका, सापेक्षवादिनी ति विधेयं वार्य चानुभयमुभयं मिश्रमपि तद्विशेषः प्रत्येकं नियमविषयैश्वाऽपरिमितैः । सदाऽन्योऽन्यापेक्षैः सकलभुवनज्येष्ठगुरुणा त्वया गीतं तत्त्वं बहुनय-विवक्षेतस्वशात् ॥ सम्पादक- जुगल किशोर मुख्तार यथातत Kohler papilar Skukia • सितम्ब १९४१ Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषय-सूची १-अर्हन्महानद-तीर्थ-[परमानन्द जैन शास्त्री पृष्ट ४२५ ८-जिनदर्शनस्तोत्र (कविता)-[पं० हीरालाल पांडे ४४८ २-प्रतिमालेख-संग्रह,उसका महत्व [मुनि श्रीकांतिसागर ४२७ -तपोभूमि (कहानी)-[श्री 'भगवत' जैन ४४६ ३-विश्वसंस्कृतिमें जैनधर्मका स्थान [डाकालीदासनाग,४३१ ११-महाकवि पुष्पदन्स-[श्री पं. नाथूराम प्रेमी ४५५ ४-वालियरके किलेकीजैनमूर्तियां- [श्रीकृष्णानंद गुप्त ४३४ १६-रानी (कहानी)-[श्री 'भगवत्' जैन ४६२ ५-अमोघाशा(कविता)-[पं०काशीराम शर्मा 'प्रफुल्लित'४३६१२-नेमिनिर्वाण-काव्य-परिचय-[पं० पन्नालाल जैन ४६६ ६ सयु०उत्तरलेखकी निःसारता[पं० रामप्रसाद शास्त्री ४३७ १३-उ०पासुन्दर और उनके ग्रंथ [श्री अगरचंद नाहटा ४७० ७-संशोधन ४४७ १४-जैनमंदिर सेठकचा देहली हलिखितग्रंथोंकी सूची४७२ वीरसेवामन्दिरके सच्चे सहायक ५... श्रीमान् माननीय बाब छोटेलालजी जैन रईस कलकत्ता मेरी तुच्छ सेवायोंके प्रति बड़े ही श्रादर-सत्कारके भावको लिये हुए हैं, यह बात 'अनेकान्त' के उन पाठकोंसे छिपी नहीं है जिन्होंने अापके विशुद्ध हृदयोद्गारोंको लिये हुए वह पत्र पढ़ा है जो द्वितीय वर्षकी १२ वी किरणके टाइटिल पेज पर मुद्रित हुआ है। यही कारण है कि श्राप मेरी अन्तिम कृतिरूप इस वीरसेवामन्दिरको बड़े प्रेमकी दृष्टिसे देखते हैं, उसके साथ पूर्ण सहानुभूति रखते हैं और उसकी सहायता करने-करानेका कोई भी अवसर व्यर्थ नहीं जाने देते। इस संस्थाको स्थापित करनेके कोई एक साल बाद जब मैं कलकत्ता गया तो अापने साहू शान्तिप्रसादजी जैन रईस नजीबाबादसे मुझे तीन हजार ३०००) रु० की सहायताका - वचन 'जैनलक्षणावली श्रादिकी तय्यारीके लिये दिलाया और मेरे बिना कुछ कहे ही चलते समय चुपकेसे ३०० रु. औषधालय तथा फर्नीचरके लिये भेंट किये । आप वीरसेवामन्दिरको एक बहुतबड़ी चिरस्मरणीय सहायता करना चाहते थे, परंतु दैवयोगसे वह सुयोग हाथसे निकल गया, जिसका अापको बहुत खेद हुअा । बादको अापने ५०० रु. अपने भतीजे चि० चिरंजीलालके आरोग्यलाभकी खुशीमें भेजे, १००) अपने मित्र बाबू रतनलालजी झाँझरीसे लेकर भेजे, २००) रु. अपने छोटे भाई बाबू नन्दलालसे और २०० रु. अपनी पूज्य माताजीसे दिलाये। अपनी धर्मपत्नीके स्वर्गारोहणसे पूर्व किये गये दानमें से पाँच हज़ार ५०००) रु. की बड़ी रकम इस संस्थाके लिये निकाली। 'अनेकान्त' पत्रके लिये । स्वयं १२५) रु. मेजे. १०० रु० सेठ बैजनाथजी सरावगीसे दिलाये, और कलकत्तेके कितने ही सजनोंको स्वयं पत्र लिखकर तथा साथमें नमूनेकी कापियाँ भेजकर उन्हें अनेकान्तका ग्राहक बनाया। इसके सिवाय, गत मार्च मासमें आपके ज्येष्ठभ्राता बाबू फूलचन्दजीका स्वर्गवास हो गया था, उस अवसर पर सात दलार रुपयेका जो दान निकाला गया था • उसका स्वयं बटवारा करते हुए दालमें आपने एकहजार १०००रु. वीरसेवामन्दिरको प्रदान किये हैं। ऐसे सच्चे सहायक एवं उपकारीका अाभार किन शब्दोंमें प्रकट किया जाय, यह मुझे कुछ भी समझ नहीं पड़ता ! मेरा हृदय ही सर्वतोभावसे उसका ठीक अनुभव करता हुआ आपके प्रति झुका हुअा है-शब्द उसके लिये पर्याप्त नहीं हैं, खास कर ऐसी हालतमें जब कि अाभारके प्रकटीकरणसे आपको खुशी नहीं होती और अपने नाम तकसे श्राप दूर रहना चाहते हैं। मैंने भाई फूलचंदजीका चित्र प्रकाशनार्थ भेजनेको लिखा था, इसके उत्तर में श्राप लिखते हैं-"मुख्तार साहब, आप जानते हैं हम ' लोग नामसे सदा दूर रहते हैं। चित्र तो उनका छपना चाहिये जो दान करें। हम लोग तो मात्र परिग्रहका प्रायश्चित्त(अधूरा ही)-करते हैं। फिर भी ज़रा २ सी सहायता देकर इतना बड़ा नाम करना पाप नहीं तो दम्भ अवश्य है। अस्तु, क्षमा करें।" कितने ऊँचे, उदार एवं विशाल हृदयसे निकले हुए ये वाक्य हैं, इसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं। सचमुच बाबू छोटेलालजी जैनसमाजकी एक बहुत बड़ी विभूति हैं। मेरी तो शुद्धान्त:करणसे यही भावना है कि श्राप यथेष्ट स्वास्थ्यलाभके साथ चिरकाल तक जीवित रहें, और अपने जीवनकाल में ही वीरसेवामन्दिरको खूब फलता-फूलता तथा अपने सेवा-मिशनमें भले प्रकार सफल होता हश्रा देखकर पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त करें। - Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * ॐ अहम् * स्तितत्त्व-सचातक विश्वतत्त्व-प्रकाशक VITA नीतिविरोधध्वंसीलोकव्यवहारवर्तक सम्प। PROSS परमागमस्य बीज भुवनैकगुरुर्जयत्यनेकान्तःRD VO - । वर्षे ४ किरण ८ वीरसंवामन्दिर (समन्तभद्राश्रम) सरसावा जिला सहारनपुर श्राश्विन, वीर निर्वाण सं० २४६७, विक्रम सं० १९६८ सितम्बर १९४१ अर्हन्महानद-तीर्थ अर्हन्महानदस्य त्रिभुवनभव्यजन-तीर्थयात्रिक-दुरितं । प्रक्षालनककारणमतिलौकिक-कुहकतीर्थमुत्तमतीर्थम् ॥१॥ लोकालोकसुतस्व-प्रत्यववोधनसमर्थ-दिव्यज्ञानप्रत्यहवहस्प्रवाहं व्रतशीलामलविशाल-कूल-द्वितयम् ॥२॥ शुक्लध्यानस्तिमितस्थितराजद्राजहंसराजितमसकृत्स्वाध्यायमंद्रघोषं नानागुणसमितिगुप्तिसिकतासुभगम् ॥ ३ ॥ क्षान्स्यावर्तसहस्रं सर्वदयाविकचकुसुमविलसल्लतिकम् । दुःसह-परीषहाख्य-द्रुततररंगत्तरंगभंगुरनिकरम् ॥ ४ ॥ व्यपगतकषाय-फेनं रागद्वेषादि-दोषशवल-रहितं । अत्यस्तमोह-कद्देममतिदूरनिरस्तमरण-मकरप्रकरम् ॥५॥ ऋषिवृषभस्तुतिमंद्रोद्रेकित-निर्घोष-विविध-विहग-ध्वानम् । विविध-तपोनिधि-पुलिनं सास्रव-संवरण-निर्जरा-निःस्रवणम् ॥ ६॥ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वर्षे ४ गणधर-चक्रधरेन्द्रप्रभृतिमहाभव्यपुंडरीकैः पुरुषः । बहुभिः स्नातं भक्त्या कलिकलुषमलापकर्षणार्थममेयम् ॥ ७॥ अवतीर्णवतः स्नातुं ममापि दुस्तर समस्तदुरितं दूरम् । ...---- व्यवहरतु परमपावनमनन्यजय्यस्वभावभावगम्भीरम् ॥८॥ -चैत्यभक्तिः 'अरईतरूपी महानदका तीर्थ (द्वादशांग श्रुतानुसारी शुद्ध जैनधर्म) तीन लोकके भव्यजीवरूपी यात्रियोंके दुरितों को प्रक्षालन करनेका-पाप मलोंको धोनेका-अद्वितीय कारण है। अर्थात् सांसारिक महानद तीर्थ जब कतिपय जीवोंके शारीरिक बाह्यमलका ही धोने में समर्थ होता है-अन्तरंग पापमलको धोना उसकी शक्तिसे बाहर है-तब अरहंतरूपी महानदतीर्थ त्रिलोकवर्ती समस्त भव्यजीवोंके द्रव्य-भावरूप समस्त पापमलोंको धो डालनेमें समर्थ है-इसके प्रभावसे श्रात्मा रागदुषादि विभावमलसे रहित होकर अपने शुद्धचैतन्य-स्वरूपमें स्थिर होजाता है । यह महानद लोकमें प्रसिद्ध हुए दम्भादिप्रधान कुतीर्थीको अतिक्रान्तकर चुका है-उनके स्वरूपका उल्लंघन करनेसे दंभादि रहित है-श्रतएव उत्तमतीर्थ है।॥१॥ जिस तीर्थ में लोक और अलोकके यथार्थ स्वरूपको जानने में समर्थ दिव्यज्ञानका-केवलज्ञानका-प्रतिदिन प्रवाह वह रहा है, और निर्दोष व्रत तथा शील ही जिसके दोनों निर्मल विशाल तट हैं-किनारे हैं ॥२॥ जो तीर्थ शुक्लध्यानरूप निश्चल शोभायमान राजहंसोंसे विराजित है-शुक्लध्यानी मुनि पुगवरूप राजहंसोंकी स्थिर स्थितिसे जिसकी शोभा बढ़ी हुई है, जहाँपर स्वाध्यायका निरन्तर ही मनोज्ञ नाद (शब्द) रहता है तथा जो नाना प्रकारके गुणों, समितियों और गुप्तियों रूप सिकताओं (बालू रेतों) से मनोग्य है--सुन्दर है ॥३॥ जिस तीर्थ में क्षमा-सहिष्णुतारूपी सहस्रों श्रावर्त उठ रहे हैं, जो सर्व प्राणियोंकी दयारूप विकसित पुष्पलताओंसे सुशोभित है और जहाँ दुस्सह क्षुधादि परीषह रूपी शीघ्र फैलती हुई तरंगोंका समूह विनश्वररूपमें-उत्पन्न हो होकर नाश होता हुआ देखा जाता है ॥४॥ ___ जो तीर्थ कषायरूपी फेनसे-झागसे रहित है, राग-द्वेषादि दोषरूपी शैवाल जिसमें नहीं है, मोहरूपी कर्दम (कीचड़) से जो शून्य और मरणोरूपी मकरोके समूहसे भी विहीन है ॥५॥ जिस तीर्थ में ऋषि पुगवों-गणधरदेवादिकोंके द्वारा की गई स्तुतियों एवं शास्त्रपाठकी मधुर ध्वनिरूपी अनेक पक्षियोंका सुन्दर कलरव है, विविध प्रकारके तपोके निधानस्वरूप मुनीश्वर ही जहाँ पर पुल हैं-संसाररूपी सरित्यवाहमें वहने वाले जीवोंके लिये उत्तरण स्थान हैं और जहाँ कर्मास्रवके निरोधरूप संवरसहित उपार्जित एवं संचित कर्मोंके लिये निर्जरा रूप निर्गमस्थान हैं ॥६॥ इस प्रकारके जिस महान् तीर्थमें गणधर-चक्रवर्ती श्रादि बहुतसे महान् भव्योत्तम पुरुषोंने कलिकालजन्य मल को दूर करनेके लिये भक्तिपूर्वक स्नान किया है ॥७॥ उस परम पावन अर्हन्महानद तीर्थ में, जोकि परवादियोंके द्वारा सर्वथा अजेयस्वभावरूप जीवादि पदार्थोसे गम्भीर है-अगाध है--,मैं भी स्नान करनेके लिये--अपना कर्ममल धोनेके लिये-अवतीर्ण हुअा हूँ--उसमें अवगाइनका मैंने दृढ़ संकल्प किया है। अत: मेरा भी वह सम्पूर्ण दुस्तर कर्ममल पूर्णतया दूर होवें--इस तरह के निर्मूल नाशको प्राप्त होवे कि जिससे फिर कभी उसका संग मुझे प्राप्त न होसके ॥८॥' -परमानन्द जैन शास्त्री Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रतिमा-लेख-संग्रह और उसका महत्त्व [ लेखक-मुनि श्री कान्तिसागर जी ] भारतवर्ष सहस्रों वर्षों के अगणित ऐतिहा- गुणोंका कीर्तन करते हैं; क्योंकि स्थायी रहनेवालो 'सिक खण्डरोंकी भूमि है । इन खण्डरोंको गुणोंकी कीर्ति स्वर्गवास देनेवाली होती है। सूक्ष्मदृष्टि से यदि यत्नके साथ खनन किया जाय तो एक अंग्रेज विद्वान् इतिहासके विषयमें इस निःसन्देह भारतीय इतिहासके असंख्य साधन प्राप्त प्रकार कहते हैं :-"History is the first हो सकते हैं। भारत का इतिहास हमारे पास परी तौर thing that should be given to childसे मौजूद है ऐसा हम नहीं कह सकते, लेकिन हमारे ren in order to form their hearts and under-standing". पास इतिहासकी सामग्री ही नहीं है यह कहनेका भी -Rolis. हम कदापि साहस नहीं कर सकते । क्योंकि भारतमें यह भी एक सर्वमान्य नियम है कि अतीतके बहुतसं नगर व प्राचीन स्थान ऐसे हैं, जहाँ कुछ न प्रकाश विना वर्तमान काल कदापि प्रकाशित नहीं कुछ ऐतिहासिक साधन अवश्य मिलते हैं । उनको हो सकता । इतिहासमें वह शक्ति है कि बलहीन शृंखलाबद्ध कर निष्पक्षपाती विद्वान ही इतिहासके मनुष्यमें भी बलका संचार सहूलियतसं कर सकता लिखने में पूर्णरूपसे सफल हो सकता है । हर्षका है। इतिहास जैसे महान शास्त्रपर विशेष लिखना विषय है कि अभी कलकत्तेमें भारतका इतिहास लिखा र - सूर्यको दीपक दिखाना है । जारहा है, जिसके मुख्य लेखक यदुनाथ सरकार हैं। भारतीय इतिहासमें जैन इतिहासका स्थान यह सम्पूर्ण इतिहास प्रकाशित होनेपर वेदवचन-तुल्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। विना जैन इतिहासके भारमाना जायगा । अतः प्रत्येक जैनीका यह परम कर्त- तीय इतिहास अपूर्ण है। कोई भी इतिहास-लेखक व्य होना चाहिए कि वह भी उक्त महान कार्यमें चाहे वह भारतीय हो या अभारतीय, उसे जैन इतियथाशक्ति तन, मन और धनसे संहायता करे। हास पर अवश्य दृष्टि डालनी पड़ेगी, क्योंकि जैनियों ___ मानव-जीवनमें इतिहासका स्थान अत्यंत महत्त्व- का इतिहास मात्र धार्मिक दिशा तक ही सीमित नहीं पूर्ण है । इतिहासमें जो गूढ़ शक्तिएँ छिपी हुई हैं वे है, प्रत्युत सामाजिक एवं राजनैतिक आदि अनेक अकथनीय हैं । पड़िहार राजा बाउकके वि० सं० दृष्टियोंसे महत्त्व पूर्ण है। ८९४ के शिलालेखका मंगलाचरण भी इतिहासके इतिहासके अनेक साधनोंमेंसे प्रतिमा - लेख भी गौरवको इस प्रकार बतलाता है : एक प्रधान साधन है । भारतवर्षमें प्रतिमा-लेख जितने गुणाः पूर्वपुरुषाणां, कीर्त्यन्ते तेन पण्डितैः। जैन समाजमें से प्राप्त होते हैं उतने शायद ही किसी गुणाः कीर्तिन नश्यन्ति, स्वर्गवासकरी यतः।। २॥ अन्य समाजमें उपलब्ध होते हों। पुरातन कालसे अर्थात-पण्डित लोग इसीलिये अपने पूर्वजोंके धातु-प्रतिमा बनानेकी प्रणाली भारतीय जैन समाजमें Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२८ अनेकान्त [वर्ष ४ बहुत प्रचलित है। इसमें भी मुग़ल समयकी बनी उतना ताकालाकि ग्रन्थों पर नहीं । आज हुई धातु प्रतिमाएँ प्रचुर मात्रामें यत्रतत्रोपलब्ध होती हम देखते हैं कि एक एक शब्दको पढ़नेके लिये हैं। इसका प्रधान कारण यही होना चाहिए कि वे पुरातत्त्वविभागोंके द्वारा हजारों रुपयोंका व्यय किया लोग मुसलमान मसजिदको छोड़कर सभी मजहबके जाता है। जैन मंदिरों में धातुकी प्रतिमाओंकी बहुमंदिरों व पुरातनावशेषों को नष्ट करनेमें ही अपनी लता रहती है, प्रायः प्रत्येक प्रतिमाके पीछेके भागमें महान् वीरता समझते थे । (अजन्टाकी गुहाओंमें फी लेख उत्कीर्ण होता है, उसमें प्रतिमा बनानेवालेका बहुत सी प्राचीन और कलापूर्ण बौद्ध मूर्तियोंके नाक, नाम तथा प्रतिष्ठा करवानेव लेका नाम, प्राचार्य व हस्त आदि अवयव मुग़लोंने नष्ट-भ्रष्ट कर दिये हैं ) भट्टारकका नाम, और भी अनेक ऐतिहासिक बातें इसवास्ते जैनी लोग प्रायः धातुकी मूर्तियाँ बनाकर खुदी हुई रहती हैं। प्रतिमाकं लेखोंसे अनेक बातों पूजन करते थे। शिल्पशास्त्रका नियम है कि गृह- का पता चलता है; जैसे कौन कौन जातियोंने प्रतिमंदिरमें ११ अंगुल तककी प्रतिमा ही होनी चाहिए। माएं बनवाई, वर्तमानमें उन जातियोंमेंसे जैनधर्मका यद्यपि विशालकाय धातुमूर्तियाँ पाई जाती हैं, वे कौन कौन जातियाँ पालन करती हैं । कौनसे गच्छ शिखरबंद जैन मन्दिर में स्थापित की जाती थीं। मुग़ल या संघके आचार्य व भट्टारकने प्रतिष्ठा करवाई, समयमें शिखरबंद जैनमंदिर भी पाये जाते हैं । जैना- वर्तमानमें कौन कौन गच्छ उनमेंसे विद्यमान हैं, चार्योंने राजदरबारमें जाकर मुगलसम्राटको स्वआचरण आचार्यों व भट्टारकोंकी शिष्य-परमपरा, राजाओं, सेरंजित कर काफी सन्मान संपादन किया, इसे इति. मंत्रियों व नगरोंके नामादिक। और भी अनेक महहास बतला रहा है। खरतरगच्छीय श्री जिनप्रभसूरि त्वपूर्ण बातें प्रतिमा-लेखोंसे ही जानी जा सकती हैं। और आचार्य श्री जिनचंद्रसूरिजी इसके उदाहरण प्राचीन प्रतिमाओंके देखनेसे यह भी मालूम होजाता रूप हैं। मेरे खयालमें जबसे जैनाचार्योंका राजदरबार है कि तत्कालीन कला-कौशल्य कितने ऊँके दर्जेका से विच्छेद हा तबसे जैन समाजकी कुछ अवनति था, कौनसी शताब्दिमें किस ढंगसे पतिमाएँ बनाई ही पाई जाती है । खैर ! जो कुछ हो, आज जैन जाती थीं तथा लिपिमें किस शताब्दिमें कैसा पग्विसमाज की संख्या दूसरोंकी अपेक्षा अल्प है, फिर भी तन हुआ । इत्यादि । ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि में भी भारतीय समाजोंमें जैन समाजका स्थान बहुत ऊँचा है। पतिमालेखोंका स्थान महत्त्वका है। कौनसे साल में, प्रतिमालेखोंकी उपयोगिता कौनसे मासमें अविवृद्धि (?) हुई थी यह प्रतिमालेखोंमें प्रतिमालेखोंकी ऐतिहासिकता इसलिये अधिक लिखा रहता है । मैं अनुभवसे कह सकता हूँ कि २५ मानी गई है कि उनपर किंवदन्तियों व अतिशयो- या ५० वर्षों में लिपिमें अवश्य परिवर्तन पाया जाता क्तियोंकी असर अधिक नहीं गिर सकती । क्योंकि है। उदाहरणार्थ १४५० की प्रतिमापर खुदे हुए लेख लिखनेकी जगह कम होनेसे मुख्य मुख्य बातें ही को देखता हूं यब उस लिपिकी मरोड़में बहुत कुछ उल्लिखित होती हैं । और इसीलिये विद्वत्समाज अंतर मालूम पड़ता है। धातु पतिमाओंके लेख पायः जितना विश्वास उत्कीर्ण लेखों पर रखता है । पड़ी मात्रामें लिखे हुए पाये जाते हैं । किसी किसी Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] प्रतिमा लेख संग्रह और उसका महत्व ४२६ पतिमामें तो लेखान्त-मार्गमें सुन्दर चित्र पालेखित श्वेताम्बर संप्रदायकी मूर्तिके अंत भागमें भी 'प्रणहोता है। ऐसे चित्र मैंने श्वेताम्बर सम्पदायान्तर्गत मंति' शब्दका उल्लेख पाया जाता है लेकिन वह अपअंचलगच्छके प्राचार्यों की प्रतिष्ठित की हुई मूर्तियोंमें वादिक है । इसके सिवाय दिगम्बर शिला व प्रतिमा विशेषरूपसे देखे हैं । धातु पतिमा लेख इतने स्पष्ट लेखोंमें अधिकतर शक संवत्का उल्लेख पाया जाता और सुवाच्य अक्षरोंमें लिखे होते हैं कि मानो सुन्दर है, जब कि श्वेताम्बर लेखोंमे प्रायः विक्रम संवतका । हस्तलिखित पुस्तक ही हो । अर्थात् हस्त-लिखित इस विषयमें मैंने एक विद्वान से पूछा था, उन्होंने ऐसा पुस्तकोंके अक्षरोंसे ये प्रतिमालेख बड़ी सहूलियतसे कहा कि वि० सं० की ऐतिहासिकतामें विद्वानोंको मुकाबला कर सकते हैं। बड़ा भारी शक हैं और शक संवत्-प्रर्वतक महाराजा धातु-प्रतिमालेख श्वेताम्बर व दिगम्बर भेदकी सातवाहन जैनी थे, इसीलिये शक संवत्का उल्लेख वजहसे दो भागोंमें विभाजित है। पश्चिम भारत व बड़े गौरवसे किया जाता है। सातवाहनके जैनत्वके राजपूताने के अधिकतर प्रतिमालेख श्वेताम्बर संप्र- विषयमें मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु वि० सं० को दायसे संबन्ध रखते हैं और दक्षिण भारतके लेख अनैतिहासिक बतलाना नितांत गलती जान पड़ता है। विशेषतः दिगम्बर संप्रदायसे । इसका प्रधान कारण हाँ! ऐसा हो सकता है कि दक्षिणमें शक संवत्का यही जान पड़ता है कि प्राचीनकालसे पश्चिमी भारत उपयोग ज्यादा किया जाता हो और गुजरातमें में श्वेताम्बरोंका और दक्षिण भारतमें दिगम्बरोंका विक्रमका । प्रभुत्व रहा है। प्रतिमालेखसंग्रहको देने पूर्व हम यहां पर एक यहाँ जो लेख मैं आपके सन्मुख उपस्थित कर बात और प्रकट करना चाहते हैं वह यह कि प्रतिमारहा हूँ वे सब दिगंबर संप्रदायसे संबंध रखते हैं। लेख-संग्रहकी प्रणाली हाल में ही शुरु नहीं हुई बल्कि प्रतिमा लेखोंका जो लिपिकौशल्य श्वेताम्बर मूर्तियों में पूर्वकाल में भी वह पाई जाती है । आजसे कोई १०० पाया जाता है वह खेद है कि दिगंबर मूर्तियोंमें मेरे वर्ष पहिले वि० सं० १९०० में एक यतिजी सिद्धाचल देखने में नहीं आया । यह बात ऐतिहासिक होनेसे जी की यात्राकं लिये गये हुए थे उन्होंने तहांके कई यहां लिखनी पड़ती है। एक बात और भी है और शिला व प्रतिमा-लेखोंकी ज्योंकी त्यों (कापीटकापी) वह यह कि दिगम्बर तथा श्वेताम्बर संप्रदायोंमें पतिलिपि की थी, वह कापी ऐतिहासिक दृष्टिसे बड़े प्रतिमा व शिलालेखोंकी लेखन - प्रणाली भिन्न २ महत्त्वकी है और मेरे संग्रहमें सुरक्षित है । एक और मालूम होती है। पहले संवत्, उपदेशक भट्टारकका भी प्राचीन लेखोंकी प्रतिलिपिकी प्रति मेरे संग्रहमें नाम, पीछे मूर्ति बनवाने वालेका नाम व अंतमें है। जिसमेंके लेख महिमापुर-मंदिर-पशरित और भगवानके नामके बाद 'नित्यं प्रणमंति' यह प्रणाली बीकानेर नरेश सूरतसिंहजीके साथ विशेष संबन्ध दि० संप्रदायकी है। श्वे० संप्रदायमें संवत् निर्देश रखते हैं । पतिलिपि करने वाला क्षमा-कल्याणजीकी करनेके बाद प्रतिमा बनवाने वालेका, भगवानका, परंपराका होना चाहिए, क्योंकि इसमें उक्त मुनिजी प्रतिष्ठित आचार्य व नगरका नाम आता है । यद्यपि की पतिष्ठित की हुई मूर्तियों के लेखोंकी बाहुलता है। Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [ वर्ष ४ पुरातनकाल में यति मुनि जहाँ भी पतिष्ठा करवाते थे बड़े आश्चर्यको बात नहीं है। दूसरा जो चिन्ह है वहाँ के लेखोंकी पतिलिपि अपने दफ़तरोंमें याददाश्त वह शा त्रका द्योतक है। साथमें इस बातका भी के लिये रखते थे। श्रीपूज्योंके दफ्तरोंको ऐतिहासिक स्मरण रखना चाहिए कि उपर्युक्त दोनों चिन्ह सभी दृष्टिसे संशोधित परिवर्धित करके यदि पकाशित मूर्तियों में नहीं पाये जाते हैं। किया जाय तो ऐतिहासिक सामग्रीमें बहुत कुछ अभिदिगम्बर और श्वेताम्बर संपदाय-भेद होनेका वृद्धि हो सकती है। इतिहास तो पाया जाना है मगर मूर्तियों में कब भेद एक बात यहां पर और भी उल्लेखनीय है, जो पैदा हया यह बात की रूपम नहीं कह सकते । इस माशास्त्रज्ञाक लिय बड़ा ही महत्त्वपूण सिद्ध भेदक इतिहासका लिखनके पहिले पाचीनस पाचीन होगी, और वह यह कि दिगम्बर व श्वेताम्बर दानों दि० व श्वे० मूर्तियों के फोटो तथा विस्तृत परिचय संपदायोंकी मूर्ति-निमोण-कला भी पायः भिन्न रही दकर एक महान ग्रंथ तैयार करना चाहिए। क्या है । हमने दि० संपदायका काफी मूर्तियों का अध्ययन दानों संपदायक विद्वान व श्रीमान इस बात पर ध्यान किया है। उस परसे हम कह सकते हैं कि दि० देंगे? यदि यह कार्य किया जाय तो बहुत बड़ी उलमर्नियोंके आगेके भागमें पायः एक ओर चरण, भने सुलझ जायंगी। जैनमूर्ति-पूजा-शा त्र' नामक दूसरी ओर 'नमः' पाया जाता है । ये दा चिन्ह क्या निबन्ध (thesis) Ph.d. की डिग्री के लिये मेरे गुरुबनाये जाते हैं समझमें नहीं आता! लकिन मरा यह वर्य उपाध्याय श्रीसुखसागरजीन लिखा है । इस ग्रथ अनुमान है कि चरण इस लिये बनाये जाते होंगे कि में दानों संपदायांक पाचीन-अर्वाचीन मूतियों के कुछ समय पूर्व दि० संपदायमें साधु विच्छेद हागय फाटा दिये जावगे। (क्रमशः) थे इस वास्ते चरणका गुरुक रूपमें मानते हा ता काई वीरसेवामन्दिर सरसावाकी भीतरी बिल्डिगके एक भागका दृश्य Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण] वोरसेवामन्दिरके दृश्य songDESeptem वीरसेवा-मन्दिर सासावाके पूर्वद्वारका दृश्य Courtemalomo 60Seconoecio वीरसेवा-मन्दिर सरसावाके उत्तरद्वारका दृश्य Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विश्व-संस्कृतिमें जैनधर्मका स्थान (ले०-डा० कालीदास नाग, एम० ए०, डी. लिट० ) pa नधर्म और जैन संस्कृतिक विकासके पीछे यह तो जानवरों, देवताओं और पाताल वासियोंके लिये भी Fa! शताब्दियोंका इतिहास छिपा पड़ा है। श्री है। विश्वात्मक सहानुभूति-सहित यह व्यापक दृष्टि और बौद्धोंका मैत्रीका सिद्धान्त दोनों बातें जैनधर्ममें अहिंसाके ऋषभदेवसे लेकर बाईस अहंत श्री नेमि आध्यात्मिक सिद्धान्त-द्वारा मौजूद हैं। इसलिये जैनधर्म नाथ तक महान् तीर्थंकरोंकी पौराणिक परं और बौद्धधर्मका तुलनात्मक अध्ययन बहुत पहलेसे ही पराको छोड़ भी दें, तो भी हम अनुमानतः ईसवी सनसे किया जाना चाहिये था। याज ईसवी सनसे पहलेके १००० ७२ वर्ष पूर्वके ऐतिहासिककालको देखते हैं. जब तेईसवें वों में हिन्दुस्तानके आध्यात्मिक सुधारके आन्दोलनोंको जो अर्हत श्रीभगवान पार्श्वनाथका जन्म हुआ, जिन्होंने तीस वर्ष सममना चाहते हैं, उनके लिये इस प्रकारके तुलनात्मक की आयुमें घर-गृहस्थी त्याग दी और जिनको अनुमानतः अध्ययनकी अनिवार्य आवश्यकता है । वह समय एशियाभर ईसवी सनसे ७७२ वर्ष पूर्व बिहारके अन्तर्गत पार्श्वनाथ में उग्र राजनैनिक और सामाजिक उलट-फेरका था, उसी पहाड़ पर मोक्ष प्राप्त हुआ। भगवान पार्श्वनाथने जिस समय एशियामें कई महान दृष्टा और धर्म संस्थापक उत्पन्न मिगन्थ सम्प्रदायकी स्थापना की थी, उसमें काल-गतिसे हुए, जैसे ईरानमें जरथुस्त्र और चीनमें लापोरजे और उत्पन्न हुए दोषोंका सुधार श्रीवर्धमान महावीरने किया। । कनफ्यूसियस। महावीर अपनी प्राध्यात्मिक विजयकं कारण 'जिन' अर्थात् जैनधर्म और ब्राह्मणधर्मके सम्बन्धके बारेमें हम देखते विजयी कहलाते हैं। अतएव जैनधर्म, अर्थात् उन लोगोंका हैं कि साराका सारा जैनसाहित्य ब्राह्मण संस्कृतिकी ओर धर्म जिन्होंने अपनी प्रकृति पर विजय प्राप्त करली है, एक बौद्ध लेखकोंके विचारोंकी अपेक्षा ज्यादा मुका हुआ है। महान् धर्म था, जिसका आधार आध्यात्मिक शुद्धि और डाक्टर विंटरनिज. प्रो. जैकोबी और दूसरे कई विद्वानोंने विकास था। इससे यह मालूम हुआ कि महावीर किसी इस बातको ज़ोरदार शब्दों में स्वीकार किया है कि जैन धर्मके संस्थापक नहीं, बल्कि एक प्राचीन धर्मके सुधारक थे। लेखकोंने भारतीय साहित्यको सपम्न बनाने में बड़ा महत्वप्राचीन भारतीय साहित्यमें महावीर गौतम बुद्धके कुछ पहले पूर्ण हिस्सा अदा किया है। कहा गया है कि “भारतीय उत्पन्न हुए उनके समकालीन माने जाते हैं। जैनसाहित्यमें साहित्यका शायद ही कोई अंग बचा हो. जिसमें जैनियोंका कई स्थानों पर गौतम बुद्धके लिये यह बतलाया गया है कि अत्यन्त विशिष्ट स्थान न रहा हो।" वे महावीरके शिष्य गोयम नामसे प्रसिद्ध थे। बादमें उत्पन्न इतिहास और वृत्त, काव्य और पाख्यान, कथा और हुए पक्षपात और मतभेदके कारण बौद्ध लेखकोंने निगन्थ नाटक, स्तुति और जीवनचरित्र, व्याकरण और कोष और नातपुत्त (महावीर) को बुद्धका प्रतिपक्षी बताया। वास्तवमें इतना ही क्यों विशिष्ट ज्ञानिक साहित्यमें भी जैन लेखकों दोनों के दृष्टिकोणों में फर्क था भी। यही कारण है कि बौद्ध की संख्या कम नहीं है। भद्रबाहु, कुन्दकुन्द, जिनसेन, धर्मका दुनियाके बड़े भागमें प्रसार हुआ, किन्तु जैन धर्म हेमचन्द्र. हरिभद्र और अन्य प्राचीन तथा मध्यकालीन एक भारतीय राष्ट्रीय धर्म ही रहा। किन्तु फिर भी जैसा लेखकोंने अाधुनिक भारतवासियोंके लिये एक बड़ी सांस्कृतिक डाक्टर विंटरनिज़ने कहा है, दर्शनशास्त्रकी दृरिटसे जैनधर्म भी सम्पत्ति जमा करके रखदी। इस बातका प्रतिपादन तपगच्छ एक अर्थमें विश्वधर्म है। वह अर्थ यह है कि जैनधर्म न सब के सुप्रसिद्ध जैन आचार्य, लेखक और सुधारक श्रीयशोकेवल जातियों और सब श्रेणियोंके लोगोंके लिये ही है. बल्कि विजयजीने किया है, जिनका समय सन् १६२४-८८ के Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] विश्वसंस्कृतिमें जैनधर्मका स्थान बीचका है। ईसवी सनसे एक शताब्दी बाद जैनियोंमें के लिये एक बृहत् सूची बनानेका प्रयत्न भी नहीं किया। दिगम्बर और श्वेताम्बर जो फ़िर्के हो गये, उनको एक करने लगभग सन् १८७६-७८ में हस्तलिखित जैन ग्रन्थोंका एक का गौरवपूर्ण प्रयत्न इस महापुरुषने किया था। बड़ा संकलन बर्लिनकी रायल लायब्ररीके लिये जार्ज बूल्हर इस महान् साहित्य और इसकी आध्यात्मिक सामग्रीकी ने किया था। और जैनसाहित्यके विस्तृत विवरणका भी यत्नपूर्वक रक्षा करना मात्र दिगम्बरियोंका, श्वेताम्बरियोंका, पहला प्रयत्न सन् १८८३-८५ के पास पास प्रोफ़ेसर ए. स्थानकवासियोंका, तेरा पंथियों या किसी दूसरे सम्प्रदायके वेबरने किया था। सन् १९०६ और १९०८ के बीचमें लोगोंका ही कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय संस्कृति पेरिसके विद्वान प्रो०ए० गुरीनां महोदयने अपनी 'studies और ज्ञानके सभी प्रेमियोंका कर्तव्य है। on Jaina Bibliography' प्रकाशित की थी। जैनियोंका सैद्धान्तिक साहित्य प्राजभी केवल कुछ उसमें उसके बाद कोई परिवर्तन नहीं किया गया, जबकि गत विशेषज्ञों और विभिन्न सम्प्रदायोंके लोगों तक ही सीमित है। तीस वर्षों में उत्तर और दक्षिण भारतमें नये हस्तलिखित और सिद्धान्त-प्रतिपादनके अलावा जो दूसरा विशाल साहि- जैनग्रंथों और शिलालेखोंके ढेरके ढेर मिले हैं। हाल ही में त्य है, उसका भी प्राजतक पूर्ण रीतिसे अध्ययन नहीं किया दक्षिण भारतमें जैनधर्मकी ओर विद्वानोंका ध्यान आकर्षित गया है। हिन्दू-तत्त्वज्ञानके कितने विद्यार्थी यह जाननेकी हो रहा है । डा०, एम० एच० कृष्णने 'श्रवण बेल गोलामें परवाह भी करते हैं कि जैनियोंने न्याय और वैशेषिक दर्शनों गोमटेश्वरके मस्तकाभिषेक' पर खोजपूर्ण विवेचन किया है। के विकासमें कितना योग दिया है ? कितने हिन्दु इस बात डा०, बी० ए० सालतोर और श्री एम० एस० रामस्वामी को जानते हैं कि रामायण और महाभारतकी कथाओं, एवं आयंगरने भी दक्षिण भारतीत जैनधर्मके अध्ययनमें महत्वपुराण और कृष्णकी कहानियों पर जैन लेखकोंने भी कितना पूर्ण योगदान किया है । (देखो जैन एंटीक्वेरी, मार्च १९४०)। लिखा है। भारतीय कलाके कितने विद्यार्थी यह जानते हैं इण्डियन म्युजियमके क्यूरेटर श्री टी० एन० रामचन्द्र ने कि प्राचीन अजन्ता-कालकी चित्रकला और मध्य-युगकी अपनी सुन्दर सचित्र पुस्तक, जिसका नाम "तिरुप्परुत्ती राजपूत-कलाके बीच जैन चित्रकला कितना सुन्दर यौगिक कुरनन, और उसके मन्दिर" में दक्षिण भारणके जैनस्मारकों है । जैन लेखकोंने भारतकी कई प्रमुख भाषाओं जैसे उत्तरमें के बारेमें बहुत सुन्दर सामग्री दी है। डा० सी० मीनाक्षीने गुजराती, मारवादी और हिन्दी, तथा दक्षिणमें तामिल, कई जैन गुफाओं और जैनचित्रोंका पता लगाया है, जिनमें तेलगु और कनाड़ी आदिको साहित्य सम्पन्न करने में कितनी तीर्थंकरोंके जीवनकी सामग्री है। खासतौरसे पुदुक्कोटा स्टेट सहायता दी है। इन भाषाओं में आज भी जैनधर्म सम्बन्धी अन्तर्गत सित्तन्न-घासल ग्राममें यह खोज हुई है। कितने गम्भीर और विवेचनपूर्ण प्रबन्ध छपते हैं, किन्तु अभी तक किसी भी जैनसंस्थाने इस समस्त सामग्रीकी सर्वसाधारण [पर्युषन-पर्व-व्याख्यानमाला] Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्वालियरके किलेकी कुछ जैनमूर्तियाँ [ लेखक-श्रीकृष्णानन्द गुप्त ] ग्वालियरका किला एक विशाल पहाड़ी चट्टानपर स्थित रक्खी गई। मुझे अजन्ता और एलौरा जानेका सुअवसर है । इस पहाड़ीमें होकर शहरसे किले के लिये एक सड़क मिला है। हम लोग इन स्थानोके कितने ही चित्र देखें, जाती है। मूर्तियों में से कुछ तो इस सड़कके दोनों ओर चट्टान पुस्तकोंमें उनका कितना ही वर्णन पढ़ें, परन्तु वहाँ पहुँचने पर खुदी हैं, और कुछ दूसरी दिशामें हैं। पत्थरकी कड़ी पर जो दृश्य देखनेको मिलते हैं वह कल्पनासे एक दम परे, चट्टानको खोदकर ये मूर्तियाँ बनाई गई हैं। आश्चर्य-जनक और भव्य हैं। मनुष्य वहाँ जाकर अपनेको भारतवर्ष में ऐसे कई स्थान है, जहाँ कड़ी चट्टानोंको खो बैठता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानों वह मायासे बनी खोदकर इस तरहकी मूर्तियों और गुफापोंका निर्माण किया हुई किसी अलौकिक पुरीमें भागया है। गया है । भारतीय कलामें इनका एक विशेष स्थान है। परन्तु एलौरामें जो जैन-गुफाएँ हैं उनकी कारीगरी भी गुफाएँ तो अपनी अदभुत कारीगरीके लिये संसार भरमें कम आश्चर्य-जनक नहीं है । जैनियोंकी कलाका एक विशेष प्रसिद्ध हैं। इनके अनुपम शिल्प-कौशलको देखकर साधा- रूप वहाँ देखनेको मिलता है। जब मैं एलौरा गया तो वहाँ रण दर्शक ही चकित होकर नहीं रह जाते, बल्कि बड़े-बड़े बाहरके एक मिश्नरी यात्री ठहरे हुए थे। वे अपनी प्रातः कला-मर्मज्ञ भी दाँतों तले उँगली दबाते हैं । ये गुफाएँ और और संध्या कालीन प्रार्थना नित्य एक जैन गुफामें जाकर मूर्तियाँ बौद्ध, जैन और ब्राह्मण, इन तीनों धर्मोंसे सम्बन्ध किया करते थे। बात चीत होने पर उन्हेंोंने कहा कि इस रखती हैं। कहीं-कहीं केवल एक धर्मकी, और कहीं तीनों स्थानका वातारण इतना शान्त और पवित्र है कि उसका धर्मोकी गुफाएँ और मूर्तियाँ पाई जाती हैं । एलौराके गुहा- मैं वर्णन नहीं कर सकता। जैन-गुफापोंकी एक विशेषता मन्दिरों में तीनोंके उदाहरण मौजूद हैं। इनमें बौद्ध गुफाएँ यह है कि वहाँ तीर्थङ्करोंकी मूर्तियाँ काफ़ी संख्यामें बनी सबसे प्राचीन हैं । फिर ब्राह्मण गुफाएँ बनी हैं, और उसके रहती हैं । एलौरामें जो गुफाएँ मैंने देखीं, वहाँ जैन तीर्थङ्करों बाद जैन गुफाएँ। एलीफेन्टाकी गुफात्रोंमें शैव धर्मकी प्रधा- की पंक्तियाँकी पंक्तियाँ विराजमान थीं। परन्तु जैनियोने नता है । बीजापुरके निकट 'बादामी' नामक एक स्थान है, पत्थरकी कड़ी चट्टानोंको काटकर एक दूसरे ही रूपमें अपने वहाँ एक पहाड़ीको काटकर जो चार उपासना-घर बनाये देवताओंको मूर्तिमान किया है। ग्वालियरमें शायद उसके गये हैं, वे तीनों धर्मोकी कलाके द्योतक हैं। जबकि अजन्ता सर्वश्रेष्ठ उदाहरण देखनेको मिलते हैं। वहाँ गुफाएँ न बना की गुफाएँ मुख्यत: बौद्ध धर्मसे सम्बन्धित हैं । ब्राह्मण और कर केवल चट्टानों पर ही उन्होने विशाल और भव्य बौद्ध इस प्रकारके स्थापत्यके विशेष रूपसे प्रेमी रहे हैं । इन मूर्तियाँ अंकित की हैं। गुफाओंके भीतर प्रवेश द्वारसे लेकर एक दम अन्त तक यों तो किलेमें कई जगह जैनमूर्तियाँ खुदी हैं, परन्तु मनुष्यकी प्रतिभा, कला, धर्म, उपासना, धैर्य, और हस्त- दक्षिण-पूर्वकी ओर तथा पहाड़ीकी एक और घाटीमें जो कौशलके आश्चर्यजनक दर्शन होते हैं । एलौगका कैलाश- जो मूर्तियाँ हैं वे विशेषरूपसे उल्लेखनीय हैं । किलेपरसे एक मंदिर तोजगत्-प्रसिद्ध है । यह एक पहाड़ीको काटकर बनाया बढ़िया सड़क घाटीमें होकर नौचे आती है, और वहाँसे गया है। बीचमें मंदिर, उसके चारों ओर मंदिरकी परिक्रमा, लश्करकी तरफ़ गई है। ऊँचाईपर होने, तथा पहाड़ी रास्तेमें और फिर परिक्रमाके साथ ही चारों तरफ दालाने भी हैं, होकर पानेकी वजहसे एक तो यह सड़क यों ही बहुत रमजिनमें ऐसी सुन्दर और सजीव मूतियाँ स्थापित हैं कि जान णीक है, परंतु दोनों ओर चट्टानपर खुदी हुई भगवान श्रादिपड़ता है वे सब अभी बोल पड़ेंगी। ये सब मूर्तियाँ भी नाथ, महावीर तथा अन्य कई जैन तीर्थंकरोंकी विशाल और चट्टानमेंसे काटकर बनाई गई हैं। दूसरी जगहसे लाकर नहीं भव्य मूर्तियोंके कारण तो वह और भी सुन्दर और दर्शनीय Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] ग्वालियरके किलेकी जैन मूर्तियां ४३५ बन गई है। यहां कुल २४ मूर्तियाँ हैं । इनके निर्माणका अत्यन्त सुन्दर है । मुख मण्डलपर सौभ्यताका एक अलौकिक समय हमें उन शिलालेखोंसे ज्ञात हो जाता है जो यहाँ भाव है। उँगलियाँ बड़ी कोमल और कला-पूर्ण है। परन्तु अंकित हैं, और काफी स्पष्ट हैं। ये शिलालेख संवत् १४६७ कटि-प्रदेशसे नीचेका भाग उतना मृदुल और सजीव नहीं (ई. सन् १४४०). और १५१० (ई. सन् १४५३) के हैं। है। इसका कारण इन मूर्तियोंकी विशालता ही है। बड़े रूप इससे प्रकट होता है कि ये मूर्तियाँ तोमर राजाओंके समय में अंग-विन्यासकी कोमलताकी रक्षा करना अत्यन्त कठिन की बनी हैं । दुर्भाग्यवश वे अपनी असली हालतमें नहीं हैं। है। इन मूर्तियोंके पैर तो विशेष रूपसे कुछ जड़ होजाते हैं। मुसलमानोंकी धार्मिक असहिष्णुताके कारण बहुत कुछ नष्ट आदिनाथ भगवानकी मूर्ति के पैर नो फीट लम्बे हैं और वह हो चुकी हैं। बाबर जब सिंहासन पर बैठा तो इन मूर्तियों पर चक्र चिन्दसे सुशोभित हैं। इस प्रकार मूर्ति पैरोंसे सात गुनी उसकी खास तौरसे नज़र पड़ी । आत्मचरितमें एक स्थानपर के लगभग बड़ी है। मूर्तिके बीचों-बीच सामने चट्टानका इन मूर्तियोंका ज़िक्र करते हुए बाबरने लिखा है-"लोगों एक अंश बिना कटा ही छोड़ दिया गया है। इसलिये समग्र ने इस पहाड़ीकी कड़ी चट्टानको काटकर छोटी-बड़ी अनेक मूर्तिको देखना कठिन है। यहांसे थोड़ा आगे चलकर मूर्तियां गढ़ डाली हैं । दक्षिणकी ओर एक बड़ी मूर्ति है जो पश्चिमकी तरफ नेमिनाथ भगवान्की एक दूसरी विशालमूर्ति करीब ४० फीट ऊँची होगी। ये सब मूर्तियाँ नग्न हैं। वस्त्र है। नेमिनाथ जैनियोंमें बाइसवें तीर्थङ्कर थे । आदिनाथकी के नामसे उनपर एक धागा भी नहीं । यह जगह बड़ी खूब- मूर्तिकी भांति यह मूर्ति भी खड़ी हुई है। परन्तु अन्य जो सूरत है। परन्तु सबसे बड़ी खराबी यह है कि ये नग्नमूर्तियाँ मूर्तियाँ हैं वे समासीन अवस्थामें हैं, और देखने में बहुत मौजूद हैं। मैंने इनको नष्ट करनेकी श्राज्ञा दे दी है।" कुछ भगवान बुद्धको मूर्तिसे मिलती-जुलती हैं। वास्तवमें यद्यपि यत्र-तत्र इन मूर्तियों पर प्रहारके चिन्ह मौजूद साधारण दर्शकके लिये भगवान् बुद्ध और महावीरकी मूर्ति है। फिर भी कुल मिलाकर वे अच्छी हालत में हैं । यह वड़ी में किसी प्रकारका विभेद करना बड़ा कठिन है। परन्तु ये बात है। किलेसे बाहर निकलते ही, ज्यों ही आगे बढ़िए, मूर्तियां अपने विशेष धार्मिक चिन्होंसे सुशोभित रहती हैं, आदिनाथकी एक विशाल मूर्ति बरबस हमारी दृष्टि श्राकृष्ट जिनकी वजहसे इन्हें पहचानना आसान है। ये चिन्द कई करती है। बाबरकी श्रात्म-जीवनीसे ऊपर हमने जो अंश प्रकारके होते हैं। उदाहरणके लिये वृषभ, चक्र, कमल, उद्धृत किया है उसमें ऊँचाई चालीस फीट बताई गई है, अश्व, सिंह, बकरी, हिरन आदि । जैनियोंके प्रथम तीर्थङ्कर परन्तु वह सत्तावन कीटसे कम ऊँची नहीं है। जैनियोंकी भगवान् श्रादिनाथकी मूर्ति के निकट सदैव वृषभ बना रहता इतनी बड़ी मूर्ति भारतमें एकाच जगह ही और है। मूर्तिकी है। घाटीकी दाहिनी तरफ और भी कई मूर्तियां हैं। ये विशालतासे दर्शक एकदम चकराकर रह जाता है । कल्पना अकेली बहुत कम हैं। एक साथ तीन-तीन मूर्तियां हैं। काम नहीं करती। जिन कलाकारोंने इस मूर्तिको गढ़ा होगा मूर्तियोंके कुछ आगे चट्टानका एक हिस्सा बिना कटा छोड़ वे अाज हमारे सामने नहीं हैं। उनका नाम भी हमें ज्ञात दिया है, जिसकी वजहसे एक दीवार-सी बन जाती है। यह ही । नामकी उन्हें इतनी परवा भी न थी। परन्तु उनकी शायद पुजारी अथवा भक्त-गणोंके लिये बैठनेका स्थान है। अनोखी कला, उनका अनुपम शिल्प-कौशल, उनका अतु- घाटीके बाहर दक्षिण-पश्चिमकी अोर मूर्तियोंका एक लित धैर्य, उनकी अटूट साधना, श्राज मानों आदिनाथ और समूह है। इनमें कुछ विशेष रूपसे उल्लेखनीय हैं। भगवानकी इस मूर्ति के रूपमें हमारे समक्ष उपस्थित हैं । इस एक तो शयनावस्था में एक स्त्री-मूति है, जो करवटसे लेटी कला-मूर्तिको एक बार प्रणाम करके हमने उसे पुन: ध्यान है और करीब आठ फीट लम्बी होगी। दोनों जांघे सीधी हैं, पूर्वक देखा । मुख मण्डल पर जैसे कुछ उपेक्षाका भाव है। परन्तु बाँया पैर दाहिनेके नीचे मुड़ा है । दूसरे स्थान पर परन्तु फिर भी मूर्ति अाकर्षक है। इस प्रकारकी सभी बड़ी तीन मूर्तियां हैं, जिनमें माता-पिताके साथ एक बालक जैन-मूर्तियोंमें एक प्रकारकी जड़ता-सी दृष्टि गोचर होती है। प्रदर्शित किया गया है। ये मूर्तियाँ भगवान् महावीरके अहारमें जो मूर्ति है उसके कटि-प्रदेशसे ऊपरका भाग तो माता-पिता त्रिशला और सिद्धार्थकी बतलाई जाती हैं, और Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वर्ष ४ साथमें बालकके रूपमें स्वयं भगवान् हैं। तत्त्व विभाग द्वारा प्रकाशित अन्य पुस्तकें पढ़ें [हमें स्वयं ___ दक्षिण-पूर्वकी ओर जो मूर्तियाँ हैं उन तक पहुँचना इन मूर्तियोंके दर्शन करने तथा किलेके अन्य पुराने स्थानों बहुत कठिन है। प्रयत्न करनेपर भी उन्हें हम देख नहीं सके। को देखनेमें इन ग्रन्थोसे बड़ी मदद मिली] ___ इन मूर्तियोंके सम्बन्धमें जो विशेष जानकारी प्राप्त करना चाहें वे ग्वालियर गजेटियर तथा ग्वालियरके पुरा .(मधुकर' पाक्षिकसे उद्धृत) +--: अमोघ आशा :-- [ लेखक-व्याकरण रत्न पं० काशीराम शर्मा 'प्रफुल्लित' ] [ ७ ] जगति का तृण-दल निखरेगा, सण-प्रतिक्षण मृदुकण बिखरेगा, मलयानलकी कम्पित, मोलीसे मजुल मकरन्द मरेगा। प्रकृति-सुन्दरी नृत्य करेगी, वन-विहँग मंगल गायँगे ! श्राएँगे, वे दिन आएँगे !! कभी हमारा था जग अपना, सुख था, दुखका था नहीं सपना; दस लक्षण, शुभ लक्षण थे तब, होती थी न अशुभ दुर्घटना। जब न रहे वे सुखके दिन तो, ये दुर्दिन भी टल जायेंगे ! भाएंगे वे दिन श्राएंगे !! [ २ ] मिट जायेगा, दर्द-पुराना, है परिवर्तन-शील जमाना; भूलेगा अन्तर, आंखों कीप्याली से आँसू छलकाना! निर्मम हो कर छोड़ गये जोममता लेकर घर आएँगे ! आएँगे, वे दिन आएँगे !! [ ३ ] निशा-निराशा का मुंह-काला, नभ से फूटेगा उजियाला; अरुण ,उषाके कोमल करसे छलक पड़ेगा जीवन प्याला। प्राशाके छींटों में दुब-डुबकरते तारे छिप जाएँगे ! श्राएँगे, वे दिन आएंगे !! [ ४ ] मंजु सुमन होंगे सहयोगी, कहीं न कोई पीड़ा होगी; सत्य - साधनाके साधनसेबन जायेंगे भोगी योगी। एक एक का हाथ पकड़ करदुख - सागरसे तिर जायेंगे ! श्राएँगें, वे दिन श्राएँगे !! [ ५ ] विप्लव, पापाचार घटेंगे; भीषण अत्याचार हटेंगे! सच्ची रीति • नीति से जगके, मिथ्यांचार - विहार मिटेंगे, प्रेम • सुधाकी दो घूटोंसेअमर सदा को हो जाएँगे! पाएँगे, वे दिन आएँगे !! विषम-वासना मिट जाएगी, साम्य - भावना छा जाएगी; सदाचारकी सुख-गंगामेंदुनिया फिर गोते लाएगी। घुल कर पीड़ा क्रीड़ाओं में-- पाप पुण्यसे धुल जाएँगे! श्राएँगे, वे दिन श्राएँगे !! फैलेगी नव-लता निराली, थिरक उठेगी डाली-डाली; संसृति झूम उठेगी सुख मेंतम में हँसती-सी दीवाली ! मंगलमय जग-जंगल होगा, सुखद-जलद जल बरसाएंगे! श्राएँगे, वे दिन श्राएँगे !! मधु होगा, पीने • खाने को, नन्दन - वन मन बहलानेको, भूतलसे नभतल तक होगासुन्दर पथ, श्राने • जानेको। 'सत्य' सखा बन साथ रहेगाजब चाहे पाएँ - जाएँगे ! पाएँगे, वे दिन आएँगे !! Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'सयुक्तिक सम्मति' पर लिखे गये उत्तर लेखकी निःसारता [ लेखक-पं० रामप्रसाद जैन शास्त्री ] [गत किरणसे आगे] (२) अर्हत्प्रवचन और तस्वार्थाधिगम द्वंद्वादौ वा श्रयमाणं पदं प्रत्यकं संबध्यते' इस नियम स प्रकरणमे सयुक्तिक सम्मति के आक्षेपका उत्तर के अनुसार द्वंद्वान्तर्गत विशेषण प्रत्येक विधेय (विशेष्य ) के साथ लग सकता है, तो इसका उत्तर Sax देते हुए प्रोफेसर जगदीशचंद्रन मेरे व्याकरण यह है कि यह बात असंदिग्ध अवस्था की है, जिस विषयक पाण्डित्यपर हमला करनकी काशिश की है जगह संदिग्धनारूप विवादस्थ विषय हो वहाँ यह और विना किसी युक्ति-प्रयुक्तिक हेतुके ही मेरे ज्ञान उपर्युक्त व्याकरणका नियम लागू नहीं होता । यहांका को झटसे व्याकरण-शून्यताकी उपाधि द डाली है ! विषय संदिग्ध हान के कारण विवादस्थ है; क्योंकि मालूम नहीं व्याकरण के किस अजीब कायदेको लेकर सिद्धसेनगणीकी टीकाके अध्याय-परिसमाप्ति-वाक्यों उत्तरलेखकन व्याकरण-शून्यताका यह सार्टिफिकट में सिर्फ सप्तम अध्यायको छोड़कर और किसी भी दे डालने का साहस किया हे ! मुझे तो इसमें उत्तरलखकळं चित्त की प्रायः क्षुब्ध प्रकृति ही काम करती अध्यायके अन्त में ' उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये' हुई नजर आरही है। ऐसा वाक्य नहीं है। ऐसी हालतमें कहा जा सकता मैंन लिखा था कि- उमास्वातिवाचकापज्ञ है कि यह वाक्य खास सिद्धसनगणीका न होकर सूत्रभाष्य' यह पद प्रथमाका द्विवचन है । चूंकि किसी दूसरेकी कृति हो जो तत्त्वार्थसूत्रका तो उमा'भाष्य' शब्द नित्य ही नपंसकलिंग है, इसलिय वातिका मानता हो परंतु भाष्यको उमास्वातिका 'भाष्य' पद प्रथमाका द्विवचन है, इस कथनमें नहीं मानता हो । प्रतिलेखक भी संधिवाक्यों के व्याकरणकी तो काई गलती नहीं है। अब रहा इस लिखनमें बहुत कुछ निरंकुश पाये जाते हैं, इसीस पदको प्रथमाका द्विवचन लिखनका मेरा आशय, वह ग्रंथकी सब प्रतियों में संधिवाक्य । एक ही रूप यही है कि उक्त द्वंद्वसमासके अन्तर्गत सूत्र और से देखने में नहीं पाते । अथवा उस कृतिको यदि भाष्य दोनों ही उमास्वातिकृत नहीं हैं किन्तु केवल सिद्धसेनगणीकी ही मान लिया जाय तो सिद्धसन तत्त्वार्थसूत्र ही उमास्वातिकृत है । यदि भाष्य भी गणीके हृदयकी संदिग्धता उसके निर्माणमें अवश्य उमास्वातिकृत होता तो सिद्धसेनगणि — उमास्वाति- संभवित हो सकती है। यदि सिद्ध सेनगणी इस वाचकोपज्ञ' इस विशेषणकी भाष्यके साथ भी विषयों ( सूत्र और भाष्यके एककतत्व विषयमें ) वाक्यरचना कर देते, परंतु उन्होंने ऐसी रचना नहीं सर्वदा अथवा सर्वथा असंदिग्ध रहते तो वे 'उमाकी । इसके लिये यदि ऐसा कहा जाय कि 'द्वंद्वान्ते स्वातिवाचकोपज्ञे सूत्रभाष्ये' ऐसा स्पष्ट लिखते अथवा Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४३८ अनेकान्त सूत्र और भाष्य दानों के साथ जुदा जुदा उमास्वातिवाचकोपज्ञ जैसा विशेषण लगा देते; परंतु ऐसा कुछ भी किया नहीं अतः वह पद सप्तमीका एकवचन नहीं है और न उससे एककर्तृना ही सिद्ध होती है । अब देखना यह है कि सिद्धसेनगणी इस विषय में संदिग्ध क्योंकर हैं । सिद्धसेनकी टीकाको यदि गहराई के साथ अवलोकन किया जाता है तो उससे यह पता चलता है कि उन्होंने हरिभद्रसूरि जैसे अपने कुछ पूर्ववर्ती विद्वानांके कथनपरसे यह ग़लत धारणा तो करली कि भाष्य और तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता एक ही व्यक्ति हैं परन्तु वैसी धारणाको सुदृढ रखने के लिये कोई भी पुष्ट प्रमाण उपलब्ध न होने से वे उस विषय में बराबर शंकाशील अथवा संदिग्ध रहे हैं- भले ही आम्नायवश वे दोनोंकी एकताका कुछ प्रतिपादन भी करते रहे हों। उनकी इस स्थितिका प्रधान कारण एक तो यह जान पड़ता है कि भाष्यकं साथमें जो ३१ संबंध - कारिकाएँ हैं उनमें — २२ वीं और ३१ वीं कारिकाओं में - ' वक्ष्यामि ' ( वक्ष्यामि शिष्य हितमिममित्यादि ) ' पत्रक्ष्यामि ' ( मोक्षमार्ग प्रवक्ष्यामि ) जैसे एकवचनान्त प्रयोग पाये जाते हैं; जबकि भाष्य में सब जगह ' उपदेक्ष्यामः ' ( ' विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ' सि० टी० पृ० २५,४१ ) और वक्ष्यामः' (' पुरस्तादवक्ष्यामः' 'मन:पर्ययज्ञानं वक्ष्यामः ' सि० टी० पृ० ७६, १०० ) जैसे बहुवचनान्तक्रिया पद ही नज़र आते हैं और ऐसे स्थल भाष्य में १३ हैं । इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि सम्बंध कारिकाओंके और भाध्यके कर्ता जुदे जुदे हैं । सम्बंध कारिकाओं के कर्ता एक व्यक्ति शायद उमास्वाति हैं और भाष्य के कर्ता कोई दूसरे - संभवतः अनेक हैं। 6 [ वर्ष दूसरा कारण यह मालूम होता है कि भाष्यकारने, अपने भाष्य में, अनेक स्थलोंपर ऐसे वाक्य लिखे हैं जिनले स्पष्ट मालूम होता है कि भाध्यकर्तासि सूत्रकर्ता जुदे हैं । यथा: 'श्राद्य इति सूत्रक्रमप्रामाण्यान्नैगममाह ' ( पृ० ११७) । “आद्यमिति सूत्रक्रमप्रामाण्या दौदारिकमाह ” ( पृ० २०७ ) । 66 बन्धे पुरस्ताद् वक्ष्यति ( पृ० २१० ) । " वक्ष्यति च स्थितौ 'नारकारणां च द्वितीयादिषु' ( पृ० २२८ ) “ उत्तरस्येति सूत्रक्रमप्रामाण्यादुच्चैर्गोत्रस्याह ” ( द्वि० खं० पृ० ३९ ) 66 सूत्रक्रमप्रामाण्यादुत्तरमित्यभ्यन्तरमाह "" ( द्वि० खं० पृ० २४९ ) इन वाक्यों में प्रयुक्त हुए प्रथमपुरुष के एकवचनात्मक क्रियाकं प्रयोग साफ़ सूचित करते हैं कि भाष्यकार, जो अपना उल्लेख उत्तमपुरुष के बहुवचनमें करते आए हैं, अपनेसे सूत्रकारको जुदा प्रगट कर रहे हैं । मालूम होता है इन दोनों कारणों से सिद्धसेनगरणी अपनी धारणा में संदिग्ध हुए हैं, परन्तु आम्नाय अथवा हरिभद्रक कथनकी रक्षाके लिये उन्हें निर्हेतुक वाक्य-रचना करके यह कहना पड़ा है कि सूत्रकार से भाष्यकार अविभक्त है। ऐसे कथन के स्थल सिद्धसेन गणीकी टीका में दो जगह नजर आरहे हैं। एक स्थल तो प्रथम अध्यायके ११ वें सूत्रके भाष्य में प्रयुक्त हुई ' शास्ति ' क्रिया सम्बन्ध रखता है । इस क्रिया का स्पष्ट आशय वहां यह है कि सूत्रकार शिक्षा ( उपदेश ) देता है । इसी ' शास्ति ' क्रियासं संदिग्ध होकर सिद्धसेनगणी आम्नायक-थनकी रक्षार्थ अपनी टीका में लिखते हैं— Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] सयु० स० पर लिले गये उत्तर लेखकी निःसारता ४३६ “ शास्तीति च ग्रंथकार एव द्विधा अात्मानं उक्त दोनों स्थलोंकी पंक्तियाँ व्यर्थकी खींचातानीको विभज्य सूत्रकारभाष्यकाराकारेणैवमाह-शास्तीति, लिये हुए निर्हेतुक होनसे यह कैसे समझा जाय कि सूत्रकार इति शेषः । अथवा पर्यायभेदात् पर्यायिणो भाष्यकार और सूत्रकार एक हैं ? मालूम होता है भेद इत्यन्यः सूत्रकारपर्यायाऽन्यश्च भाष्यकारपर्याय सिद्धसनगणीने दोनोंको एक बतलानेका जो यह इत्यतः सूत्रकारपर्यायः शास्तीति ।" प्रयास किया है वह केवल आम्नायकी रक्षार्थ लोक. अर्थात्-ग्रंथवार ही अपने आत्माको सूत्रकार दिखाऊ किया है; क्योंकि यदि उनकी सर्वथा वैसी ही और भाष्यकारके आकारस दो भागोंमें विभाजित कर भावना होती तो वे सूत्रकारको 'सूरि' और भाष्यकार के ऐसा कहता है । ' शास्ति' क्रियापदके साथमें । को 'भाष्यकार' उल्लेखित करके जुदा जुदा प्रकट न करते । जैसा कि निम्न वाक्योंसे प्रकट है :'सूत्रकारः' पद ' इति शेषः ' (अध्याहृत्त ) के रूप " इति कश्चिदाशङ्केत, अतस्तनिवारणायाह में है । अथवा पर्यायके भेदसे पर्यायीका भेद होने के भाष्यकारः" (पूर्वार्ध पृ० २५) कारण सूत्रकार पर्याय अन्य है और भाष्यकार पर्याय "सत्यपि प्रमाणनयनिर्देशसदसदाद्यनेकानुयोगअन्य है । अतः 'शास्ति' क्रियाका कर्ता सूत्रपयोय है। द्वारव्याख्याविकल्पे पुनः पुनस्तत्र तत्रैतदेव द्वयमुपन्य दूसरा स्थल द्वितीय अध्यायके ४५ वें सूत्रकं स्यन् भाष्याभिप्रायमाविष्करोति सूरिः ।" (पू०पृ० २९) भाष्यमें प्रयुक्त हुए 'कार्माणमाह' इस वाक्यस संबंध "तत्रेदं सूत्रं वाक्यान्तरनिरूपणद्वारेण प्राणायि रखता है, जिसकी टीकामें सिद्धसेनगणी लिखते हैं- सूरिणा।” (पू०प० ३२) "सूरिराह-अत्रोच्यते ।" (पू० पृ० ४१) “सूत्रकारादविभक्तोऽपि हि भाष्यकारी विभाग सिद्धसेनगणीकी टीकामें ऐसे अनेक स्थल हैं जो मादर्शयति, व्युच्छित्तिनयसमाश्रयणात् ।" खासकर 'सूरि' शब्दसे सूत्रकर्ताके वाचक हैं अर्थात्-भाष्यकार सूत्रकारसे अभिन्न होता तथा सूत्रकार के लिये 'सत्रकार' और भाष्यकारक हुआ भी अपनेको भिन्न प्रकट कर रहा है, यह पयो- लिये 'भाष्यकार' शब्दके स्पष्ट प्रयोगको लिये हुए हैं। यार्थिकनयके आश्रयको लिये हुए कथन है। इससे मालूम होता है कि सिद्धसेनगणीकी उक्त इन दोनों स्थलोंपर उत्पन्न होनेवाली सन्देहकी मान्यता सन्देहको लिए हुए लोकदिखाऊ थी । ऐसी रेखा और खींचातानी द्वारा उसके परिमार्जनकी चेष्टा हालतमें 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये' इस पद स्पष्ट है। इनमेंसे पिछले स्थलके 'सूत्रकारादविभक्तो को सिद्धसनगणीका मान लेनेपर भी यह कैसे निश्चित ऽपि हि भाष्यकारः' इस वाक्यखण्डको उद्धृत करके रूपसे कहा जा सकता है कि उनका अभिप्राय 'उमाउत्तरलेखक (प्रो० सा०) ने अपने कथनकी बड़ी स्वातिवाचकोपज्ञ' विशेषणको भाष्यके साथ लगाने भारी प्रामाणिकता बतलाई है और ऐसा भाव व्यक्त का था ? यदि उनको वह विशेषण भाष्यके साथ भी किया है कि मैं जो कुछ लिख रहा हूं वह अखंड्य है! लगाना अभीष्ट होता तो वे उसे सत्रकी तरह भाष्यक यह देखकर मुझे बड़ा अफसोस होता है कि ऐसे भी साथ लगाकर दो पद अलग अलग दे देते अथवा शब्दमात्रप्रेक्षी लेखक कैसे कैसे निंद्य धोखेमें स्वतः 'उमास्वातिवाचकोपज्ञे' और 'सत्रभाष्ये' ऐसे दो फँसकर दूसरोंको भी फँसाते हैं ! सिद्धसेनगणीकी पद लिख देते । परंतु इन दोनोंमेंसे एक भी बात Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४० अनेकान्त [ वर्ष ४ प्रश्न से ऐसा मालूम होता है कि आपने यह सयुक्तिक सम्मतिका उत्तरलेख प्रायः आँख मीचकर लिखा है; क्योंकि 'सूत्रभाष्ये' पदमें जब भाष्य शब्द स्पष्ट दिखाई देरहा है तब उक्त प्रश्नको लिये हुए आपकी उक्त लिखावटको आँख मीचकर लिखी जाने के सिवाय और क्या समझा जा सकता है । सिद्धसेनगरणीने की नहीं, ऐसी हालत में अर्थात संदिग्ध अवस्था में ' उमास्वातिवाचकोपज्ञ विशेषण भाष्य के लिये लागू नहीं हो सकता, और इसलिये मैंने — उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये ' इस वाक्यको जो प्रथमाका द्विवचन लिखा है वह सर्वथा व्याकरण के कायदेको लिये हुए है । इसको जो 'व्याकरणशून्यता' लिखते हैं वे स्वतः व्याकरणज्ञानसे शून्य जान पड़ते हैं । मैंन सप्तम अध्यायके उस सन्धिवाक्यका अर्थ देते हुए, जिसमें विवादस्थ पदका प्रयोग हुआ है, एक जगह ‘ उसमें ( उनमें ) ' अर्थ लिखा था, इस पर प्रा० सा० पूछते हैं कि - " उसमें यह अर्थ कहाँ से आगया ?” इसका समाधान इतना ही है कि यदि कोई संस्कृतका अच्छा जानकार होता तो वैसा अर्थ स्वयमेव कर लेता । परन्तु आपकी समझमें वह अर्थ नहीं आया और मुझे मुख्यतया आपकों ही समझाना है अतः आप समझिये - संस्कृत या और भी भाषाओं में जो वाक्य होते हैं वे सब साक्षेप होते हैं । यहाँ प्रकृत में जो यह वाक्य है कि ' और भाष्य सूत्र हैं' इसमें सूत्र और भाष्य कर्ता हैं, कर्ता हमेशा क्रियाकी अपेक्षा रखता है अतः 'है' यह क्रिया अग त्या अध्याहृत है । जब प्रकृतमें ' सूत्र और भाष्य हैं' ऐसा वाक्य सिद्ध होजाता है तो फिर उसके आगे ' भाष्यानुसारिणी टीका है ' यह वाक्य विन्यस्त है; तब स्वतः ही दोनों वाक्योंका संबंध मिलानेवाला अर्थात् सापेक्ष वाक्य जो ' उसमें ' ( उनमें ) है वह सम्बंधित होजाता है । अतः यहां भाषापरिज्ञानी को यह शंका नहीं होती कि 'उसमें' या 'उनमें' यह अर्थ कहाँ से आ गया । और इसलिये उक्त शंका निर्मूल है। इसी प्रकार आगे चलकर आप पूछते हैं कि 66 उक्त अर्थ में 'भाग्य' शब्द कहाँ से कूद पड़ा ?" इस इसी प्रकृत विषय के संबंध में आपने एक विचित्र बात और भी लिख मारी है, और वह यह है कि "उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये' पदमें 'उमास्वातिवाचकांपज्ञ' जो उद्देश्य है वह अपने विधेय 'भाष्य' पदके साथ तो अवश्य ही जायगा, चाहे थोड़ी देर के लिये वह 'सूत्र' के साथ न भी जाय" यह आपका वचन वास्तव में सहास्य व्याकरणशून्यताका सूत्रक है । अपने इस कथन के समर्थनमें आपने कोई भी हेतु नहीं दिया, निर्हेतुक होने से आपका कथन प्रमाण कोटि में नहीं आ सकता । श्राश्चर्य है आपके साहस को जो आपने भटसे ऐसा लिख मारा कि जिस विशेष्य से विशेषण संबद्ध है उसके साथ तो वह न भी जाय और दूरवर्ती विशेष्य के साथ उछलकर संबद्ध होजाय ! यह सब आपकी विचित्र कथनी आप सर.खों के ध्यान - शरीफ में भले ही आए परंतु विज्ञोंके ध्यानसे तो वह सर्वथा बाह्य ही है और उसे कोई महत्व नहीं दिया सा सकता । इसी प्रकरण में आपने यह भी लिखा है कि 'अर्हत्प्रवचन' शब्द भी नपुंसकलिंग है, फिर उसे भी प्रथमाका द्विवचन क्यों न माना जाय ?” इसका समाधान एक तो यह है कि - 'तत्वार्थाधिगमे' पदके अनंतर कदाचित् वह पद ( अर्हत्प्रवचने) होता तो मान भी लिया जाता, परंतु यहाँ वैसी वाक्यरचना नहीं है । अतः वैसे अर्थका टति अर्थावबोधकत्व न 66 Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] सयु० स०पर लिखे गये उत्तरलेखकी निःसारता ४४१ होनेसे उसे प्रथमाका द्विवचन न मानकर सप्तम्यन्त दूरवर्ती 'भाष्यका' का विशेषण नहीं हो सकता किंतु पद मानना ही उचित है । दूसरे, यदि उसको प्रथमा निकटवर्ती 'सत्र' का ही हो सकता है। दूसरे, उस का द्विवचन मान भी लिया जाय तो वह 'सूत्रभाष्य' पदको 'सप्तम्यन्त' ही माननेका यदि आग्रह हो तो पदका विशेषण होनेसे यह अर्थ होगा कि तत्वार्थसूत्र वह पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारके कथनानुसारक और भाष्य ही 'अर्हत् प्रवचन' हैं-दूसरे आगमादि षष्ठी तत्पुरुषका ही रूप सबसे प्रथम संभवित है; ग्रंथ अर्हत्प्रवचन नहीं हैं। आगमादि ग्रंथांके साथ कारण कि शीघ्र शाब्दबोधकतामें षष्ठीतत्परुषकी वह 'अर्हत् प्रवचन' शब्द देखा भी नहीं जाता। अतः तरफ़ सबसे पहले दृष्टि जाती है. और तब उस पदका ऐमा महान् अनथ न हो जाय इसके लिये ही 'तत्वा- अर्थ यह हो जाता है कि-'उमास्वाति वाचक-विरर्थाधिगमे' पदके पूर्व 'अर्हत् प्रवचने' पद विन्यस्त चित तत्वार्थसत्रके भाष्यमें'। इस अर्थस यह स्पष्ट किया गया है, जिसका तात्पर्य यही है कि वह पद प्रतीत होता है कि भाष्यकर्ता तत्वार्थसूत्रकर्तासे जुदे सप्तमीका ही समझा जाय और इस तरह उससे कोई हैं । अनः कहना होगा कि दोनों विभक्तियोंमेंसे काई अनर्थ घटित न होजाय। भी विभक्ति लीजाय-परंतु प्रो० सा० की एककर्तृत्व इसी प्रकरणमें पो० साहबने एक बात यह भी की अभीष्ट सिद्धि किसीसे भी नहीं बन सकती। पूछी है कि "उस भाष्यका कर्ता कौन है जिस पर दूसरे, 'तुष्यतु दुर्जनन्यायसं' यदि यह मान भी ग्रंथकार टीका लिग्व रहे हैं ?" इसका जवाब ऊपर लिया जाय कि सिद्धसन गणी दोनोंका एक कर्तृत्व ही आ चुका है, जिसका आशय यह है कि भाष्यमें मानते थे' तो वे आपके मतानुसार भले ही मानें, उन कारिकाओं के विपरीत 'वक्ष्यामः' जैसे बहुवचनान्त के माननेकी कीमत तो तब होती जब कि वे उस क्रियापदोंका प्रयोग पाया जाता है, इसलिये भाष्यके विषयमें किसी प्रबल हेतुका स्पष्ट उल्लेख करते; परन्तु कर्ता उमास्वाति न होकर कोई दूसरे ही हैं और वे उन्होंने वैसा कोई उल्लेख किया नहीं तथा भाष्यकार संभवतः अनेक हैं। स्वतः अपनेसे सूत्रकारको जुदा सूचित करते हैं, तो फिर इस प्रकरणमें 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसत्रभाष्ये' ऐसी दशामें सिद्धसेनगणीकी वैसी मान्यताकी कीमत पदको लेकर द्वंद्वसमासगत सप्तमी विभक्ति माननेकी भी क्या हो सकती है और उससे भाष्यविषयक जो आपकी धारणा थी उसका खंडन ऊपर अच्छी प्रचलित संदिग्धताका निरसन भी कैसे बन सकता है ? तरह किया जा चुका है अर्थात् वह पद वहाँ सप्तमीके इसे विज्ञ पाठक स्वयं समझ सकते हैं। रूपमें ठीक बैठता नहीं किंतु प्रथमाका द्विवचन ही अतः इस दूसरे प्रकरण में भी उत्तररूपसे जो ठीक बैठता है। कदाचित् उसे सप्तमीका एक वचन बातें कही गई हैं उनमें कुछ भी सार नहीं है और भी माना जाय तब भी वह हो उत्तर उस पक्षमें दिया न उनके द्वारा भाष्यको 'स्वोपज्ञ' तथा 'अहत्प्रवचन' जा सकता है, क्योंकि समाहारद्वंद्व में वह सप्तमीका ही सिद्ध किया जा सकता है । एक वचनान्त माना जा सकेगा तो वहाँ संदिग्ध *विशेष ऊहापोहके लिये देखो 'अनेकांत' वर्ष ३ कि० १२ अवस्थामें 'उमास्वातिवाचकोपज्ञ' यह विशेषण पृ० ७३५ पर परीक्षा नं. ३ Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४२ अनेकान्त [वर्ष ४ (२) वृत्ति (३) वृत्ति नंबर ३ में 'अवस्थितानि' शब्दकी व्याख्याके सम्बन्ध सयुक्तिक सम्मतिमें इस वृत्ति-प्रकरणको लेकर से द्रव्योंकी इयत्ताका प्रमाण छह है इस प्रकारका यह लिखा गया था कि 'वृत्ति' शब्दसे राजवार्तिकमें वर्णन आया है। उसीको लेकर शंकाकारकी शंका है श्वेताम्बर भाष्य नहीं लिया है किन्तु पं० जुगलकिशोर कि-' वार्तिके वा वार्तिकभाष्ये भवता उक्तानि जीन जो शिलालेखादिके आधारसे बात मानी है वह धर्मादीनि षड् द्रव्याणि परंतु वृत्तौ (सूत्ररचनायां) ठीक है। उसके लिये मैंन जा हेतु दिये थे उनमस धर्मादीनि पंचैत्र अतः कदाचित् तानि पंचत्वं न एक 'वृत्ति' के अर्थ-द्वारा उस विषयके संगत मागेको व्यभिचरन्ति' इस प्रकार गजवार्तिकके भाष्यगत बतलान रूप था, उसके खंडनका उत्तर लेखकने जो शंकाका विस्तारस स्पष्टीकरण है, जिसको कि मैंन प्रयास किया है वह अविचारित होनेसे बेपायेका जान संक्षेपस वार्तिकके शब्दोंका पृथक २ शब्दार्थकरके पड़ता है। कारण कि राजवार्तिकमें 'वृत्ति' शब्दको वार्तिकके भाष्यका अभिप्राय 'सयुक्तिक सम्मति' में लेकर षडव्यके अभावकी शंका की है, वहां 'वृत्ति' लिखा था। उसका उत्तरलेखकने मेरे पाण्डित्यका शब्दसे अकलंकने श्वेताम्बर भाष्यको ग्रहण नहीं नमूना, तोड़-मरोड़ कर दूषित अर्थ करना तथा अककिया है। इसमें एक हेतु तो यह है कि श्वेताम्बर लंकदेवके भाष्यसे अपना अलग भाष्यरचना आदि संप्रदायमें उस भाष्यकी पहले तो 'वृत्ति' शब्दसे बतलाया है और इस प्रकार बिना विचारे कितना हो प्रख्याति ही नहीं है। दूसरे, वृत्ति और भाष्य एक अनाप-सनाप लिख माग है ! यदि मेरे उस अर्थमें अर्थक वाचक हैं, इस लिये कदाचित् श्वेताम्बर भाष्यके अभिप्रायसे कोई असंगतता बतलाई होती सम्प्रदायक किसी आचार्यने उसको 'वृत्ति' भी लिख तब तो उत्तर लेखकका यह सब लिखना भी वाजिब दिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं; तथापि राजवार्तिकके समझा जाता; परंतु जो आंख मीचकर लिखे उसका पंचमाध्यायके उस प्रकरणमें श्वेताम्बर भाष्यका कुछ क्या इलाज ? अस्तु, मैंने वार्तिकका 'वृत्तौ तु पंच भी सम्बंध नहीं हैं । राजवार्तिकमें अकलंकदेवन यदि अवचनात् षड्द्रव्योपदेशव्याघातः' ऐसा पदच्छेद कर श्वेताम्बर भाष्यके सम्बंधको लेकर द्रव्योंके पंचत्व- के जो यह हिन्दी अर्थ किया था कि-'वृत्तिमें (सूत्र विषयकी शंका उठाई होती तो उसका समाधान भाष्य रचनामें) तो पांच हैं, अवचन होनेसे (छहद्रव्यका के ही किसी वाक्यसे वे करते परंतु उन्होंने वैसा न कथन न होनेस) छह द्रव्योंके कथनका व्याघात है करके उसका समाधान दिगम्बर सूत्रसे किया है, इस अर्थात् छह द्रव्योंका कथन बन नहीं सकता' इस से स्पष्ट है कि वह शंका दिगम्बर सूत्रकी रचना पर अर्थमें वार्तिक भाष्य के अभिप्रायसे क्या फर्क प्राता है । कारण कि नित्यावस्थितान्यरूपाणि' इस सूत्र है उसे विद्वान् पाठक मिलान कर संगत और असंतक तथा आगे भी बहुत दूर तक सूत्ररचना या सूत्रा- गतका विचार करेंगे ऐसी दृढ़ आशा है। नुपूर्वी में पांच द्रव्योंका ही कथन-आया है-छहद्रव्यों यहां इसी प्रकरणमें प्रो० साहब लिखते हैं कि का कथन नहीं आया है। " 'पंचत्ववचनात्' शब्दका अर्थ खींचतान कर यदि 'नित्यावस्थितान्यरूपाणि' इस सूत्रकी वार्तिक 'पंचतु अवचनात्' किया भी जाय तो उसका केवल Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] सयु० स० पर लिखे गये उत्तर लेखकी निःसारता ४४३ इतना ही अर्थ हो सकता है कि पांचका तो कथन अर्थ 'सूत्ररचना' दिया हो, वह तो और भी उपहासनहीं किया" । इस वाक्यमें आपने व्याकरण ज्ञान- जनक है, क्योंकि 'वृत्ति' शब्दका अर्थ एकाक्षरी कोष शून्यताकी एक बड़ीही भद्दी मिसाल उपस्थित की है; का विषय नहीं है किंतु अनेकाक्षरी कोषका विषय है। क्योंकि 'पंचत्ववचनात' का अर्थ जो पांचका तो मालूम नहीं जब 'वृत्ति' शब्द साफ़ द्वचक्षरी ( अनेकथन नहीं किया ऐसा किया गया है वह व्याकरण काक्षरी) है तब उसके अर्थके लिये एकाक्षरी कोषका के कायदेसे सर्वथा अशुद्ध है। व्याकरणमें 'पंच' यह पता पूछनेकी निराली सूझ कहाँ से उत्पन्न हो गई ! प्रथमा का बहुवचन है, षष्ठीका रूप नहीं है, अतः इसे देखकर तो बड़ा ही आश्चर्य होता है ! क्या इसी 'पंच' इस प्रथमान्तका जो अर्थ 'पांचका' किया गया का नाम सावधानी है ? और इसी सावधानीके बलहै वह हो नहीं सकता। जब उस वाक्यका उक्त अर्थ बूतेपर श्राप विचारक्षेत्रमें अवतीर्ण हुए हैं ? तथा व्याकरणके कायदेस सर्वथा प्रतिकूल पड़ता है तब दूसरोंपर निरर्थक कटाक्ष करनेका अपनेको अधिकारी फिर जो अर्थ सयुक्तिक सम्मतिमें लिखा गया है वह समझते हैं ? विचारकी यह पद्धति नहीं और न अकलंकदेवके अभिप्रायको लिये हुए अनुकूल अर्थ है विचारकोंके लिये ऐसी बातें शोभा देती हैं। इस कथनमें कुछ भी आपत्ति मालूम नहीं होती। अतः ___अच्छा, कोषकी बात पूछी उसका जवाब यह है उस परस अलग भाष्य बनाने आदिकी जो उत्तर कि-'शब्दस्तोममहानिधि' चौड़ी साइजके पृ० ३७७ लेखकने कल्पना कर डाली है वह सब उसकी व्या को निकालकर देख लीजिये, उसमें वृत्तिका अर्थ केवल करणज्ञान-शून्यता और अविचारताका ही एक कृत्य 'रचना' ही नहीं कितु बारीकीस देखेंगे तो 'सूत्ररचना' जान पड़ती है। भी मिल जायगी; क्योंकि उस कोषमें रचनाके भेदोंमें ___ एक स्थानपर प्रोफेसर महाशय उपहासात्मक शब्दोंमें लिखते हैं- 'वृत्ति' का अर्थ एक 'सात्वती' रचनावा भेद भी है, 'सात्वती' की 'सूत्ररचना' करके तो सचमुच शास्त्री महोदयने कलम निष्पत्ति 'सत्' शब्दसे वतुप, अण और स्त्री प्रत्ययात् तोड़ दी है।" इसके उत्तर में इतना ही कहना पर्याप्त 'ङीप्' प्रत्ययसे हुई है। जिन्हें व्याकरणका विशाल होगा कि 'वृत्ति' का वैसा संभवित अर्थ करके सच- ज्ञान होगा उन्हें 'सात्वती' शब्दका अर्थ 'सौत्री' मुच ही सयुक्तिक सम्मतिके लेखकने श्राप सरीखे रचना मालूम पड़ सकता है क्योंकि 'सत्' शब्दका यक्तिशून्य लेखके लेखकोंकी तो क़लम ही तोड़ डाली अर्थ 'निष्कर्ष' और 'सार' रूप होता है और सूत्र भी है। क्योंकि उसका खंडनात्मक उत्तर आपकी शक्तिसे शाब्दिकमर्यादासे पदार्थोंकी (पदोंके अथकी) निष्कर्षबह्म है। ता-सारताको लिये हुए होते हैं । अतः 'सात्वती' और आपने 'वृत्ति' के अर्थक विषयमें कोषकी जो 'सौत्री' एक अर्थके वाचक हैं। दूसरे 'वृत्ति' शब्दका बात पूछी है वह आपके कोषज्ञानकी अजानकारीके 'सौत्री रचना' जो अर्थ किया गया है वह केवल कोषसाथ साथ वाक्यार्थोंके सम्बन्धकी भी अजानकारी बलसे ही नहीं किया गया किंतु उसका प्रकरणसे भी को सूचित करती है । और कोषकी बातमें जो ऐसे सम्बन्ध मिलता है, इसलिये उसका अर्थ प्रकरणएकाक्षरी कोषका पता पूछा गया है जिसमें 'वृत्ति' का संबद्ध भी है। कारण कि, राजवार्तिककार पंचत्व Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४४ अनेकान्त [ वर्ष ४ विषयकी शंकाका समाधान किसी राजवार्तिक, सर्वार्थ- वार्तिकमें 'वृत्ति' शब्द आजानस प्रा० सा० ने अपनी सिद्धि या श्वताम्बर भाष्य प्रादिक वाक्योंस न करके मान्यताके अनुमार जो यह लिख माग है कि "राजखास उमास्वामी महागजके सूत्रस कर रहे हैं। और वार्तिकमें 'वृत्तौ उक्त' कहकर जो वाक्य उद्धृत किये इसलिये प्रो० सा० का यह लिखना कि " 'वृत्ति' का हैं वे वाक्य न किसी सूघरचनाके हैं और न अनुपअथ 'सूत्ररचना' किसी भी हालत में नहीं हो सकता" लब्ध शिवकोटिकृत वृत्तिके, बल्कि उक्त वाक्य निरर्थक जान पड़ता है। हाँ, वह शंका यदि किसी श्वेताम्बरीय तत्त्व थ भाष्यक हैं" उसमें कुछ भी सार वृत्तिविशेषके विषयकी होती तो अकलंक उस वृत्त नहीं है । उसका निरसन सूत्ररचना-विषयक ऊप के के ही अंशस उसका समाधान करते । यहाँ शंकाका वक्तव्यसे भले प्रकार होजाता है । रही हाल में अनुपविषय मौलिक रचनास सम्बन्ध रखता है अतः उस लब्ध शिवकोटि कृतिकी बात, उसका सम्बन्ध शिला का समाधान मौलिक रचनापरस दिया गया है, जिस लेखस है, उसकी जब उपलब्धि होगी तब जैसा कुछ पर कोई आपत्ति नहीं की जासकती * । अतः राज- उसमें होगा उस समय वैसा निर्णय भी हो जायगा। * यहाँपर मैं इतना और प्रकट कर देना चाहता हूँ फिलहालकी उपलब्धिमें तो सूत्ररचना-विषयक संबंध कि स्वयं अकलंकदेवने राजवार्तिकमें अन्यत्र भी 'वृत्ति' ही अधिक संगत और विद्वद्-ग्राह्य जान पड़ता है। शब्दका प्रयोग 'सूत्ररचना' के अर्थ में किया है; जैसा कि यह नहीं हो सकता कि अकलंक देव शंका तो ठावें 'भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणां' इस सूत्रसम्बंधी छठे वातिकके श्वेताम्बर भाष्यके आधार पर और उसका समाधान निम्न भाष्यसे साफ़ प्रकट है, जिसमें 'देव' शब्दको अल्पा - क्षर और अहित होनेसे सूत्ररचनामें पूर्व प्रयोगके योग्य करने बैठे दिगम्बर सूत्रके बल पर ! ऐसी असंगतता बतलाया है, और इसलिये यहाँ प्रयुक्त हुए 'वृत्तौ' पदका और असम्बद्धताकी कल्पना राजवार्तिक-जैसी प्रौढ अर्थ · सूत्ररचनायां ' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हो रचनाके विषयमें नहीं की जा सकती। दूसरी बात सकता: "अागमे हि जीवस्थानादिसदादिष्वनुयोगद्वारेणाऽऽदेश- में 'नारक' शब्दका 'देव' शब्दसे पहले प्रयोग होना वचने नारकाणामेवादौ सदादिप्ररूपणा कृता, ततो नारक- चाहिये । ऐसी हालतमें यहाँ 'वृत्ति' का अर्थ 'श्वेताम्बर शब्दस्य पूर्व निपातेन भवितव्यमिति । तन्न किं कारणं भाष्य' किसी सूरत में भी नहीं हो सकता। क्या प्रोफेसर जगउभयलक्षणप्राप्तत्वाद्देवशब्दस्य । देवशब्दो हि अल्पाजभ्य- दीशचंद्रजी, जिन्होंने अपने समक्षा-लेख (अने० वर्ष ३ पृ० हिंतश्चेति वृत्तौ पूर्वप्रयोगार्हः।" ६२६) में ऐसा दावा किया था कि राजवार्तिकमें प्रयुक्त हुए यहाँ पर भी यह सब कथन दिगम्बर सूत्रपाठसे सम्बन्ध भाष्य, वृत्ति, अहत्प्रवचन और अर्हत्प्रवचनहृदय इन रखता है-श्वेताम्बर सूत्रपाठ और उसके भाष्यसे नहीं। सब शब्दोंका लक्ष्य उमास्वातिका प्रस्तुत श्वे. भाष्य है, क्योंकि श्वेताम्बर सूत्रपाठका रूप "तत्र भवप्रत्ययो नारक- यह बतलानेकी कृपा करेंगे कि यहाँ प्रयुक्त हुअा 'वृत्तौ' देवानाम्" है, जिसमें 'नारक' शब्द पहले हीसे 'देव' शब्द पद, जो विवादस्थ 'वृत्तौ' पदके समान है, उसका लक्ष्यभूत के पूर्व पड़ा हुआ है, और इसलिये वहाँ वह शंका ही अथवा वाच्य श्वेताम्बर भाष्य कैसे हो सकता है ? और उत्पन्न नहीं होती जो "श्रागमे हि" आदि वाक्योंके द्वारा यदि नहीं हो सकता तो अपने उक्त दावेको सत्यानुसन्धानके उठाई गई है और जिसमें यह बतलाकर, कि आगममें नाते वापिस लेनेकी हिम्मत करेंगे। साथ ही, जीवस्थानादिके आदेशवचनमें-नारकोंकी ही पहले सत् करेंगे कि अकलंकदेवने स्वयं 'वृत्ति' शब्दको 'सूत्ररचना' आदि रूपसे प्ररूपणा की गई है, कहा गया है कि तब सूत्र के अर्थ में भी प्रयुक्त किया है। -सम्पादक . Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ / किरण ८ ] सयु० स०पर लिखे गये उत्तरलेखकी निःसारता यह है कि श्वेताम्बर भाष्य में 'अवस्थितानि च' और 'न हि कदाचित्पंचत्वं भूतार्थत्वं च व्यभिचरंति' इस रूपसे दो वाक्य हैं, जबकि राजवार्तिक में 'वृत्तावुक्तं' के अनन्तर " अवस्थितानि धर्मादीनि नहि कदाचित्पं चत्वं व्यभिचरन्ति" इस रूपमें एक वाक्य दिया है। यदि कलंकदेव श्वेताम्बर भाष्य के उक्त वाक्योंको उद्धृत करते तो यह नहीं हो सकता था कि वे उन्हें ज्योंके त्यों रूपमें उद्धृत न करते । अतः यह कहना कि "इसी भाष्यसे उठाकर अकलंकदेवने अपने ग्रन्थ में 'उक्त' कहकर इस वाक्यको दिया है” नितान्त भ्रममूलक है । यदि 'वृत्ति' शब्द के अर्थों में से विवरण- भाष्य ही प्रो० सा० को अभीष्ट है तो उसका स्पष्टीकरण सयुक्तिक-सम्मति लेखके ६० वें पृष्ठ के टिप्पण से हो जाता है, जिसका स्पष्ट आशय यह है कि राजवार्तिक पत्र १९१ में 'आकाशग्रहणमादौ' इत्यादि ३४ वीं वार्तिक haar अर्थात् भाष्य में धर्मादिक द्रव्योंको संख्यावाचक 'पांच' शब्द से निर्देश किया गया है, उसका पाठ राजवार्तिक में 'स्यान्मतं धर्मादीनां पंचानामपि द्रव्याणां इस प्रकार है। अतः कहना होगा कि यहांके पंचत्वको लेकर ही 'नित्यावस्थितान्यरूपाणि' सूत्र के नं० ३ के वार्तिक और भाष्य में जो धर्मादि द्रव्यों को छहका निर्देश किया है उसीके ऊपरका शंका-समाधान उक्त सूत्रके वार्तिकनं० ८ और उसके भाष्य में दिया गया है, जिसमें शंका के समाधानका विषय राजवार्तिक के पूर्ववर्ती दिगम्बर तत्त्वार्थसूत्र के 'कालश्च' सूत्र से संबंध रखता है । अतः यहाँ श्वेताम्बर भाष्य की वार्ता तो कपूरवत् अथवा 'छूमंतर' की तरहसे उड़ जाती है— उसका इस राजवार्तिक के प्रकरण में कुछ भी स्थान नहीं है । इतने स्पष्टीकरण के होने पर भी प्रो० י| Syx ४४५ FRIV सा० के मस्तिष्क में यदि गजवार्तिक के उस वाक्यविषय में श्वेताम्बरभाष्य विषयक ही मान्यता है तो कहना होगा कि वह मान्यता आग्रहकी चरमसीमाका भी उल्लंघन करना चाहती है। क्योंकि अभी तक किसी भी पुष्ट प्रमाण द्वारा यह निश्चय भी नहीं हो पाया है कि श्वेताम्बरीय तत्त्वार्थभाष्यका समय $475 कलंक से पूर्वका है । हो सकता है कि प्रस्तुत श्वेताम्बर भाष्य की रचना गजवार्तिक के बाद हुई हो और उसमें वह पंचत्व विषयक वाक्य राजवार्तिक से कुछ परिवर्तन करके ले लिया गया हो, और यह भी संभव है कि दोनों ग्रंथों में उक्त वाक्योंकी रचना एक दूसरे की अपेक्षा न रखकर बिल्कुल स्वतंत्र हुई हो । श्वे०सूत्रपाठका 'यथांक्तनिमित्त: षड्विकल्पः शेषाणां ऐसा सूत्र है, उसके 'यथोक्तनिमित्तः' पदका श्वे० भाष्य में 'क्षयोपशमनिमित्तः' अर्थ किया गया है, परन्तु उस पदका वैसा अर्थ हो नहीं सकता । इससे पता चलता है कि यह अर्थ दिगम्बरीय सूत्र या उस के भाष्योंसे लिया गया है। इस प्रकार सूत्र और भाष्य के जुदे जुदे पाठ होनेसे दोनोंके एक कर्तृविकाभी विघटन हो जाता है । श्वे० भाष्य और सूत्र के एककर्ता नहीं हैं, इस विषय के बहुत से पुष्ट प्रमाण पिछले 'अर्हत् प्रवचन और तत्त्वार्थधिगम' नामक प्रकरण नं० २ में दिये जा चुके हैं, जिनसे पाठकगण अच्छी तरह जान सकते हैं कि श्वे० सम्प्रदाय में सूत्र और भाष्यकी एकताका जो ज्ञान है वह कितना भ्रमात्मक है । मेरी समझ में ऐसे आन्तरङ्गिक विषयोंका ज्ञानकेवल चर्म चक्षुके द्वारा देखे गये शाब्दिक कलेवर से नहीं हो सकता; किंतु उसके लिये अंतरंग प्रकरणकी संबद्धता - असंबद्धताका विवेक भी आवश्यक है, जो गहरे अध्ययन तथा मनन से सम्बन्ध रखता है । यहाँ Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४६ अनेकान्त [वर्ष ४ राजवार्तिकके 'पंचत्व' 'अवस्थितानि' आदि शब्द अपनी आम्नायका शास्त्र स्वीकार करने वाला क्यों भाध्यमें देखकर विना विचारे कह देना कि 'ये शब्द कर होजाता है, यह कुछ भी बतलाया नहीं गया। भाष्यके हैं अतः राजवार्तिकके सन्मुख भाष्य था' तीसरे, श्वे० भाष्य-सम्बन्धी शंकाका समाधान श्वे. केवल चर्मचक्षुकी दृष्टिके सिवाय और क्या कहा जा भाष्य अथवा श्वे० सूत्र पाठसे न करके दिगम्बर सूत्र सकता है ? यदि यहाँपर श्रान्तरंगिक दृष्टिसे विचार पाठसे करनेमें कौनसा औचित्य है, इसे जरा भी प्रकट किया गया होता तो स्पष्ट मालूम पड़ जाता कि इन नहीं किया गया । चौथे, यह दर्शाया नहीं गया कि का संबंध मुख्यतया सौत्रीय रचनासे अथवा राज- अकलंकने कब, कहाँ पर तत्त्वार्थसूत्र और श्वेताम्बर वार्तिक भाष्यसे है क्योंकि शंकाके समाधानका हेतु, भाष्यकी एककर्तृताको स्वीकार किया है । ऐसी हालत इस स्थलमें, दिगम्बरीय सूत्रपाठ है-श्वेताम्बरीय में प्रो० सा० का उक्त सारा कथन प्रलापमात्र अथवा भाष्यको ओई अंश नहीं है । और इसलिये प्रो० सा० बच्चोंको बहकान जैसा मालूम होता है और स्पष्टतया का यह लिखना कि “इस ('वृत्ति' शब्द ) का वाच्य कदाग्रहको लिये हुए जान पड़ता है । समाधान वाक्य काई ग्रन्थविशेष है और वह ग्रंथ उमास्वातिकृत में दिगम्बर सूत्रका प्रयोग होनेसे यह स्पष्ट जाना जाता (प्रस्तुत श्वेताम्बर) भाष्य है ।" किसी तरह भी है कि शंकाका सम्बन्ध दिगम्बर सूत्ररचनासे हैठीक नहीं बैठता। श्वेताम्बरसे नहीं। श्वेताम्बर से होता तो समाधानमें आगे चलकर प्रो० सा० जोरके साथ दसरोंको 'कालश्चेत्येके' सूत्र उपन्यस्त किया जाता, जिससे श्वे० यह माननेकी प्रेरणा करते हुए कि 'अकलंककी उक्त भाष्यविषयक शंकाका समाधान बन सकता । और शंका श्वे० भाष्यको लेकर है' उस शंकाके समाधान इसलिये 'वृत्ति' शब्दका वाच्य वहाँ श्वेताम्बर भाष्य न सम्बन्धमें लिखते हैं होकर दिगम्बर सूत्ररचना है, जैसाकि ऊपर स्पष्ट "अब यदि इस शंकाका समाधान अकलंक स्वयं किया जा चुका है। भाष्यगत 'कालश्चत्यके' सूत्रसे करते हैं तो इसका अर्थ एक जगह प्रो० सा० ने लिखा है कि-"प्रस्तुत यह हुआ कि अकलंक, दिगम्बराम्नायके प्रतिकूल प्रकरणमें खंडन-मंडनका कोई भी विषय नहीं है।" होने पर भी, भाष्यको सूत्ररूपसे स्वीकार कर लेते हैं यह लिखना आपका प्रत्यक्ष विरुद्ध है; क्योंकि 'श्रवतथा सर्वार्थसिद्धिगत दिगम्बरीय सूत्र 'कालश्च' ही है, स्थितानि' पदका 'धर्मादीनि षडपि द्रव्याणि' भाष्य जिसको सामने रखकर वे अपना वार्तिक लिख रहे किया गया है। उसका खंडन वादीके द्वाग किया गया हैं। ऐसी हालतमें 'कालश्च' सत्रही प्रमाणरूपस देकर और फिर उसका समाधान 'कालश्च' सूत्रके आधार शंकाका परिहार किया जाना उचित था, जो अकलंक पर किया गया। यह सब खंडन-मंडनका विषय नहीं ने किया है।" हुआ तो और क्या हुआ ? इसका असली मतलब प्रो० सा० की इस विचित्र लिखावटको देखकर खंडन-मंडन ही है क्योंकि शंका और समाधान तथा बड़ा ही आश्चर्य होता है ! प्रथम तो "भाष्यको सूत्र खंडन और मंडनमें अपने अपने पक्षकी सिद्धिके रूपसे स्वीकार कर लेते हैं" इस कथनमें आपके निमित्त हेतुओंको उपन्यस्त करना पड़ता है। अतः वचनकी जो विशृंखलता है वह भाष्य और सूत्रके शंका-समाधान रूपसे खंडन-मंडनका विषय है ही। जुदा जुदा होनेसे ही स्वतः प्रतीतिमें आजाती है। इतनी मोटी बात भी यदि समझमें नहीं आती तो फिर दूसरे, किसी ओम्नायका कोई व्यक्ति अपने शास्त्रके किस बूते पर विचारका आयोजन किया जाता है ? सम्बन्धमें यदि शंका करे और उसका समाधान उसी एक स्थान पर प्रो० सा० ने यह प्रश्न के शास्त्रवाक्यसे कर दिया जाय तो इससे समाधान कि "अकलंकने नित्यावस्थितान्यरूपाणि' सूत्रमें ही करने वाला उस शास्त्रका मानने वाला अथवा उसे द्रव्यपंचत्व-विषयक शंका क्यों उठाई ?" इत्यादि । Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८ ] इसका समाधान सिर्फ इतना ही है कि अन्यत्र शंका उठानेका स्थान उपयुक्त न होनेसे दूसरी जगह शंका नहीं उठाई। यहां 'अवस्थितानि' सूत्र के प्रकरण में द्रव्योंके छह पनेका कथन आया और ऊपर सूत्रानु पूर्वी रचना में तथा राजवार्तिक भाष्य में द्रव्यों के पंचस्व का कथन आया; अतः यहाँ शंकाका अवकाश होने से शंका उठाई गई, दूसी जगह वैसी शंकाका स्थान उपयुक्त न होनेसे नहीं उठाई गई। 'जीवाश्च' आदि सूत्र वैसी शंकाके उपयुक्त स्थान तो तब कहे जाते जब उनमें वैसा प्रसंग आता । वैसे प्रसंगके लानेका कार्य मेरे आपके हाथकी बात तो है नहीं, ग्रन्थ कर्ता को जिस जगह जैसा उपयुक्त जँचा वहाँ वैसा प्रकरण ले आए । अन्तमें प्रा० सा० लिखते हैं कि - " पूर्व लेख में बताया जा चुका है कि द्रव्य पंचत्वकी शंका दिगम्बरों के यहाँ इसलिये नहीं बन सकती कि उनके यहाँ तो निश्चित रूप से छः द्रव्य माने गये हैं, जबकि श्वे० उत्तरकालीन प्रन्थों में भी 'पंचद्रव्य' और 'षट्द्रव्य' की आगमगत दोनों मान्यताएँ मौजूद हैं ।" परन्तु यह लिखते हुए वे इस बातको भुला देते हैं कि उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया है कि उमास्वाति कालसहित छहों द्रव्य मानते हैं और अपने पिछले लेखा नं० ३ में 'सर्व षट्कं षडद्रव्यावरोधात्' इस भाष्य - वाक्य के द्वारा उस मान्यता की पुष्टि भी की है; तब वह पंचत्व की शंका भाष्य के ऊपर भी कैसे बन सकती है ? सयु० स० पर लिखे गये उत्तरलेखकी निःसारता. संशोधन गत किरणमें 'महाकवि पुष्पदन्त' नामका लेख कुछ अशुद्ध छप गया है। मात्रादिकके टूट जानेसे जो साधारण अशुद्धियां हुई हैं, उन्हें छोड़ कर शेष कुछ महत्वकी - द्वियोंका संशोधन नीचे दिया जाता है। पाठकगण इसके अनुसार अपनी अपनी प्रतिमें सुधार कर लेवें :पृ० कालम पंक्ति अशुद्ध ४०८ 9 १८ रोहिणीखेड ४०६ २ 8 काव्य ४१० , १८ करिसवहि ४११ 9 २८ सरक शुद्ध रोहनखेड कठव करिसर वहि सरस्वती समान मान्यता के होने पर एक स्थल पर उस शंकाका बन सकना और दूसरे पर न बन सकना बतलाना कथन के पूर्वापरविरोधको सूचित करता है। इसके सिवाय, मैंन 'मयुक्तिक सम्मति' नामके अपने पूर्व लेख ( अनेकान्त पृ० ८९, ९० ) में दिगम्बर सूत्र पाठके सम्बन्धमें इस शंका-समाधान के बन सकनेका जो स्पष्टीकरण किया था तथा औचित्य बतलाया था उस पर भी आपने कोई ध्यान नहीं दिया । और न यही सोचा कि एक ग्रन्थकार जो अपने मत या आम्नाय को लेकर प्रन्थकी रचना कर रहा है वह दूसरे मत अथवा आम्नाय वालों की खुद उन्हींके मत, आम्नाय अथवा प्रन्थ पर की गई शंकाकी संगति बिठलाता हुआ समाधान अपने ग्रन्थ में क्यों करेगा ? – उसे उसकी क्या जरूरत पड़ी है ? ऐसी हालत में आपका उक्त लिखना कुछ भी मूल्य नहीं रखता । ऊपर के इस सब विवेचनसे स्पष्ट है कि राजवार्तिकका उक्त शंका-समाधान सूत्ररचना तथा राजवार्तिकके भाष्यसे सम्बन्ध रखता है, उसमें श्वे० भाष्यका जो स्वप्न देखा जाता है, वह ग्रन्थको सम्बद्ध रूप से लगानेकी अजानकारी ही प्रकट करता है, और इसलिये इस तीसरे प्रकरण में प्रोफे० साहबने उत्तरका जो प्रयत्न किया है उसमें भी कुछ दम और सार नहीं है । (क्रमश:) २ ४ ४१२ कुरूप ४१३ १ २२ मणि 23 ร १ " ४१४ १ ४१५ २ ४१६ १ ३ कुन्दका ४१६ २ २१ ४१६ २ २५ ४१७ १ ३५ ४२० २ ३२ २३ कवयादियसहं कइवयदियहहं २६, २७ सुहयउ ३ भरता २३ सबसे शुद्धकुरूप मर्णे सहासता सुहयरु भरहा सबसे अधिक कुन्दग्वा गुणैर्भासिते गुणैर्भासिसो श्यामप्रधानः श्यामः प्रधानः धनधवलताश्चया धनधवलताश्रया सहायता - प्रकाशक Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन-दर्शन-स्तोत्र [पं० हीरालाल पांडे, सागर ] ___ [१] आज जन्म मम सफल हुना प्रभुअक्षय - अतुलित निधि • दातार ! नेत्र सफल हो गये दर्शसे[२] पाया है आनन्द अपार !! [३[ आज पंच - परिवर्तनमय यह आज नहाया धर्म - तीर्थमेंअति दुस्तर भव - परावार ! तेरा दर्शन पा साकार ! सुतर हुआ दर्शन से तेरे, गात्र पवित्र हुश्रा नयनों में, भटका हूं जिस में बहुवार !! [४] छाया निर्मल तेज अपार !! आज हुश्री यह जन्म सार्थक, सकल मंगलों का आधार ! तेरे दर्शन के प्रभाव से, ... पहुँचा मैं जग के उस पार !! [६] 6 आज कषाय-सहित कर्माष्टक आज हुए हैं सौम्य सभी ग्रह, का ज्वालाएँ विघटी दुखकार ! शान्त हुए मन के संताप ! ॐ दुर्गति से निवृत्त हुना मैं विघ्न-जाल नश गये अचानक, * तेरे दर्शन के आधार !! तेरे दर्शन के सुप्रताप !! अाज महाबन्धन कर्मों काबन्द हुआ, दुख का दातार ! सौख्य-समागम मिला जिनेश्वर ! [] तव दर्शन से अपरम्पार !! आज हुअा है ज्ञान-भानु का, आज हुा हूं पुण्यवान् मैं, उदय देह-मन्दिर में सार। . . दूर हुए सब पापाचार । तव दर्शन से हे जिनेन्द्रवर! मान्य बना हूं जग में स्वामिन् ! मिथ्या तम- का नाशनहार !! तेरा दर्शन पा अविकार !! आज हुई जिन - दर्शन - महिमा, अवगत मुझ को हे भगवान् ! सत्पथ साफ़ दिखाई पड़ता, खड़ा सामने है कल्याण !! # 'अद्याष्टक स्तोत्र का भाानुवाद Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तपोभूमि [ लेखक - श्री 'भगवत्' जैन ] आग के लिए ईंधन और व्यसन के लिए पैसा, ज्यादह होने पर भी ज्यादह नहीं । इसलिए कि इन दोनों के पास 'तृप्ति' नहीं होती ! इनके पास होती है। वैसी भूख, जो खाते-खाते और भी जोर पकड़ती है ! मथुराके प्रसिद्ध धनकुबेर - भानु जब वैराग्यको प्राप्त हुए, तब अपने पीछे पुत्रोंके लिए एक बड़ी रक़म छोड़ गए। लोगोंने अन्दाज लगाया - बारह करोड़ ! बारह करोड़ की पूंजी एक बड़ी चीज़ है । लेकिन व्यसन ने साबित कर दिखाया कि उसकी नज़रों में बारह करोड़की रकमका उतना ही महत्व है, जितना हमारे आपके लिए बारह रुपये का । उसे बारह अरब की सम्पत्ति भी 'तृप्ति' दे सकेंगी, यह निश्चय नहीं कहा जा सकता ! अखिर वही हुआ ! घरमें मुट्ठी भर अन्न और में फूटी कौड़ी भी जब नहीं रही तब सातों सहोदरोंने चोरी करना विचारा । व्यसनकी कालोंचने मन जो काले कर दिए थे, इससे अच्छा, सुन्दर विसार और निगाह में भर ही कौन सकता था ? रोजगार जो ठहरा, ललचा गया मन ! जोखिम की जरूर; पर, बड़ी रक्कमकी प्राप्तिका श्रीकर्षण जो साथ में नत्थी था - उसके ! और पुण्य-पाप की कमजोरियोंसे तो मन पहले ही जुदा होचुका था ! भानुसेट वैसम्म लाभ, या गृहत्यागका कारण भी यही था ! उन्हें किसी चतुर, अनुभवी ज्योतिषीने ! ला दिया था कि तुम्हारे सातों पुत्र व्यसनी होंगे, फिर परिश्रमापार्जित अतुल सम्पत्ति खोकर, चोरी करनेमें चित्त देंगे !' उन्हें यह सब, कब बर्दाश्त हो सकता था, कि उनके पुत्र दुराचारी, चोर और नंगे- भूखे कहाकर उन्हीं लोगोंके सामने आएँ, जो आज आज्ञाके इन्तज़ार में हाथ बाँधे खड़े रहते, या नजरसे नज़र मिलाकर उनसे बात नहीं कर सकते ! प्रारम्भ में बच्चों के सुधारका प्रयत्न किया ! प्रयत्न में डाट-फटकार, मार-पीट, प्यार-दुलार और लोभलालच सब कुछ इस्तेमाल किया ! लेकिन सफलता के नामपर इतना भी न हो सका - जितनी कि उड़द पर सफेदी ! आखिर हारकर, आत्म-कल्याणकी ओर उन्हें झुकना पड़ा | मानसिक पीड़ाने मन जो पका दिया था ! बड़ेका नाम था - सुभानु । और सबसे छोटेकासूरसेन । विवाह सातोंके होचुके थे । कुछ दिन खूब चैनकी गुज़री ! रसीली - तबियत, हाथमें लाख, दो लाख नहीं, पूरे बारह करोड़ की सम्पत्ति ! और उसपर स्ख्रर्चने खाने की पूर्ण स्वतंत्रता ! पिताका नुकीला अंकुश भी सिरपर नहीं रहा था ! और फिर वही हुआ, जो ज्योतिष शास्त्र ने पहले ही कह रक्खा था - यानी - सब चोर । x X X [२] उज्जैन के जंगल में पहुँचकर सबने विचारा - Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५० अनेकान्त - [वर्ष४ 'क्या करना चारिए ?' देर तक शकुन-अपशकुन और पुत्रीका नाम था-मंगीकुमारी ! मंगी-राजपुत्री आदि आवश्यकीय मसलों पर विचार होता रहा। थी, दर्प तेज ओन और अधिकार-बल सब-कुछ उस फिर जो बात निर्णयको पा सकी वह यह कि-छह मिला था ! अगर कुछ नहीं मिला था, तो राजपुत्रको जने धनकी प्राप्तिके लिए नगर-प्रवेश करें और एक 'स्वामी' कहने का सौभाग्य । उसकी शादी साम्राज्य के यहीं-जंगलमें ही-लौटने तक प्रतीक्षा करे ! परदेशः एक महाग्थीके साथ हुई थी । नाम था उसका का मामला, क्या जाने, क्यासे क्या हो ? हम सब 'वजमुष्टि। यहीं विपत्तिके महमें फँस जाँय, और घर तक खबर वजमुष्टि-योद्धा था, वीर था, महान् था, लेकिन भी न पहुँचे ! वे निरीह सात प्राणी अनाथ होकर, 'राजकुमार' नहीं था। किसी गज्यका उत्तराधिकार दाने दानेको तरसें; ऐसा मौका ही क्यों दिया जाए ? उसके लिए स्वाली नहीं था । शारीरिक सौन्दर्यमें और तब बड़ोंने आज्ञा दी-सूरसेनको, कि- अगर वह राजपुत्र था, तो आर्थिक दृष्टिकोण उसका 'तुम यहीं रहो !' छोटेका खयाल कर, या उसको प्रबल शत्रु ! अपने कामके अधिक उपयुक्त या अनुभवी न समझ मंगी के शरीर में था-राज-रक्त ! और वफामुष्टि कर, पता नहीं ! यों, वह भी यथासाध्य इस भया- की माँ के बदन में गुलामी का खून ! एक ओर च्छादित-धन्धेमें सहयोग देता रहा है ! पर, उतनेसे उत्थान था, दूसरी ओर पतन, एक ओर तेज था, उसके अग्रज सन्तुष्ट हुए या नहीं, यह अबतक वह दूसरी और करुणा, दीनता । नहीं जान पाया है ! कोई अवसर भी यह सोचनेका बहू और सासुमें मेल खाता तो कैसे ? यह सही नहीं मिला है-उसे! है कि सासु का दर्जा वैसा ही है, जैसा कि बेटे की ___ सुभानुके नेतृत्व में वह पाँच व्यक्तियोंका जत्था तुलनामें पिताका, या शिष्यके मुक़ाबिलेमें गुरुका । दबे पाँव, बन्द मुँह और जागती या सतर्क-दृष्टिको लेकिन-कब ? तभी न, जब बेटा या शिष्य उसे लिए-नगरकी ओर बढ़ा ! दूसरेके धनको 'अपना' महसूस करे! और महसूस कोई करता है तब, जब बना लेने के लिए ! व्यसनकी 'भूख' को 'तृप्ति' का उसे 'बड़ा' माननेमें उसे लज्जा नहीं, सुख मिले या स्वाद चखानेके लिए या उस महापापी स्याहीमें मिले-गौरवमय आनन्द। डूबनेके लिए, जो अक्सर अन्धेरी रातमें आत्माकी पर, मंगी एक क्षणको भी यह आनन्द उपभोग उज्ज्वलताको हनन कर देती है। न कर सकी ! किसी तरह भी वह यह न सोच सकी सूरसेन उसी निर्जन, भयावने जंगल में बैठ रहता कि सिर्फ 'वह' बन जाने-भरसे बह छोटी बन गई है-सहोदरोंके आदेशमें बद्ध । राज-पुत्री जो ठहरी। सजग, किन्तु मौन !!! ___ सासूके साथ उसका व्यवहार वैसा ही रहा, जैसा कि किसी भी बूढ़े-नौकर, बूढ़ी दासीके साथ सम्भव हो सकता है ! उज्जैनके महाराज-वृषभध्वज, रानी-कमला! था तो वज्रमुष्टिके साथ भी कुछ कड़ा बर्ताव ! x Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] तपोभूमि लेकिन ऐसा नहीं, कि ज्यादह कडुवा बन सकता ! उस घड़े फूल और गजरे रक्खे हैं-लेकर पूजासे क्यों कि वह पुरुष था ! पुरुष, सदासे ही नारीका ही निवृत्ति हो लूँ तब तक ।' 'प्रभु' रहा है ! और वह रही है हमेशा-गुलाम ! मिठास और दीनता ! यही दो-बातें तो मंगी उसकी मिहरबानीकी मुहताज ! साथ ही, पुरुषका चाहा करती थी। और सासु इन दोनोंस हमेशा जुदा मन सदास नारीके लिए नरम रहा है ! वह उसकी रह कर, स्वामित्व दिखानेकी आदी थी। आज जो डाट इपट कड़ी-नज़र और चुभती बातोंको भी सुन- यह परिवर्तन देखा तो मंगी-कामके लिए. 'न' न कर हँसते-हँसते पचा जानका आदी रहा है ! नारीके कर सकी। आकर्षणने बाँध जो रक्खा है-उस, और उसकी गजरा निकालनेके लिए-खुशी-खुशी हाथ घड़े सारी उग्र शक्तियोंको ! तिसपर वजमुष्टिको तो मंगीसे में डाल दिया।.. था प्रेम ! उसीके शब्दोंमें-ऐसा कि 'बिना उसके मिनिट बीता होगा, कि मंगी पछाड़ खाकर जमीन चैन नहीं !' अलावः प्रेमके, गौरव भी कम नहीं था पर गिरी । और निकलने लगा मुँहस, बेतहाशा उसे इसे इस बातका, कि उसकी स्त्री महागज वृषभ भाग। ध्वजकी प्यारी पुत्री और एक उच्च-घरानेकी राज- सासुने देखा- 'उसे कुछ न समझने वाली उद्दण्ड कुमारी है ! वह उसकी प्रसन्नताको अपना अहोभाग्य छोकरी, बेहोश पड़ी है !' समझता ! उसी तरह-जिस तरह एक दरिद्र मल्य- खुशीसे उसकी आँखें चमक उठीं! वान् वस्तुको पा लेने पर उसे अपनेसे अधिक लपक कर उसने घड़ेका मुंह बन्द कर दिया। हिफाजत और सँभाल के साथ रखता है। गुस्समें जला भुना साँप जो घड़ेमें कैद था। x x ___ पर, सासूके सामने ऐसी कोई बात नहीं थी ! वजमुष्टि था-बाहर ! महागजके साथ गया वह बहू की उद्दण्डता पर नाखुश थी। और असन्तुष्ट हुआ था-कहीं ! थी इस पर कि वह उस कुछ समझती नहीं । जब कि देवयोग !!! उसका फर्ज उसको पूजनेका, आदर करनेका है ! उसी रात वह लौट आया ! स्त्रीको न देख, उसने भीतर ही भीतर उसके दिन-रात लंका-दहन होता पूछा-'माँ ! कहाँ है-वह ?' रहता। __माँ अबतक रोनी-सूरत बनाए बैठी थी ! सुनी मनमें कसक, पीड़ा लिए, वह इस कष्टसे मुक्ति जो पुत्रकी बात तो गले पर काबू न रख सकी । . पानेके उपायमें लगी रहती ! पर, करे क्या..? एक बार खुल कर रोनेके बाद हिचकी लेते हुए ___ x x x x कहने लगी-'उसे साँपने काट लिया था ! उस दिन उपाय' सासूके सामने आगया, सफलता 'साँपने ?' .. या कामयाबीका जामा पहिनकर ! बड़ी खुश हुई हाँ ! आज हीकी तो बात है, सैकड़ों दवाएँ की, वह ! मिठास और दीनता-भरे स्वरमें बोली-'ला तो! फिर किया क्या...." Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५२ अनेकान्त [ वर्ष ४ 'लोग उसे श्मशानमें लेगए-वहीं गाड़ कर स्थ विराजे हुए हैं। अभी-अभी तो लौटे हैं । अचानक यह वजपात हुआ वजमुष्टिके कम्पित-शरीरमें बल-संचार हुश्राहै-बेटा। अशरण-शरण जो सहायतार्थ दृष्टिगत हो चुके थे। पर, वजमुष्टि हो रहा था मंगीके प्रेममें पागल । साधु-चमत्कारकी अचक गाथाएँ मनमें जागरित हो दौड़ा उधर ही, जिधर मंगी थी, श्मशान था- उठी। और आशाने दिया उन्हें प्रोत्साहन । भक्ति बेतहाशा पागलकी तरह। और श्रद्धास भीगा हुआ वजमुष्टि उठा । मंगीको यत्नपूर्वक गोदमें ले, चला योगीश्वरकी चरण-धूलिमें लिटानके लिए। अपनेको छिपाए, अपराधीकी तरह चुप- महानीदमें परिणत हो जानेके लिए लालायित सरसनने देखा-देखा मंगीको दफनाते हुए भी और मंगीका मूर्छित-शरीर वजमुष्टिने गुरु चरणकी शरण और वजमुष्टि द्वाग उसके संज्ञा-शून्य-शरीरको बाहर में डाल दिया । और कहने लगा, दीन और दुखे हुए निकालते हुए भी । उसका हृदय रो रहा था, मुंह पर स्वरमें-भगवन् ! तुम्हारी ही शरण है। मेरी प्राणहवाइयाँ उड़ रही रहीं थीं, हाथ काँप रहे थे। प्रियाको जीवन दान देकर मुझे सुखी बनाया । मेरी कह रहा था, दिलको हिला देने वाली आवाज व्यथा हरण करो । मैं सहस्र-दल-कमल समर्पण में- मैं तेरे बिना जिन्दा न रह सकूँगा-मगी! कर, अपनी भक्ति, श्रद्धा और खुशी प्रकट करनेका मुझे छोड़ कर कहाँ जा रही है ? मैं तुझे अकेला न अवसर पाकर अपनेको धन्य समझंगा । प्रभा ! जाने दूंगा, न जाने दूंगा, हरगिज न जान दूंगा।' प्रार्थनाको व्यर्थ न जाने दो। नहीं, मैं मंगीके बिना सूरसेनका हृदय काँप उठा।-कितना अगाध जीवित न रह सकूँगा। वह मेरी गुणवती, स्नेहशीला, प्रेम है उसे खीस ?...काश ! स्त्री अगर जीवित हो प्राणोपम प्राणेश्वरी है।' सकती ? देख सकती उसके वियोगमें पतिकी केसी सूरसेन एक टक देखता-भर रहा-चुप। उसके दयनीय-दशा हो रही है। कितनी अटूट-मुहब्बत है वियोगने मन जानें कैसा कर दिया है। उस, जो खुद मरने तकको तैयार हो बैठा है।' ___x. xxx पर, मंगी अडोल। मंगीने करवट ली, थोड़ी कराही और फिर उठ मौन ॥ बैठी । जैसे उसे कुछ हुआ ही न था, सोकर उठी हो। मृतप्राय ॥ तपोनिधिकी विषापहरण-ऋद्धिक प्रभावने निर्विष कर वजमुष्टि देर तक रोता रहा, अपनी जाँघ पर उठ-खड़े होनेका मौका दिया। और दी, वजमुष्टिको मंगीका सिर रक्खे हुए-करीब-करीब निरुपाय। मुंह-मांगी मुराद ! सीमान्त-खुशी ! और आनन्द' अचानक उसकी नजर जो सामने गई तो भीरू- विभोर कर देने वाली-प्रणय-भिक्षा !!! मनमें कुछ-कुछ आशा संचरित हुई। दोनों एकमेक । प्रेमालिंगन । तपोधन, ऋद्धिधारी, परम-दिगम्बर-साधु, ध्यान- जैसे जीवन और मृत्युका संगम हो । Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] तपोभूमि वजमुष्टिके वाष्पाकुलित कण्ठस निकला-'मंगी- भिखारिनकी तरह देखती रही सूरसेनकी ओर ! कुमारी।.." पलक मारनेकी सुधि उसे नहीं थी । हृदय, कामक ___ उसने कटीली-आंखोंसे ताकते हुए स्नेह-आह्नित नुकीले-वाणोंसे आहत हो चुका था । स्वरमें कहा-'तुम आगए ?' वह जैसे फिर बेहोश होने जारही थी। x x x . x और सूरसेन सोच रहा था-'श्रोफ ! वासना[५] आग ? 'छलमय नारी हृदय ।' मंगीकी चैतन्यताने सूरसेनको भी कम आनन्दित कि लाजकी हत्याकर, निर्लज्ज-मंगी पैरों पर नहीं किया । यही तो उसकी भी साध थी, कि मंगी गिर पड़ी, और कहने लगी-'प्यारे ! मुझे प्यार पति-प्रेमको समझ सके ।... ___ करो। मैं तुम्हारे प्रेममें पागल हुई जा रही हूं । मैं जंगलकी हरी-हरी घासपर मंगी बैठी पतिकी तुम्हारे बिना न बनूंगी, तुम्हारे रूपने मुझे बेहोश प्रतीक्षा कर रही थी । वजमुष्ठि गया था-साधुः कर दिया है।' अर्चन के लिए, सहस्र दल-कमल लेने। सूरसेन अडिग। मंगी अकेली थी। युवक-तेजसे संयुक्त ! सहसा सूरसेनके मनमें आया- वजमुष्टिका सोचने लगा-'जब परीक्षा ली है तो पूरी ही प्रेम तो देखा । क्या मंगी भी उसे इतना ही प्यार होनी चाहिए।' . करती है ? क्या यह वैसी ही है, जैसा कि वजमुष्टि फिर बोला-'मैं भी तुम्हारे ऊपर मोहित हूँसमझे हुए है ?' सुन्दरि ! लेकिन मजबूर हूँ, कि मैं तुम्हें प्रेम नहीं कौतुकने उसके मनमें जिज्ञासा भर दी । वह कर सकता।' बढ़ा, अपने छिपे-स्थानसे शंका-समाधान के लिए। क्यों ???'-मंगीने पूछा। और जा खड़ा हुआ, अलक्षित - भावसे मंगीके 'इसलिए कि तुम्हारा पति बलवान है, मैं उसे समीप।... अपने लिए खतरा समझता हूं, डरता हूं उससे ।। मंगीने देखा, और देखते-देखते जैसे वह समा मंगी हँसी । फिर बोली-'उसकी ओरसे तुम गया उसके हृदयमें ! वह चकित, चंचल और उद्विग्न बेफिक्र रहो। वह तभी तक जिन्दा है, जब तक मैं हो उठी। उठती उम्र, गोग-लुभावक-शरीर, और उधर देखती नहीं।' सुन्दर वेष भूषा। सांचा-'हो न हो, राजकुमार है सूरसेन हट गया। कोई। __ भक्ति और हर्षसे पूर्ण वजमुष्ठि पत्र-पुष्प और निर्निमेष देखती रही, कुछ देर । मंत्रमुग्धकी सहस्र-दल-कमल लेकर आ पहुंचा था। सरसन अवाक् । मंगीने पतिके साथ-साथ गुरुपूजन किया, वंचना मके भीतर जैसे पीड़ा जाग पड़ी कह दीन- की, स्तवन पढ़ा। और जब वह पुष्पांजलि क्षेपण Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५४ अनेकान्त [वर्ष ४ करनेके बाद गुरुचरणोंमें झुका, कि मंगीने समीप बोलनेकी युक्ति उसे सूझी ही नहीं ! रक्खी तलवार उठा कर चाहा कि गर्दन पर घातक कहने लगीं-'जब 'वे' ही नहीं रहे तो हमें ही प्रहार करे । कि किसीने पीछेसे कसकर कलाई पकड़ घरमें रहना कहाँ शोभा देता है ?' ली। तलवार ऊँची की ऊँची रह गई ! -और सब, सातों, स्त्रियाँ आर्यिकाजीके निकट पलट कर देखा तो-सूरसेन ! दीक्षित होने चली ! तलवार उसने छीन कर एक ओर रखदी । और रह गया अकेला सुभानु ! चल दिया, मंगीकी ओर धिक्कारकी नजरोंसे देखता चार छह दिन बीते । तबियत न लगी! मजबूरन हुआ! ___ उसने भी विराग स्वीकार किया । निर्विकार-साधु ध्यानस्थ थे। वजमुष्टिने बार बार सिर झुकाया, प्रणाम किया और तब, मंगीका ले, समोद घर लौट गया। बहुत दिन बाद, एक दिनxx. xx घूमते-फिरते सातों साधु और सातों अर्यिकाएँ उज्जैन श्रापधारे! छहों-अनुज सम्पत्ति लेकर वापिस आये, तो दर्शकोंके ठठ लग गए ! वजमुष्टि भी आया, और सूरसेनको उन्होंने गंभीर, सुस्त और उदास पाया मंगी भी ! गया । पूछा, तो उसने मंगीकी देखी हुई कथाको वजमुष्टि बैठा, साधु-सभामें । और मंगी अर्यिदोहरा दिया! . काओं के संघमें। . सभानुको छोड़ कर, सब पर गहरा प्रभाव पड़ा। देवयोग ।। सोचने लगे सब-धिक्कार है दुनियाके चरित्रको! दानोंने एक ही समयमें, एक ही प्रश्न कियाजिस स्त्री-पुत्र के लिए हम रात दिन पाप करते हैं, 'इतनी-सी उम्र में ही आप लोगोंन क्यों वैराग्य लिया?' हिसा करत है, चारा करते है, वह कोई अपना नहीं। उत्तरम मंगीकी कथा कह कर साधवनने समासब अपने स्वार्थ और वासनाके दास हैं !' धान किया। सुभानुने बातको दफनानेके इरादेस कहा-'छोड़ा वजमष्टि दंग रह गया! 'क्या मंगीका प्रम झगड़ेको । बाँट होने दो, काकी रकम हाथ लगी है दम्भ था ? वह हत्या कर रही थी मेरी ? वाहरे आज तो?' . संसार ! तभी साधु-जन इसे ठुकराकर वैराग्यकी ओर छहोंने मन्शा प्रकट की बढ़ते हैं !... 'हमें अब कुछ नहीं चाहिए। न धन-दौलत, न और उधर-मंगी लज्जाके मारे मर मिटी ! स्वार्थी-संसार ! आत्म-आराधनके लिए तपोभूमिमें चाहती-धरती फट जाय, और वह उसमें समा सके! प्रवेश करेंगे, ताकि विश्व-बन्धनसे मुक्ति मिल सके।' अनुतापसे उसका मुँह बुझे-कोयलेकी तरह हो छोटोंको, विरागकी ओर बढ़ते हुए भी सुभानुके गया ! सोचने लगी-'जो हुआ है, वह नारी-धर्मके मनमें आत्म-जागृति न हुई । धन जो सामने पड़ा था! विरुद्ध हुआ है । उसका प्रतीकार सिर्फ वैराग्य-लाभसे वह सब सम्पत्ति ले घर चला। . ही हो सकता है-अब !' X X X X X X X X घर आया, तो यहां भी उसे वैसा ही दृश्य और तब, उपस्थित जनताने देखा-'मंगी और देखना पड़ा । सब स्त्रियोंने अपने-अपने पतिकी वजमुष्टि दोनों वस्त्राभरणी का त्याग कर, साधुचरण कुशल पूछी। उत्तरमें सुभानुने सच ही कहा । झूठ के समक्ष तपोभूमिमें प्रवेश कर रहे हैं-प्रसन्न चित्त ! Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महाकवि पुष्पदन्त [ लेखक - श्री पं० नाथूराम प्रेमी ] www m [गत किरण से श्रागे ] I ८-समय- विचार महापुराणकी उत्थानिकामें कविने जिन सब ग्रंथों और प्रन्थकर्ताओं का उल्लेख किया है, " उनमें सबसे पिछले ग्रन्थ धवल और जयधवल हैं पाठक जानते हैं कि वीरसेन स्वामीके शिष्य जिनसेन ने अपने गुरु की अधूरी छोड़ी हुई टीका - जयधवला १ अकलंक, कपिल (सांख्यकार), कणचर या कणार (वैशेषिकदर्शनकर्त्ता ), द्विज (वेदपाठक), सुगत (बुद्ध), पुरंदर ( चार्वाक ), दन्तिल, विशाख (संगीतशास्त्रकर्ता ), भरत (नाट्यशास्त्रकार), पतंजलि, भारवि, व्यास, कोइल (कुष्माण्ड कवि), चतुर्मुख, स्वयंभु, श्रीहर्षद्रोण, बाण, धवल जयधवलसिद्धान्त, रुद्रट्, और यशश्चिन्ह, इतनोंका उल्लेख किया गया है । इनमें से अकलंक, चतुर्मुख और स्वयंभु जैन हैं । अकलंक जयधवलाकार जिनसेन से पहले हुए हैं । चतुर्मुख और स्वयंभूका ठीक समय अभी तक निश्चित नहीं हुश्रा है परन्तु स्वयंभू अपने पउमचरियमें श्राचार्य (रविषेणका उल्लेख करते हैं जिन्होंने वि० सं० ७३३ में पद्मपुराण लिखा था)। इससे उनसे पीछेके हैं। उन्होंने चतुमुखका भी स्मरण किया है। स्वयंभू अपभ्रंश भाषाके ही महाकवि थे । इनके पउमचरिउ (पद्मचरित ) और हरिवंशपुराण उपलब्ध हैं। उनका एक छन्दशास्त्र भी है, जिसके पहले तीन प्रकरण प्रो० वेलणकरने JBBRAS 1935 PP 18- 58 में प्रकाशित किये हैं। पंचमिचरियं' नामका ग्रन्थ भी उनका बनाया हुआ है, जो अभी तक कहीं प्राप्त नहीं हुआ है। स्वयंभू यापनीयसंघके अनुयायी थे, ऐसा महापुराण- टिप्पण से मालूम होता है f २ उबुझउ श्रयमसद्दधामु, सिद्धंत धवलु जयधवलुणामु । टीकाको श० सं० ७५९ में राष्ट्रकूटनरेश अमोघवर्ष ( प्रथम ) के समय में समाप्त की थी । अतएव यह निश्चित है कि पुष्पदन्त उक्त संवत् के बाद ही किसी समय हुए हैं, पहले नहीं । रुद्र का समय श्रीयुत् कारणे और दे के अनुसार ई० सन् ८०० – ८५० के अर्थात् श० सं० ७२२ और ७७२ के बीच हैं। इससे भी लगभग उपर्युक्त परिणाम ही निकलता है । अभी हाल ही डा० ए० एन० उपाध्येको अपभ्रंश भाषाका 'धम्मपरिक्खा नामका ग्रंथ मिला है जिस के कर्त्ता बुध (पंडित) हरिषेण हैं, जो धक्कड़वंशीय गोबर्द्धन के पुत्र और सिद्धसेन के शिष्य थे । व मेवाड़ देशके चितौड़ के रहनेवाले थे और उसे छोड़कर कार्यवश अचलपुर चले गये थे । वहांपर उन्होंने वि०सं० ३ श्राचार्य श्रमितगतिकी संस्कृत 'धर्मपरीक्षा' इसके बाद बनी है । हरिषेणकी धर्मपरीक्षा के भी पहले जयराम नामक कविका गाथावद्ध कोई ग्रन्थ था जिसके श्राधारसे उक्त धम्मपरिक्खा लिखी गई है जा जयरामें श्रासि विरइय गाइपबंधें । सामि धम्मपरिक्व सा पद्धड़िया बंधे ॥ संस्कृत धर्मपरीक्षा इन दोमेंसे किसी एकका अनुवाद होना चाहिए । ४इद्द मेवाडदेसे जणसंकुले, सिरि उजपुरणिगय धक्कडकुले ।'' गोवद्धणु णामें उप्पण्णश्रो, जो सम्मत्तरयणसं पुण्णश्रो । तो गोवद्धा सुपि गुणवद्द, जा जिणवर पय णिच्च विपणवइ । ताए जाणिउ हरिसेण णामसुश्रो, जो संजाउ विवुहकइविस्सुश्रो Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५६ . अनेकान्त [ वर्ष ४ १०४४ में अपना यह ग्रन्थ समाप्त किया था। राष्ट्रकूटोंकी राजधानो पहले मयूरखंडी (नासिक) इस ग्रन्थके प्रारंभमें अपभ्रंशकं चतुर्मुख, स्वयंभू में थी, पीछे अमोघ वर्ष ( प्रथम ) ने श० सं० ७३७ और पुष्पदन्त इन तीन महाकवियोंका स्मरण किया में उस मान्यखेटमें प्रतिष्ठित की । पुष्पदन्तने कृष्णगया है २ । इससे सिद्ध है कि वि० सं० १०४४ या राजकी राजधानी भी मान्यखेट ही बतलाई है और श० सं० ९०९ से पहले पुष्पदन्त एक महाकविक रूप कण्हराय को वहां का राजा बतलाया है जो कि में प्रसिद्ध होचुके थे। अथात् पुष्पदन्तका समय ७५९ कृष्णराजका प्राकृतरूप हैऔर ९०९ के बीच होना चाहिए । न ता उनका ता उनका सिरिकण्हगयकरयलणिहिय आसिजलवाहिणि दुग्गयरि ममय श०सं०७५९ के पहले जा सकता है और न धवलहरसिहरिहयमेह उलि पविउल मण्णखेडणयरि ॥ ९०९ के बाद। -नागकुमारचरित अब यह देखना चाहिए कि वे श० सं० ७५९ अर्थात् कण्हगयकी हाथी तलवाररूपी जलवाहिनी (वि० सं० ८९४ ) से कितने बाद हुए हैं। से जो दुर्गम है और जिसके धवलगृहोंके शिखर मेघा कविन अपने ग्रन्थोंमें तुडिगु', शुभतुंग, वलीस टकराते हैं, ऐसी बहुत बड़ी मान्यखेट नगरी है। वल्लभनरेन्द्र ५ और कण्हरायका उल्लेख किया है। ____ राष्ट्रकूटवंशमें कृष्ण नामके तीन राजा हुए हैं, और इन सब नामों पर ग्रन्थोंकी प्रतियों और टिप्प एक तो वे जिनकी उपाधि शुभतुंग थी । परन्तु इनके णप्रन्थोंमें 'कृष्णराजः' टिप्पणी दा है। इसका अर्थ समय तक मान्यखेट राजधानी ही नहीं थी, इसलिए यह हुआ कि ये सभी नाग एक ही राजाके हैं। पुष्पदन्तका मतलब इनसे नहीं हो सकता। वल्लभराय या वल्लभनरेन्द्र राष्ट्रकूट राजाओंकी पदवी द्वितीय कृष्ण अमोघवर्ष (प्रथम ) के उत्तराधिथी, इसलिए यह भी मालूम होगया कि कृष्णराय कारी थे, जिनके समयमें गुणभद्राचार्यने श० सं० राष्ट्रकूटवंशके राजा थे। ८२० में उत्तरपुगणकी समाप्ति की थी। और जिन्होंने सिरिचित्तउडु चएवि अचलउरेहो,ग उणियकर्जे जिणहरपउरहो। श० सं०८३३ तक राज्य किया है। परन्तु इनके साथ तहिं छंदालंकारपसाहिइ, धम्मपरिक्ख एह ते साहिय । सामानोंका मेल नहीं खाना १ विक्कमणिव परियत्तइ कालए, ववगए वरिस सहसचउतालए। उल्लेख किया है। इसलिए कृष्ण तृतीयको ही हम २ चउमह कव्वविरयणे सयंमुवि, पुप्फयंतु अण्णाणणिसभुवि। उनका समकालीन मान सकते हैं। क्योंकितिण्णाव जोग्गजेणतं सासइ, चउमुहमुहे थिय ताम सरासह । जो सयंमु सोहेउ पहाणउ, अहकह लोयालोय वि याणउ। १-जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है पुप्फयंतु णवि माणुसु बुच्चइ, जे सरसइए कयावि ण मुच्चइ। चोलराजाका सिर कृष्णराजने कटवाया, इसके ३ भुवणेक्करामु गयाहिराउ, जहिं अच्छा 'तुडिगु'महाणुभाउ। प्रमाण इतिहासमें मिलते हैं और चोल देशको जीत भ० पु० १-३-३ कर कृष्ण तृतीयने अपने अधिकारमें कर लिया था। ४ सहतुंगदेवकमकमलमसलु, णीसेसकलाविण्णाण कुसलु। २-यह चोलनरेश परान्तक ही मालूम होता है म. पु० १-५-२ ५ वल्लभणरिंदघर महत्तरासु । ६ उव्वद्धजूडु भूभंगभीसु, तोडेप्पिणु चोलहो तणउ सीसु । Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] महाकवि पुष्पदन्त ४५७ जिसने वीरचोलकी पदवी धारण की थी। में शुरू को गई थी, उसी संवत्सरमें सोमदेवसूरिने ३-धारानरेश-द्वारा मान्यखेटके लूटे जानेका अपना यशस्तिलक चम्पू समाप्त किया था और उस जो उल्लेख पुष्पदन्तने किया है ', वह भी कृष्ण द्वितीयके समय कृष्णतृतीयका पड़ाव मेलपाटीमें था। पुष्पदन्त साथ मेल नहीं खाता । यह घटना कृष्णराज तृतीय ने भी अपने ग्रंथप्रारंभके समय कृष्णराजका मेलपाटी की मृत्युके बाद खोट्टिगदेवके समय की है और इस में रहने का उल्लेख किया है। साथ ही इस प्रशस्तिमें की पुष्ट अन्य प्रमाणों से भी होती है । धनपालने उनको चोल श्रादि देशोंका जीतनेवाला भी लिखा है। अपनी 'पाइयलच्छी (प्राकृतलक्ष्मी) नाममाला' में ऐसी दशामें पुष्पदन्तका कृष्णतृतीयक समयमें होना लिखा है निःसंशयरूपसे सिद्ध होजाता है । वह प्रशस्ति यह हैविक्कमकालस्य गए अउणुत्तीसुत्तरे सहस्सम्मि। "शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेष्वष्टस्वेकाशीत्य - मालवणरिंदधाडीए लूडिए मण्णखेडम्म ।।२७६॥ धिकंषु गतेषु अंकतः ८८१ सिद्धार्थसंवत्सरान्तर्गत अर्थात् वि० सं० १०२९ में जब मालव नरेन्द्रने त्रमासमदनत्रयोदश्यां पाण्ड्य-सिंहल-चोल-चेरममान्यखेटको लूटा, तब यह ग्रंथ रचा गया। प्रभृतीन्महीपतीन्प्रसाध्य मेलपाटीप्रवर्द्धमानराज्यप्रभाव मान्यखेटको किस मालव-राजाने लूटा इसका श्रीकृष्णराजदेवं सति तत्पादपद्मोपजोविनः समधिगत पता परमार राजा उदयादित्यके समयके उदयपुर पंचमहाशब्दमहासामन्ताधिपतेश्वालुक्यकुलजन्मनः(ग्वालियर ) के शिलालेखमें२ परमार राजाओंकी मातामयोः श्रीमदरिकमरिणः प्रथमपुत्रस्य जो प्रशस्ति दी है उसके १२ वें पद्यसे लग जाता है श्रीमद्दिगराजस्य लक्ष्मीप्रवर्धमानवसुंधरायां गंग.. श्रीहर्षदेव' इति खोट्टिगदेवलक्ष्मी, धारायां विनिर्मापितमिदं काव्यमिति ।" ___ जग्राह यो युधि नगादसमप्रतापः । ___ अर्थात् शक ८८१ सिद्धार्थसंवत्सरकी चैत्र-मदन अर्थात हर्षदेवने खोट्टिगदेवकी राजलक्ष्मीको त्रयोदशीके दिन जब श्रीकृष्णराजदेव पाण्ड्य-सिंहल, युद्ध में छीन लिया। चोल, चेरम आदि राजाओंको जीतकर मेलपाटीमें ये हर्षदेव ही धारानरेश थे, जो सीयक (द्वितीय) अपने बढ़ते हुए राज्यका प्रभाव प्रकट कर रहे थे या सिंहभट भी कहलाते थे और, जैसा कि पहले तब उनके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले महासामबताया जा चुका है, जिनपर कृष्णतृतीयने चढ़ाई की न्ताधिपति चालुक्यवंशी अरिकेसरीके पुत्र वद्दिगराज थी। खोट्टिगदेव कृष्णतृतीय के भाई और उत्तरा की गंगधारामें यह काव्य निर्माण किया गया। धिकारी थे। __पहले उक्त मेलपाटीमें हो पष्पदन्त पहुँचे थे, ४-महापुराण की रचना जिस सिद्धार्थ संवत्सर सिद्धार्थ संवत्सरमें ही उन्होंने अपना महापुराण १ दीनानाथधनं सदाबहुजनं प्रोत्फुल्लवल्लीवन, प्रारंभ किया था और यह सिद्धार्थ श० सं० ८८१ मान्याखेटपुरं पुरंदरपुरीलीलाहरं सुन्दरम् । धारानाथनरेन्द्रकोपशिखिना दग्धं विदग्धप्रियं, ही था। मेलपाटी या मेलाडिमें श० ८८१ में कृष्णराज क्वेदानी वसतिं करिष्यति पुनः श्रीपुष्पदन्त: कविः ।। थे, इसके और भी प्रमाण मिले हैं जो ऊपर दिये २ एपिग्राफिश्रा इंडिका जिल्द १ पृ. २२६ जा चुके हैं। Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [ वर्षे ४ इन सब प्रमाणों से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते भरतकी प्रशंसाके हैं । ग्रन्थरचनाक्रमसे जिस तिथिको हैं कि श० सं०८८१ में पुष्पदन्त मेलपाटीमें भरत जो संधि प्रारंभकी गई, उसी तिथिको उसमें दिया महामात्यसे मिले और उनके अतिथि हुए । इसी हुआ पद्य निर्मित नहीं हुआ है। यही कारण है कि साल उन्होंने महापराण शुरू करके उसे श० सं० सभी प्रतियोंमें ये पद्य एक ही स्थान पर नहीं मिलते ८८७ में समाप्त किया। इसके बाद उन्होंने नागकुमार हैं। एक पद्य एक प्रतिमें जिस स्थान पर है, दूसरी चरित और यशोधर चरित बनाये । यशोधर चरित प्रति में उस स्थान पर न होकर किसी और स्थान पर की समाप्ति उस समय हुई जब मान्यखेट लूटा जा है। किसी किसी प्रतिमें उक्त पद्य न्यूनाधिक भी हैं। चुका था। यह श० सं०८९४ के लगभगकी घटना अभी बम्बईके सरस्वती-भवनकी प्रतिमें हमें एक है। इस तरह वे ८८१ से लेकर कमसे कम ८९४ तक पूग पद्य और एक अधूरा पद्य अधिक भी मिला है* लगभग तेरह वर्ष मान्यखेटमें महामात्य भरत और जो अन्यप्रतिया में नहीं देखा गया। ननके सम्मानित अतिथि होकर रहे, यह निश्चित है। यशोधरचरितकी दूसरी तीसरी और चौथी सन्धियोंमें भी इसी तरह के तीन संस्कृत पद्य नन्नकी उसके बाद वे और कब तक जीवित रहे, यह नहीं प्रशंसाके हैं जो अनेक प्रतियों में हैं ही नही । इमसे कहा जा सकता। यही अनुमान करना पड़ता है कि ये सभी या अधि___ बुधहरिषेणकी धर्मपरीक्षा मान्यखेटकी लूटके कांश पद्य भिन्न भिन्न समयोंमें रचे गये हैं और कोई पन्द्रह वर्ष बादकी रचना है। इतने थोड़े ही प्रतिलिपियाँ कगते समय पीछे से जोड़े गये हैं । सरज़ समयमें पुष्पदन्तकी प्रतिभाकी इतनी प्रसिद्धिहोचकी यह कि 'दीनानाथधनं' आदि पद्य मान्यखेटकी लटके बाद लिखा गया और उसके बाद जो प्रतियाँ थी । हरिषेण कहते हैं, पुष्पदन्त मनुष्य थोड़े ही हैं, लिखी गई, उनमें जोड़ा गया निश्चय ही यह पद्य उसके उन्हें सरस्वती देवी कभी नहीं छोड़ती। पहले जो प्रतियाँ लिखी जाचुकी होंगी उनमें न होगा। एक शंका इस प्रकारकी एक प्रति महापराणके सम्पादक महापुराणकी ५० वीं सन्धिके प्रारंभमें जो 'दीना- डा० पी० एल० वैद्यको नाँदणी ( कोल्हापुर ) के श्री नाथधन' आदि संस्कृत पद्य दिया है और पृ० ४५७ तात्या साहब पाटीलसे मिली है जिसमें उक्त पद्य के फुटनोटमें उद्धत किया जा चुका है, और जिसमें नहीं हैं । ८९४ के पहलेकी लिखी हुई इस तरहकी मान्यखेटके नष्ट होने का संकेत है, वहश०सं०८९४ के * हरति मनसो मोई द्रोहं महाप्रियजंतुजं । बादका है और महापुराण ८८७ में ही समाप्त होचुका भवतु भविनां दंभारंभः प्रशांतिकृतो । जिनवरकथा ग्रन्थप्रस्नांगमितस्त्वया । था । तब शंका होतो है कि वह उसमें कैसे आया ? कथय कमर तोयस्तीते गुणान् भरतप्रभो । ___ इसका समाधान यह है कि उक्त पद्य ग्रन्थका -४२ वीं सन्धिके बाद अविच्छेद्य अंग नहीं है। इस तरहके अनेक पद्य अाकल्यं भरतेश्वरस्तु जयतायेनादरात्कारिता । महापुराणकी भिन्न भिन्न सन्धियोंके प्रारंभमें दिये। श्रेष्ठायं भुवि मुक्तये जिनकथा तत्त्वामृतस्यन्दिनी। पहला पद्य बहुत ही अशुद्ध है । -४३ वीं संधिके बाद गये हैं। ये सभी मुक्तक हैं, भिन्न भिन्न समयमें रचे ते x देखो महापुराण प्र. खं०, डा० पी० एल० वैद्य-लिखित जाकर पीछेसे जोड़े गये हैं और अधिकांश महामात्य भूमिका पृ० १७ Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] महाकवि पुष्पदन्त ४५६ और भी प्रतियों की प्रतिलिपियाँ मिल नेकी संभावना है। जिन भगवान के चरण कमलोंके प्रति हाथ जोड़े हुए एक और शंका अभिमानमेरु, धूतपंक (धुल गये हैं पाप जिसके ), 'महाकवि पष्पदन्त और उनका महापराण' और परमार्थी पुष्पदन्त कविने भक्तिपूर्वक यह काव्य शीर्षक लेख मैंने भाण्डारकर इन्स्टिटयट' पना बनाया। की वि० सं० १६३० की लिखी हुई जिस प्रतिके यहां वम्बईके सरस्वतीभवनमें जो प्रति (१९३ आधारसे लिखा था, उसमें पशस्तिकी तीन पंक्तियाँ क) है, उसमें भी यही पाठ हे और हमारा विश्वास इस रूपमें हैं है कि अन्य प्रतियोंमें भी यही पाठ मिलेगा। पप्फयंतकइणा धुयपंकें, जइ अहिमाण मेरुणामंकें। ऐसा मालूम होता है कि पूने वाली प्रतिके अर्द्ध कयउ कब्बु भात्तिए परमत्थें, छसयछड र कयसामत्थें।। दग्ध लेखकको उक्त स्थानमें मिती लिखी देखकर कोहण संवच्छरे आसाढए दहमएदियहे चंदरुइरूढए संवत-संख्या देनेकी जरूरत मालूम हुई होगी और ___ इमक 'छसयछडोत्तर कयसामत्थें' पदका अर्थ उमकी पूर्ति उसने अपनी विलक्षण बुद्धिसे स्वयं कर उस समय यह किया गया था कि यह ग्रंथ शकसंवत डाली होगी। ६०६ में समाप्त हुआ ' । परन्तु पीछे जब गहराईसे __ यहाँ यह बात नोट करने लायक है कि कविने विचार किया गया तब पता लगा कि ६०६ संवत् का सिद्धार्थ संवत्मग्में अपना ग्रंथ प्रारंभ किया और नाम क्रोधन हो ही नहीं सकता चाहे वह संबत हो. क्रोधन संवत्सरमें समाप्त । न वहाँ शक संवत दिया विक्रम संवत होगा या कलवित हो। और और न यहाँ । इसके सिवाय पुष्पदन्तके पूर्ववती इमलिए तब उक्त पाठके सही होने में सन्देह होने स्वयंभू ने भी अपने ग्रंथों में सिर्फ मिती ही दी है, लगा। 'छसयछडोत्तर' तो खैर ठीक, पर 'कयामत्थें' संवत् नहीं दिया है। अथे दुरूह बन गया । तृतीयान्त पद होनेके तीसरी शंका कारण उस कविका विशेषण बनानेके सिवाय और कविके समयके सम्बन्धमें एक शंका 'जसहर काई चाग नहीं था । यदि बिन्दी निकालकर उसे चरिउ' की उस प्रशस्तिके कारण खडी की गई जिस सप्तमी समझ लिया जाय, तो भी 'कृतसासर्ये' का में ग्रन्थ-रचनाका समय वि० सं० १३६५ बतलाया कोई अर्थ नहीं बैठता । अतएव शुद्ध पाठकी खोज गया है। वह प्रशस्तिपाठ यह हैकी जाने लगी। ____सबसे पहले पो० हीरालालजी जैनने अपने किउ उवरोहें जस्स कइयइ एउ भवंतर । तहो भव्वहु णाम पायडमि पयडउ धर ।।२९।। 'महाकवि पुष्पदन्तके समयपर विचार' लेख में बतलाया कि कारंजाकी प्रतिमे उक्त पाठ इस तरह चिरु पडणे छंगे साहु साहु, दिया हुआ है तहो सुउ खेला गुणवंतु साहु । तहो तगुरुह वीसलुणामसाहु, पुष्फयंत कइणा धुयपंकें, जइ अहिमाणमेरुणामकें। वीरोसाहुणि त्तिहि सुलहु णाहु ।। क्यउ कन्वु भत्तिए परमत्थे, जिणपयपंकयम उलियहत्थें । सोयार सुणणगुणगणसणाहु, कोहणसंवच्छरे आसाढए, दहमइ दिवहे चंदरुइरूढए ।। एक्कइया चिंतइ चिमि लाहु । अर्थात्, क्रोधन संवत्सरकी असाढ़ सुदी १० को हो पंडिय ठक्कुर कण्हपुत्त, १ स्व. बाबा दुलीचन्दजीकी ग्रन्थसूचीमें भी पुष्पदन्तका उवयारियवल्लहपरममित्त ।। समय ६०६ दिया हुआ है। कइपुप्फयंत - जसहरचरित्त, २ जैनसाहित्य संशोधक भाग २ अंक ३-४ । किउ सुट्ट सहलक्खण विचित्त । का श्रा Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४६० अनेकान्त [ वर्ष४ पेसहि तहिं राउलु कउलु अजु(?), जो चाहा था वही सब किया, राउ लु ( राजा और जसहरविवाहु तह जणिय चोज । कौलका प्रसंग), विवाह और भवांतर । फिर जब सयलहं भवभमणभवंतराइं , सामने व्याख्यान किया, सुनाया, तब बीसल साहु महु वंछि उ करहि णिरंतराई ।। सन्तुष्ट हुए । योगिनीपुर (दिल्ली) में साहुके घर अच्छी ता साहुसमीहिउ कियउ सव्वु , तरह सुस्थितिपूर्वक रहते हुए विक्रम राजाक १३६५ राउलु विवाहु भवभमण भव्वु । संवत्में पहले वैशाखके दूसरे पक्षकी तीज रविवारको वक्खाणिउ पुरउ हवेइ जाम, यह कार्य पूरा हुआ।" संतुट्ठल वीसलु साहु ताम । _ "पहले कवि (वच्छगय) ने जिसे वस्तु छन्दबद्ध जोइणिपुग्वरि णिवसंतु सुट्ट , किया था, वही मैंने पद्धड़ीबद्ध रचा।" साहुहि घरे सुत्थियणहु धुट, ॥ ___ "कन्हड़के पुत्र गन्धर्वन स्थिर मनसे भवांतरोंको पणमट्ठिसहिय तेग्हसयाई , कहा है। इसमें कोई मुझे दोष न दे। क्योंकि पूर्वमें णिवविक्कम संवच्छरगया । वच्छगयने यह कहा था। उसीके सूत्रको लेकर मैंने वसाहपहिल्लइ पक्खि बीय, कहा है।" रविवारि समित्थउ मिस्स तीय ।। इसके आगेका घत्ता और प्रशस्ति स्वयं पुष्पदन्त चिरु वत्थुबंधि कइ कियउ जंजि, कृत है जिसमें उन्होंने अपना परिचय दिया है। पद्धडियबंधि मई रइउ तंजि । पूर्वोक्त पद्योंस बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि गंधव्वे कण्हड णंदणेण , गन्धर्व कविने दिल्ली में पानीपत के रहने वाले बीसलअायहं भवाइं कियथिरमणेण । साहु नामक धनीकी प्रेरणासे तीन प्रकरण स्वयं बना महु दोसुण दिज्जइ पुट्विं कइउ, कर पुष्पदन्तके यशोधर चरितमें पीछेस सं० १३६५ कइवच्छराई तं सुत्त लइउ । में शामिल किये हैं और कहाँ कहाँ शामिल किये हैं, इसका भावार्थ यह है सो भी यथास्थान ईमानदारीसे बतला दिया है। "जिसके उपरोध या आग्रहसे कविपतिने यह देखिएपूर्वभवोंका वर्णनकिया(अब मैं) उस भव्यका नाम प्रकट १ पहली सन्धिके चौथे कड़वककी 'चाएणकण्णु करता हूँ। पहले पट्टण' या पानीपतमें छंगे साहु नाम विहवेण इंदु' आदि पंक्तिके बाद आठवें कड़वकर्क के एक साहु थे । उनके खेला साहु नामके गुणी पुत्र ___ अन्त तककी ८१ लाइनें गन्धर्वरचित हैं जिनमें राजा हुए । फिर खेला साहु के बीसलसाहु हुए जिनकी अन्तमें कहा है ___ मारिदत्त और भैरवकुलाचार्यका संलाप है । उनके पत्नीका नाम वीरो था। वे गुणी श्रोता थे। एक दिन क दिन गंधव्वु भणइ मइं कियर एर,णिव जोईसहो संजोय भेउ त उन्होंने अपने चित्तमें सोचा (और कहा) कि हे कण्ह अग्गइ कइरायपुप्फयंतु सरसइणिलउ । . के पुत्र पंडित ठकुर (गन्धर्व) वल्लभराय (कृष्ण तृतीय) देवियहि सरूउ वण्णइ कइयणकुलतिलउ ॥ के परम मित्र और उपकारित कवि पुष्पदन्तने सुन्दर अर्थात् गन्धर्व कहता है कि यह राजा और और शब्दलक्षणविचित्र जो जसहरचरित बनाया __ योगीश (कौलाचार्य) का संयोग-भेद मैंने कहा । है उसमें यदि राजा और कौलका प्रसंग, यशोधरका अब आगे सरस्वतीनिलय कविकुलतिलक कविराज आश्चर्यजनक विवाह और सारे भवांतर और प्रविष्ट पुष्पदन्त ( मैं नहीं) देवीका स्वरूप वर्णन करते हैं। करदो, तो मेरा मन चाहा हो जाय । तब मैंने साहुने २ पहली ही सन्धिके २४ वें कड़वककी ‘णेढ१ 'पट्टण' पर 'पानीपत' टिप्पणी दी हुई है। त्तणि पुट्ठि पलट्ठियंगु' आदि लाइनसे लेकर २७ वें Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८ ] कड़वक तककी ७९ लाइनें भी गन्धर्व की हैं । इसे उन्होंने ७९ वीं लाइन में इस तरह स्पष्ट किया है । वाणि पुत्र इड, तं पेक्खवि गंधव्त्रेण कहिउ अर्थात् वासवसेने पूर्व में (ग्रन्थ) रचा था, उस को देखकर ही यह गन्धर्वन कहा' । ३ चौथा संधिक २२ में कड़बककी 'जज्जरि जेण बहुभेयकम्म' आदि १५ वीं पंक्तिस लेकर आगेकी १७२ लाइनें भी गन्धर्व की हैं। इसके आगे की कुछ लाइनें प्रकरण के अनुसार कुछ परिवर्तित करके लिखी गई हैं । फिर एक घत्ता और १५ लाइनें गन्धर्व की हैं जो ऊपर भावार्थ सहित दे महाकवि पुष्पदन्त १ श्रीवासवसेन के इस यशोधरचरितकी प्रति बम्बई के सरस्वतीभवन में ( नं ० ६०४ क) मौजूद है । यह संस्कृतमें है । इस की अन्तिम पुष्पिका में ' इति यशोधरचरिते मुनिवासवसेनकृते काव्ये... अष्टमः सर्गः समाप्तः' वाक्य है। प्रारम्भ में लिखा है 'प्रभंजनादिभिः पूर्वे हरिषेणसमन्वितैः यदुक्तं तत्कथं शक्यं मया बालेन भाषितुम् ।' इससे मालूम होता है कि उनसे पूर्व प्रभंजन और हरिषेणने यशोधरके चरित लिखे थे । इस कविने अपने समय और कुलादिका कोई परिचय नहीं दिया है । परन्तु इतना तो निश्चित है कि वे गन्धर्व कविसे पहले हुए हैं । इस ग्रन्थकी एक प्रति प्रो० हीरालालजीने जयपुरके बाबा दुलीचन्दजीके भंडार में भी देखी थी और उसके नोट्स लिये थे । हरिषेण शायद वे ही हों, जिनकी धर्मपरीक्षा (अपभ्रंश) अभी डा० उपाध्येने खोज निकाली है । २ अपरिवर्तित पाठ मुद्रित ग्रन्थ में न होनेके कारण यहाँ दे दिया जाता है सो जसंवइ सो कल्लाणमित्तु, सो अभयणाउ सो मारिदत्तु । वणिकुलपं कथबोदणदिणेसु, सो गोवड्ढणु गुणगणविसेंसु ॥ सा. कुसुमावलि पालियति गुत्ति, सा अभयमइत्ति रादिपुत्ति । भव्वइं दुण्णयणिण्णासणेण, तउ चयेवि चारु सण्णासणेण कालें जंन्ते सव्वइमयाई, जिणधम्में सग्गग्गहो गहाई ॥ ३ बम्बई के सरस्वतीभवनमें जो ८०४ क नं० की संस्कृत छायासहित प्रति है उसमें 'जिम्में सग्गग्गहो गद्दाई' के ४६९ इस तरह इस ग्रंथ में सब मिलाकर ३३५ पंक्तियाँ प्रक्षिप्त हैं और वे ऐसी हैं कि जरा गहराई देखने से पुष्पदन्ती प्रौढ और सुन्दर रचनाकं बीच छुप भी नहीं सकतीं । अतएव गन्धर्वकं क्षेपकोंके सहारे पुष्पदन्तको विक्रमकी चौदहवीं शताब्दि में नहीं घसीटा जा सकता । इसके सिवाय बहुत थोड़ी ही प्रतियों में सो भी उत्तर भारतकी प्रतियों में यह प्रक्षिप्त अंश मिलता है । बम्बई के तेरहपंथी जैन मन्दिरकी जो वि० सं० १३९० की लिखी हुई अतिशय प्राचीन प्रति है, उसमें गन्धर्वरचित उक्त पंक्तियाँ नहीं हैं, यहाँ के सरस्वती भवन दो पतियों में भी नहीं हैं। उपसंहार पूर्वोक्त तीनों शंकाओंका समाधान हो जाने के बाद अब हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि १ पुष्पदन्त. राष्ट्रकूटसम्राट् कृष्णतृतीय और उनके उत्तराधिकारी खोट्टिगदेव के समकालीन थे और श० सं० ८८१ से ८९४ तक उनके मान्यखेट में रहने के प्रमाण मिलते हैं। संभव है, कर्क (द्वि०) के समय में भी वे रहे हों । २ उनके आश्रयदाता महामात्य भरत कमसेकम ८०७ तक जीवित थे, जबकि महापुराण समाप्त हुआ । ३ नागकुमारचरित और यशोधरचरितकी रचना के समय भरतका स्वर्गवास हो चुका था और उनके पुत्र नन गृहमंत्री हो गये थे । यशाधरचरितकी सम्मप्ति मान्यखेट के बरबाद होजानेके बाद हुई जबकि कर्क ( द्वि० ) गद्दीपर होंगे । 11 श्रागे 'गंधव्वे कण्हडणंदणेण श्रादि केवल दो पंक्तियाँ प्रक्षिप्त पाठ की न जाने कैसे श्रा पड़ी हैं। इस प्रतिमें इन दो पंक्तियोंको छोड़ कर और कोई प्रक्षिप्त अंश नहीं है । Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रानी [ लेखक-'भगवत' जैन] [१] ____ लेकिन यह थी कौन, कोमलांगी, दयाको, ममताकी वह चाँद-सा सुन्दर बालक जब उसकी आँखोंके सामने देवी ?... श्राता, तो वह आन्द-विभोर हो जाती! तन-बदनकी सुध आन्दनवभार हा जाता! तन-बदनका सुष हाँ उसका नाम था-रानी! वह गौरवर्ण, सुन्दर हाँ उसका ना भूल जाती-कुछ देरके लिए-सृष्टिकी समस्त रचनाओंकी शरीर, नव-यौवना विल्लोचिन थी ! जी, हाँ ! वही विल्लोमधुरताको! चिने-जो अपनी बर्बरता, पशुता, नृशंसताके सबब-सब उसका धर्म, उसका कर्म, उसका सुख, उसकी के लिए अातंक होती हैं ! जिस शहरमें वे पहुँच जाती हैं, सम्पत्ति-सब कुछ बस, वही था, तीन सालका विकार वहाँके निवासी उनसे आँख मिलाने तककी अपनेमें शक्ति हीन बालक! वह उसकी मृदुल-मुस्कानमें स्वर्ग-सुखका अनुभव करती नहीं महसूस करते । उनसे लेन-देन या व्यवहारकी बात तो उसके करुण-क्रन्दनमें निष्ठुर-विधाताकी कुटिलताका दर्शन दूर ! शायद बहुत दूर !! करती! जब वह अपनी अनक्षरी-वाणीद्वारा अपने भावोंको दरअसल वे खौफ़नाक, लड़ाकू, दया-हीन और निन्द्यव्यक्त करनेका उपक्रम करता, तो वह हँसते-हँसते दोहरी प्रवृत्ति होती है! जिसने उनसे कुछ खरीदना चाहा, समझ पड़ जाती! जैसे सारे शरीरसे हँस रही हो! लीजिए कि उसकी शामत आगई ! ज्योड़े-दने दामोंमें उसे और बच्चा माँ को हँसते देखता, तो और भी बोलने वह चीज़ लेनी ही पड़ेगी, जिसके बारेमें जुबानसे वह कुछ का साहस करता! तब वह स्वर्गमें डूब जाती, संसारकी भी कह चुका है ! भले ही लड़ाई हो जाय, झगड़ा हो जाय, विषमता उससे दूर रहती! भीड़ जुड़ जाय ! पुरुषको दबानेकी एक तरकीब और वह उसे चूमती, प्यार करती और गोदमें दबोचलेती! इस्तेमाल करती हैं-वे ! कि-'मुझसे मखौल करता है !' बच्चेको थोड़ी तकलीफ करूर होती है, यह बात वह भूलती सच, वे ऐसी ही होती हैं ! उनमें कोमलता नामकी हीं ! लेकिन उसका मन जो अपने आपेमें नहीं रहता! कोई चीन लोग नहीं देखते ! लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही मन तो मचलकर कहता है-काश, वह उसे मनमें ही है ? क्या यही वास्तविक है, कि उनके हृदय नहीं होता ? बन्द कर सके ! पर इतना बड़ा समाये कैसे ? लाचारी तो और होता भी है तो उसके अन्दर दया नहीं होती ? क्या यही है! यह सम्भव है ? विश्वास किया जा सकता है ? क्या मजाल जो कभी एक उँगलीसे, मारनेके नाम अगर हाँ! तो फिर दयाको सार्व-धर्म क्यों कहा जाता से छुत्रा हो? यह बात नहीं कि सभी बातें उसकी उसे है ? विश्व-धर्म कहकर क्यों पुकारा जाता है ? पसन्द श्राती, नहीं; कुछ बुरी भी लगतीं, हल्का-पूरा गुस्सा . भी श्राता कभी-कभी! पर, वह उसे मारती हरिन न! श्राप उत्तर देंगे? दुलारा, प्यारा जो था, जी से भी ज्यादह ! Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण] रानी [ २] तो कल वहाँ! रानीने रो-रोकर श्रासान सिरपर उठा लिया! पर, xx क्या कुछ नतीजा निकल सकता था ? गया हुआ कभी लौटा भी है ? बहुत दिन बाद, एकदिनबात कुछ बड़ी नहीं थी ! मामूली बुखार था ! ऐसा, चार छः हमजोलियोंके साथ, रोजकी तरह रानी शिकार दो-एक बार पहले भी आ चुका था, नया थोड़ा था ! पर, की टोहमें निकली ! निर्जन-वन था ! पशु-पक्षी अपने मिले अबकी बार वह मौतको भी साथ ले आया, इसका किसी को पता न चला। हुए, थोड़े-से सुखमें निमग्न, परिवारके साथ मौज़की किल___ बुखारने जोर पकड़ा ! इधर था, सर्दीका मौसम ! हो कारियाँ भर रहे थे ! शहरके जन-रवसे दूर, वे अपनेको गया चट निमोनियाँ! दवाएँ हुई, दुआएँ माँगी गई, अनेक निराकुल और निरापद समझ रहे थे ! परन्तु क्या वह उपचार हुए ! परन्तु सब व्यर्थ! सब चेष्टाएँ निष्फल ! उस वष्टाए निष्फल ! उस तपोभूमि उनके लिए निरापद थी भी? योग का जीवन-काल सिर्फ तीन-वर्षकी अल्प-अवधिमें आवद्ध 'ठाँय !-की एक हल्की अावाज़के साथ एक सुन्दर था! भला टाला जा सकता था, वह ! परिन्दा ज़मीनपर श्रा गिरा! रानीने गुलेलको मुँहमें दबाया xxx रानीकी गोद सूनी होगई ! और साथ ही उसके लिए और अपने कठोर हाथोंसे लपक कर उसे उठा लिया ! सारी दुनिया, इस बड़ी-मी दुनियासे कहीं अधिक सुन्दर, देखा-'वह मर चका है ! फिर भी, यह आशंका न अधिक श्रानन्ददायी और अधिक मनोरम थी! ___ होनेपर भी कि वह उड़ सकता है, गर्दनको मरोड़ते हुए उसकी लावण्यता वासी-फूलकी तरह अशोभन होगई है ! न अब पहले-सी प्रफुल्लित रहती है, न मुग्ध ! यो उस निर्दयतापूर्वक झोलेमें डाल लिया और आगे बढ़ी ! जैसे का तारुण्य अब भी उसके पास है, कहीं गया नहीं ! लेकिन अभी उसकी नृशंसताको तृप्ति नहीं, भूख ब-दस्तूर हो! . अब उसमें उमंग नहीं, उत्साह नहीं; उसके रिक्त स्थान पर साथी-लोग दूरपर, अपनी-अपनी घातमें लगे हैं ! तीसरे-यन जैसी निराशा है ! किसीको इतना अवकाश नहीं, कि कौन क्या कर रहा है? उसके मनमें, मनके एक अधूरे कोने में, एक वेदना है, कसक है, एक घाव है ! जो उसे पनपने नहीं देता, देखे ! ज़रूरत भी क्या ? उसके तारुण्यको निखरने नहीं देता: मर्दा बनाए सघन-वृक्षके पत्तोंमें छिपा हुश्रा एक छोटा-सा नीड़! बैठा है ! जिसमें बैठे थे दो पक्षी! शायद कबूतर थे! दोनों अपनी वह मुँहपर उदासी पोते हुए, बैठी रहती है-सुस्त, छोटी-सी राजधानीके बादशाह थे ! लेकिन उनके सामने गुम-सुम ! निराशाकी प्रतिमूर्ति-सी । दिनका दिन बीत राजनैतिक उलझने नहीं थी ! उनका देश था-प्रेम, जाता है, रात भी पाती और खिसक जाती है ! पर वह है, कानून था-तौज और टैक्स था-अल्प-भोजन ! किसी हद जो न खाती है, न पीती! न हँसती न किसीसे बोलती तक वे सुखी थे, और सुखमें बैठे, चैनकी बंशी बजा रहे चालती ! हां, जब कभी रोते हुए उसे ज़रूर देखा गया है! थे! उन्हें खबर नहीं थी कि भविष्य उनके लिए क्या जीवन उसका अब दूसरी ओरको बह रहा है। पर वर्तमान बनाने में मशगूल हे ? वह उससे बेखबर नहीं! बहाये जारही है ! शायद सोच कि इसी समय रानीके गुलेलसे निकली हुई एक बैठी है-'चेष्टा कोई चीज़ नहीं, भाग्यनिर्णय बड़ी वस्तु है' कठोर कंकडीने बेचारेका प्राणान्त कर दिया! रोजके सधे दिन समीरकी गतिसे निकलते चले जारहे हैं ! विल्लो- हुए हाथ, क्या निशाना चक सकते थे? चियोंका काफला भी पर्यटन करता जारहा है, आज यहाँ वह रानी के पद-सन्निकट-जमीनपर-पड़ा तड़पने लगा, Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वर्ष ४ सुन्दर?' पंख तड़फड़ाने लगा; और लगा अपनी गोल-गोल नन्हीं कालपर किसका वश चला है ? क्या करती .. ? 'हाय !' आँखोंसे इधर-उधर देखने ! शायद किसीको खोजता हो! करके रह गई ! मिनिट-भरकी वेदनामय श्रायुमें क्या देखता, क्या सोचता ? पीड़ा मौतकी दूती बनकर जो आई थी! दो-बूँद आँसू रानीकी आँखोने बखेर दिये ! एक वेकलीकी तड़प! और उसी वक्त उसने देखा--बेचारी कबूतरी रो रही और बस, खतम ! है ! उसका वच्चा जो मर गया है ! उसकी आँखोंका तारा ! रानीने देखा-'वह एक कबूतरका बच्चा है, कैसा रानीके मनमें विद्रोह उठा--'उसका निर्दयी-काल तो तू है रानी, तू ! वह उठानेके लिए झुकी ! पर, यह क्या ? सिरके पास ____ वह एक दम रो पड़ी ! जैसे उसका बच्चा अभी ही खड़खड़ाहट कैसी है ? नज़र २ठाकर देखा तो एक या दो मरा है ! घाव कुरेदकर ताला बना दिया हो ! मां के हृदय कबूतरको शोक-विह्वल चक्कर काटते पाया-बेचैन बेखबर ! ने मांके हृदयकी व्यथाको पहिचान लिया! ___रानी क्षण-भर रुकी, और अपने विचारोंमें डूब गई उसने गुलेल उठा कर दूर फेंकदी, जैसे वह उसकी जैसे अथाह-जल में छोटी-सी कंकड़ी! . चीज़ ही नहीं थी। भूलसे किसीने उसके हाथमें थमा बच्चा मरा हुश्रा सामने पड़ा था ! उसकी ममतामयी मया दी थी! माँ-उसके विछोह-दुःखसे पागल हुई-उसे देख रही थी, विव्हला-कबूतरी इधर-उधर देखती रही, फिर वह सिर्फ देख ही रही थी, आँसू-भरी अॉखोंसे ! वाह ! उसे छु । इस अपने मृत-पुत्रके समीप आ बैठी ! लेने तकका उसे हक नहीं था, हिम्मत नहीं थी, अधिकार देखता कोई वह करुण-दृष्य ! दो मां-हृदयोंके बीच में नहीं था ! वह कभी दरख्त की इस टहनी पर, कभी उसपर! एक मृतक-पुत्रका निर्जीव-शरीर ! कभी बैठती, कभी उठती ! कभी भागी-भागी फिरती घंटों हो गए, पर रानी न उठी. अपने स्थानसे चिगी अन्तरिक्षकी छाती पर, बेतहाशा दौड़ती ! श्रोह ! उसे तक नहीं ! निर्जीव हो, पत्थरकी पुतली हो, या मिट्टीका ढेर ! क्षण-भर भी चैन नहीं! साथी पाए और जैसे-तैसे कर डेरे पर ले गए ! उसी अरे, उसे कैसी वेदना थी वह ! जड़ताके ढंगमें ! हृदयकी पकार हृदय तक पहुँचने लगी, शायद घायल नहीं कहा जा सकता-अब चैतन्य है वह, या तब की गति घायलने जान ली! जड़ थी? - रानीका कठोर-हृदय भी दयासे प्लावित होगया ! वह x x x x सोचने लगी-- उसके भी एक बच्चा था-ऐसा ही सुन्दर; ऐसा ही आँखें लाल हैं, शरीर तप रहा है ! बुखारकी तेज़ी कोमल, ऐसा ही प्यारा और ऐसा ही छोटा-मोटा, भोला-भाला! है ! रानी गुम-सुम पड़ी हैं ! किसीसे बोलती-चालती नहीं ! मगर...........! खाना-पीना तक छूट गया है ! केवल दूध उसका जीवन निर्दयी-कालने उसे न छोड़ा, उसके प्यारे बच्चेको देखते-देखते उठा लिया ! वह विवश रोती-कलपती रह गई! शामको बुखार जब ढीला पड़ता है, बोल सकनेकी Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] रानी ताक़त जब उसमें हो पाती है ! तब वह बैठ जाती है, रानी कहती है-'किसीको मारो मत, उन्हें भी तकलीफ़ उपदेशककी तरह ! और कहने लगती है-अपने दिलका . होती है !' दर्द, मानसिक-पीडाका अध्याय !-- बातें दोनों एक हैं--ज़रा भी फर्क नहीं! अजीब 'किसीको मारो मत ! उसके शरीर में भी दर्द होता है. समस्या है ! उसके माँ-बाप भी बेचैन होते हैं, उन्हें तकलीफ़ होती है ! रानीकी तन्दुरुस्तीके लिए, निन्दगीके लिए--सबने जान सबकी बराबर है ! उसका हुक्म मानना मंजूर किया ! _ विल्लोची सुनते तो दंग रह जाते । कुछ कहते-- x x x x 'लड़की कहती तो ठीक है !' पर कुछकी राय होती-- जिसने सुना, वही हैरत में प्रागया--विल्लोचियोंका 'बुखार-बीमारीसे दिमाग़ फिर गया है ! नहीं, ऐसी बातें यह काफला निरामिषभोजी है! वे शिकार नहीं करते, माँस सीखी कहाँ ? क्या हम नहीं हैं, सफ़ेद बाल हो चुके, इन ' सरेके बच्चेको अपना मानने में सुख पाते हैं ! बातोंको छुश्रा तक नहीं ! कोई कहता--'पिछले दिन तक और रानीको वे अपना 'गुरु' मानते हैं, देवी मानकर तो यह भी परिन्दे मार-मार कर राँधा करती थी, आज पूजते हैं, अवतार जान कर उसका आदर करते हैं ! रानी कहती है-किसीको मारो मत ! भई, खूब !' है उनकी मार्ग-प्रदर्शिका ! रानी जब ऐसी बातें सुनती तो उसका मन और भी रानीमें फिर ताज़गी लौट आई है ! वह प्रफुल्लित टूट जाता ! वह खाट पर लेटी-लेटी सोचती रहती-'क्या, रहती है ! उसे ऐसा लगने लगा है कि उसका बच्चा उसे ये भी मनुष्य हैं ? इन्सानियत-मानवता सिखाने आया था, तीन सालमें वह ___और उसका बुखार कोर पकड़ जाता ! माँ सिराहने सब-कुछ पढ़ा-लिखा गया ! उसकी आत्मामें रोशनी भर बैठी-बैठी बांसू बहाती, मिन्नतें मनाती--'मेरी रानी बच गया ! जाय ? अब, जब उसे अपने बच्चेकी याद आती है, तो उसी और बाप, दवाएं लाता, जड़ी-बूटी खोजता-फिरता! वत उस कबतरके बच्चेका चित्र भी आँखोंके श्रागे हो डाक्टर-हकीमके आगे दयाकी भीख माँगता, गिड़गिड़ाता, अाता है ? रोता-कलपता! और रानीका कोमल-मन पिघल कर आँसू बन जाता है! किसी तरह रानी बच जाय ! उसे हो क्या गया ?.... डाक्टरने बताया--'इसका दिल कमज़ोर हो गया है ? अवश्य कहा जा सकता है--कठोर-से-कठोर, कसाईमानसिक-पीड़ा है -इसे ! यह जो चाहे, इसे वही दो! कर्ममें निरत रहने वाले व्यक्तिके हृदयमें भी 'दया' नामकी इसके हृदयपर कुछ असर हुआ है, तुम लोग इसके हृदय कोई चीज़ रहती है फिर भले ही उसके प्रकारमें भेद हो, को न दुखाश्रो !' तरीकेमें तब्दीली हो ! कम-ज्यादह हो! दयाका ही दूसरा नाम है-मानवता !!! सब चौंके! और यों दया सार्वधर्म है, इसमें शक नहीं ! डाक्टर कहता है-'हृदयको न दुखाश्रो !' Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमिनिर्वाण-काव्य-परिचय (ले०५० पन्नालाल जैन 'वसन्त' साहित्याचार्य ) [गत किरणसे आगे] की राष्ट्र देशकी उर्वरा पृथ्वीका वर्णन करते श्लोकगत समस्त पदोंका श्लेष-सलिल उस उपमाBuy हुए कविराज लिखते हैं लताका सिञ्चन करता है । अथवा जो देश 'घोषवती विराजमानामृणभाभिरामै -वीणा रूप पृथ्वीको धारण किये हुए' यह रूपकाएस मैगरीयो गुणसंनिवेशाम् । लंकार भी माना जा सकता है। उस रूपककी मौन्दर्यसरस्वतीसंनिधिमाजमुर्वि वृद्धि भी श्लेषकं द्वारा ही हो रही है। इस प्रकार ये सर्वतो घोषवती वहन्ति ॥३३॥ कविराजने सुराष्ट्र देशके वर्णनमें अपने काव्य-कौशल _ 'जो सुगष्ट्र देश, बैलों-द्वारा मनाहर ग्रामोंस का अनुपम परिचय दिया है। शोभायमान, गुरुवर गुणोंके संनिवेश-रचना या ____ समुद्र के बीच में द्वारावती पुगेका वर्णन करते हुए विस्तार से सहित, सरस्वती-नदियों के सामीप्यको कविराजने श्लिष्टोपमाका कितना सुन्दर उदाहरण प्राप्त और गोपवमतिकाओंसे युक्त पृथ्वीको सब तयार किया है ? देखियेओरसे धारण करते हैं।' परिस्फूरन्मण्डलपुण्डरीक-छायापनीतातपसंप्रयोगैः। यह तो हुआ. प्रकृत अर्थ, अब अप्रकृत अर्थ या राजहंसैरुपसेव्यमाना, राजीविनीवाम्बुनिधौ रराज ॥३७॥ देखिये, जो कि श्लोकगत समस्त पदोंके द्वथर्थक होने _ 'जो नगरी समुद्रके मध्यमें कमलिनीके समान के कारण स्पष्टरूपसे प्रतिभासित हो रहा है। शोभायमान होती है। जिस प्रकार कमलिनी, विक शोभा "जो सुराष्ट्र देश, ऋषभ नामक स्वर विशषस सित पुण्डरीकों-कमलोंको छायासे जिनकी आतपसुन्दर, ग्राम-स्वर्गके समुदायस विराजित, गुरुतर- व्यथा शान्त हो गई है ऐसे राजहंसों'-हंस विशेषों श्रेष्ठ अथवा बड़ी बड़ी तन्त्रियोंके सनिवेशस युक्त, से सेवित होती है, उसी प्रकार वह नगरी भी तने हुए तथा सरस्वती देवीके समीपमें स्थित-उसके हाथ में विस्तृत-पुण्डरीक-छत्रोंकी छायासे जिनकी आतप विलसित मनोहर शब्दयुक्त, विशाल, घोषवती-वीणा व्यवस्थासे सब दुःख दूर हो गये हैं ऐसे राजहंसोंको धारण करते हैं-जिस देशके मनुष्य हर एक एक बड़े बड़े श्रेष्ट राजाभांस सेवित थी-उसमें अनेक के प्रकारकी चिन्ताओंसे विनिर्मुक्त हो हाथमें वीणा राजा-महाराजा निवास करते थे। धारण कर संगीत सुधाका पान करते हैं। __उत्प्रेक्षाका एक सुन्दर नमूना भी देखियेयहां प्रकृत और अप्रकृत अर्थों में असंगति न हो , 'राजहंसास्तु ते चञ्चुचरणोहितैः सिताः' जिनकी चोंच इसलिये 'वीणाकं समान पृथिवीको धारण करते हैं और चरण लाल हो और शेष समस्त शरीर सफेद हो यह उपमालंकार व्यङ्ग थरूपसे निकाला गया है। ऐसे हंसोंको राजहंस कहते हैं । Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] महाकवि पुष्पदन्त ४६७ एवं विधां तां निजराजधानी निर्मापयामीति कुतूहलेन। की भूमिका श्राश्लेषण करता है। छाया छलादच्छ जले पयोधौ प्रचेतसा या लिखितेव रेजे ।३८ यहाँ पर कविने समासोक्ति अलंकारसे यह भाव 'स्वच्छ जलसे युक्त समुद्रमें द्वारावतीका जो व्यक्त किया है-'जैसे कोई उत्कट इच्छा वालाप्रतिविम्ब पड़ रहा था, उससे ऐसा मालम होता था दक्षिण नायक, नवीन अनुगग-प्रेमसे सम्पन्न स्त्रीको कि जलदेवता वरुणने, 'मैं भी अपनी राजधानीको छोड़ कर, उन्नत स्तन वाली किसी अन्य कान्ता स्त्री इसीके समान सुन्दर बनवाऊँगा' इस कुतुहलसे मानों का आश्लेषण करने लगता है उसी प्रकार चन्द्रमा, एक चित्र खींचा हो।' नवानुरागसे युक्त प्राचीको छोड़ कर द्वारावतीकी द्वारावती नगरी की स्त्रियोंका वर्णन देखिये- उच्चस्तनी उन्नत, रत्न निर्मित निवास-भूमका पालचन्द्रायमाणैर्मणिकर्ण पूरैः पाशप्रकाशेरतिहारिहारः । न करता था-उसमें प्रतिविम्बित होता था । भूमिश्च चापाकृतिभिर्विरेजुः कामास्त्रशाला इव यन्त्र बालाः३६ यहाँ समासाक्ति अलंकार तथा उसके द्वारा प्रकट यहाँ ममासोक्ति अ जहां पर स्त्रियां कामदेवकी अस्त्रशालाके समान होने वाली सम्भोगशृङ्गार नामक रसध्वनि सहृदयशोभायमान होती थीं । क्योंकि स्त्रियाँ अपने कानोंमें जन-वेद्य है। जो मणिनिर्मित कर्णफूल. पहिने हुई थीं वे चक्र- 'अनुराग', 'उदारकान्ति', 'उच्चस्तनी', तथा आयुध विशेषके समान मालूम होते थे, जो सुन्दर 'कान्ता' शब्दके श्लेषने, 'नक्तम्' इस उद्द पक, विभावहार पहिन हुई थीं वे कामदेवके पाश-बन्धन रज्जुके सूचक पदने, 'प्राची' तथा 'रत्न निवासभूमि' शब्दके समान मालूम होते थे और जो उनकी प्रणय-कापस स्त्रीत्वन एवं 'इन्दु' शब्दके पंस्त्वने इस श्लोकके बैंक भौंहें थी वे धनुषके समान मालूम होती थीं। सौन्दर्य-वर्धनमें भारी हाथ बटाया हे । ___ यहां उपमालंकारको विचित्रता और 'शाला' परिसंख्या अलंकारका एक नमूना देखिये'बाला' का अनुप्रास दर्शनीय है। प्रकोपकम्पाधरवन्धुराभ्यो-भयं वधूभ्यस्तरुणेषु यस्याम् | 'रात्रिके प्रथमभागमें चन्द्रमाका उदय होता है कपूरकालेयकसौरभाणां, प्रभजनः पौरगृहेषु चौरः ॥ ४२ ॥ पूर्व दिशामें लालिमा छा जाती है, थाड़ी देरमें पूर्व जिस द्वारावती नगरीमें रहने वाले युवा पुरुषों दिशासे आगे बढ़ कर चन्द्रमा आकाशमें पहुँच जाता को यदि भय होता तो सिर्फ प्रणयकोपसे कँपते हुए है जिससे उसका प्रतिविम्ब द्वागवती नगरीके मणि- अधरोष्ठोंसे शोभित अपनी स्त्रियोंसे ही होता थानिर्मित भवनों में पड़ने लगता हैं' इस प्रकृतिक सौन्दर्य अन्य किसीसे नहीं। इसी तरह नागरिक नरोंके घरों का वर्णन कविराजकी अनूठी लेखनीसे कितना सुंदर में यदि कोई चोर था तो सिर्फ पवन ही कपूर और हुआ है ? देखिये कालागुरु चन्दनकी सुगन्धिका चौर था और कोई प्राची परित्यज्य नवानुरागा-मुपेयिवानिन्दुरुदारकान्तिः । चौर नहीं था। उच्चस्तनीं सननिवासभूमि, कान्तां समाश्लिष्यति यत्र नक्त्तम् ॥ यहाँ कविने यह बतलाया है कि उस नगरीका जहाँ पर रात के समय उत्कृष्ट कान्तिवाला चन्द्रमा, शासन इतना सुदृढ़ और सुसंगठित था कि उस पर नूनन अनुराग लालिमासे अलंकृत पूर्व दिशाको छोड़ बाहिरसे अन्यशत्रुओंके आक्रमणकी जरा भी कर अत्यन्त उन्नत और मनोहर रत्न-निर्मित महलों आशंका नहीं रहती थी तथा वहाँ के लोग बाजीविका Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [ वर्ष ४ आदिसे इतने सुखी थे कि कभी किसीको किसी दूसरे को भी संमव कर दिखाते हैं । यही बात है कि कविकी वस्तुको चुगने की इच्छा नहीं होती थी-जो जिस राज भी आगेके श्लोकमें आकाशगत सुवर्ण कमलों वस्तुका पाना चाहता था उसे वह वस्तु अनायास- का संभव कर दिखाते हैं। देखियेस्वयमेव प्राप्त हो जाती थी। यनेन्दुपादै, सुरमन्दिरेषु, लुप्तेषु शुद्धस्फटिकेषु नकम् । यह वर्णनीय वृत्त साधारण है परन्तु कविके चक्र स्फुटं हाटककुम्भकोटि-नभस्तलाम्भोरुहकोशशङ्काम् ।। परिसंख्या अलंकारनं उसकी शोभाको बहुत मोहक --'द्वारावती नगरीमें रातक समय, निर्मल स्फटिकबना दिया है। मणियोंके बने हुए देवमन्दिर चन्द्रमाकी सफेद सुगन्धिनः संनिहिता मुखस्य, स्मिता ता विच्छुरिता वधूनाम् । किरणों द्वारा लुप्त कर लिये जाते थे-सफेद मंदिर भृङ्गा बभुर्यत्र भृशं प्रसून-संक्रान्तरेणूकरकरा वा ॥४५॥ सफेद किरणोंमें तन्मय हाकर छिप जाते थे, सिर्फ स्त्रियोंके मुखोंकी सुगन्धिके कारण जो भौरे उनके उन मन्दिरोंके सुवर्ण-निर्मित पीले पीले कलशे दिखपास पहुँच जाते थे वे भौंरे उन स्त्रियोंकी मुसकानकी लाई पड़ते थे उनसे यह स्पष्ट मालूम होता था कि सफेद कान्तिसे व्याप्त होनेपर ऐसे मालूम होते थे, आकाशमें सुवर्ण-कमल फूले हुए हैं। (भावानुवाद) जैसे मानों फूलोंके परागके समूहसे कर्बुर-चित्र श्लेष और उत्प्रेक्षा संवर-मेलका उदाहरण विचित्र हो गये हों। देखियेयहाँ तद्गुण तथा उत्प्रेक्षाका संकर दर्शनीय है। यमैक वृत्तेर्धन वाहनस्य, प्रचेतसो यत्र धनेश्वरस्य । सुभ्र युगं चंचलनेत्र वाहं, यस्यां स्फुरत्कुण्डल चारु चक्रम्। व्याजेन जाने जयिनो जनस्य, वास्तव्यतां नित्य मगुर्दिगीशाः ।। आरुह्य जातस्त्रिजगद्विजेता, वधूमुखस्यन्दनमङ्ग जन्मा ॥ २२॥ 'उस द्वारावतीके रहने वाले मनुष्य यमैकवृत्ति दाना 'जो, उत्तम भौंह रूप युग-जुंवारीसे सहित है थे-अहिंसा आदि यम-व्रतोंको धारण करने वाले थे (पक्षमें उत्तम भौंहोंके युगलसे सहित हैं) चञ्चल नत्र (पक्षमें यमराजकी मुख्य वृत्तिको धारण करने वाले थे) रूप बाहो-घोड़ोंसे युक्त हैं (पक्षमें चञ्चल नेत्रोंको घनवाहन थे-अधिक सवारियोंसे युक्त थे (पक्षमें प्राप्त है) और जो कुण्डल रूपी सुन्दर चक्र-आयुध इन्द्र थे), प्रचेतस थे-प्रकृष्ट-उत्तम हृदयको धारण विशेषसे शोभित हैं (पक्षमें चमकते हुए कुण्डलोंकी वरने वाले थे (पक्षमें वरुण थे) और धनेश्वर थेचारु परिधिसे सहित हैं)-ऐसे स्त्रीके मुखरूपी रथ धनके ईश्वर थे (पक्षमें कुबेर थे। इसलिये मैं समझता पर आरूढ़ होकर कामदेव जिस द्वारावती नगरीमें हूं कि वहांके मनुष्योंके छलसे चारों दिशाओंके तीनों लोकोंका जीतने वाला बन गया था।' दिक्पालोंने उस नगरीको अपना निवासस्थान बनाया यहाँ 'युग' 'वाह' और 'चक्र' शब्दके श्लेषसे था।' अनुप्रीणित वधू मुख और स्यन्दन-रथका रूपक दक्षिण दिशाके स्वामीका नाम यम, पूर्व दिशा विशेष दर्शनीय है। के स्वामीका नाम धनवाहन-इन्द्र, पश्चिम दिशाके लोग कहते हैं कि कवियोंके सामने कोई भी वस्तु स्वामीका नाम धनेश्वर-कुबेर है]। असंभव नहीं है वे अपनी कल्पनासे असंभव वस्तु इस प्रकार कविराजने बहुत ही सुन्दर रीतिसे Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ] अनेक श्लोकोंमें द्वरावती नगरीका वर्णन किया है । स्थानाभाव के कारण खास खास श्लोकों का ही परिचय दिया जा सका है। इसके आगे राजा समुद्रविजयका वर्णन देखियेयदर्धचन्द्रापचितोत्तमाङ्ग रुद्दण्डदोस्ताण्डवमादधानैः । विद्वेषिभित्तशिवाप्रमोदः, कैः कैर्न दध युधि रुद्रभावः ॥ ६१ 'राजा समुद्रदत्त के वाणोंसे जिनका मस्तक कट गया है, जो बचाव के लिये अपनी उद्दण्ड भुजाओं को फड़फड़ा रहे हैं तथा भक्ष्य सामग्री प्राप्त होने पर जिन्हों ने शिवा-शृगालियोंके लिये हर्ष प्रदान किया है— ऐसे कौन कौन शत्रुओंने युद्ध में रुद्रभाव - क्रूरभावको धारण नहीं किया था ? अर्थात् सभीने किया था।' 'जिनके मस्तक अर्धचन्द्रसे पूजित हैं, जो अपनी भुजाओंसे उद्दण्ड ताण्डव नृत्य करते हैं, तथा जिन्हों न पति होने के कारण शिवा - पार्वतीको हर्ष प्रदान किया है - ऐसे कौन कौन शत्रुओंने युद्ध में रुद्रभाव - महादेवपनेका धारण नहीं किया था ? अर्थात् सभी ने किया था।' काव्य- परिचय ४६६ होता था, तथा हमेशा शान्ति हवन आदि होते रहने के कारण समय समय पर जलवर्षा होती रहती थी, यह अर्थ लेने पर कोई विरोध शेष नहीं रह जाता । यहां वर्णनीय वस्तुमात्र इतनी है कि 'राजा समुद्रविजय के राज्य में दुष्टों का निग्रह होता था और वर्षा भी समयपर हुआ करती थी ।' परन्तु कविने विरोधालंकारकी पुट देकर उसे कितना सुन्दर बना दिया है ! यहाँ क्रमसे लिखे हुए प्रकृत और अप्रकृत अर्थों का कितना सुन्दर श्लेष है और उससे प्रकट होने वाला ‘रुद्रभावः रुद्रभाव इव' यह उपमालंकार कविके जिस काव्यकौशलको प्रकट कर रहा है वह प्रशंसनीय है । द्वे कौतुके न्यातपच्छायातलस्थायिनि भूतलेऽस्मिन् । संतापमापद्यदसाधुवर्गों, यद्वृष्टिरप्यस्खलिता बभूव ॥ ६३॥ 'महाराज समुद्र विजयकी छत्रछाया के नीचे रहने भूमि पर दो आश्चर्यजनक कौतुक हुए थे । पहला यह कि दुष्टमानव-समूहने सन्तापको पाया था और दूसरा यह कि वर्षा भी अप्रतिहत- बेरोक टोक रूपसे हुई थी ।' जो मनुष्य छायाके नीचे स्थित होता है खसे धूप तथा जलवृष्टिकी वाधा नहीं होतीपरन्तु यहां महाकवि ने, समुद्र विजयकी छत्र छायाके नीचे स्थित उन दोनों बाधाओं को बतलाया है जिससे विरोधालंकार अत्यन्त स्पष्ट होगया है । किन्तु उनकी शासन व्यवस्था में दुष्ट मनुष्यों का निग्रह होता था इसलिये दुष्टोंको दुःख 1 महाराज समुद्रविजयने शत्रु-राजाओं को अबलनिर्बल बना दिया था, इसका वर्णन देखिये"हाला पदूरीकृत - कोपलज्जाः सन्नाभिमानास्तनवप्रभावाः । मन्त्रप्रयोगादबलाः सहेलं येनाक्रियन्त प्रतिपक्षभूपाः ॥ ६४ ॥ 'हा, हा, इस प्रकार दुःखसूचक शब्दोंद्वारा जिन का कोप और लज्जा दूर होगई है, जिनका अभिमान नष्ट हो गया है, और नवीन प्रभाव अस्त होगया है ऐसे शत्रुराजाओं को राजा समुद्रविजयने अपने मन्त्रवल—सद्विचारणा के बलसे निर्बल बना दिया था।' [ राजाने उन्हें निर्बल बना दिया था इसलिये उनकी ऊपर लिखी हुई अवस्था हो गई थी ।] 'हाला मदिरा के द्वारा जिनका कोप और लज्जा दोनों दूर होगई हैं तथा सुन्दर नाभिके मानसे जिन्होंने नव तरुण पुरुषोंके प्रभावको — धैर्यको - नष्ट कर दिया है ऐसे शत्रुओंको राजा समुद्रविजयने अपने मन्त्र तन्त्र के प्रयोगसे अबला - स्त्री बना दिया थायह आश्चर्य की बात है ! यहाँ श्लेष तथा उससे उत्पन्न हुए विरोधाभास अलंकारकी सुन्दरता कविके अनोखे काव्य-कौशलको प्रकट कर रही हैं। (क्रमश:) १ 'हा' इत्यालापेन दूरीकृते कोपलज्जे यैस्ते, हालया मद्येनापदूरीकृते कोपलज्जे याभिस्ताः । सन्नोऽभिमानो येषां ते, अतएवास्तो नवः प्रभावो येषां ते, सुन्दरनाभेर्मानेन स्तो नवानां यूनां प्रभावो धैर्य रूपो याभिस्ताः । यद्वा सन्नोऽभिमान या समन्तात्स्तनोच्चत्वं यासां ताः । यद्वा सुन्दरो नाभिमानो यासां ताः स्तनयोर्वप्रभाव उच्चता यासु ताः । Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपाध्याय पद्मसुन्दर और उनके ग्रन्थ (ले०-श्रीअगरचन्द नाहटा ) 1. नेकान्तकी गत २-४-५ किरणों में "राजमल्लका पुरीय तयागच्छकी बड़ी प्रसिद्धि हुई। उपाध्यायजी वाद पिंगल और राजाभारमल्ल"* शीर्षक सम्पादकीय लेख करने में बड़े कुशल थे। इन्होंने 'प्रमाणसुन्दर' नामक न्यायप्रकाशित हुआ है। उसमें (किरण २ पृ० १३७) मोहनलाल ग्रंथ, रायमल्लाभ्युदय महाकाव्य, पार्श्वनाथ काव्य एवं दलीचंद देशाइ लिखित 'जैन साहित्य नो संक्षिप्त इतिहास' प्राकृतमें जम्बूस्वामी कथा इत्यादि ग्रंथोंकी रचना की है। के आधार पर पद्मसुन्दर-रचित 'रायमल्लाभ्युदय' का उल्लेख "सूरीश्वर और सम्राट"* में लिखा है कि श्री हीरकिया गया है । देशाइजीने पद्मसुन्दरको दि० भट्टारक बत- विजयसूरिजी सम्राट अकबरसे मिले थे, तब वार्तालापके अन्तर लाया है, पर वास्तवमें यह सर्वथा गलत है। । ये पद्मसुन्दर सम्राट अकबरने अपने पुत्र शेखजीके द्वारा अपने नागपुरी तपागच्छके विद्वान थे और सम्राट अकबरसे अापका यहांके पुस्तकालयका ग्रंथ-संग्रह मँगवाकर सूरिजीके समक्ष काफी सम्बन्ध रहा है। हमें इनके कतिपय नवीन ग्रंथ भी रखा ।तब सूरिजीने सम्राट से पूछा कि श्रापके यहां इतने जैन मिले हैं, अतः इस लेखमें उनका यथाज्ञात परिचय दिया एवं जैनेतर ग्रंथोंका संग्रह कहांसे आया ? सम्राट ने उत्तर जा रहा है। दिया कि हमारे यहां उपाध्याय पद्मसुन्दर नामके नागपुरीय ___ नागपुरीय तपागच्छकी पट्टावलि में आपका परिचय इस तपागच्छके विद्वान साधु रहते थे। वे ज्योतिष, वैद्यक और प्रकार दिया है:-"धुरंधर पंडित पद्मसुन्दर उपाध्यायका सिद्धान्तशास्त्रमें बहुत निपुण थे, उनके स्वर्गवास होजाने सम्राट अकबरसे घनिष्ट सम्बन्ध एवं परिचय था । सम्राट पर मैंने उनकी पुस्तकोंको सुरक्षित रखा है। अब आप कृपया आपकी विद्वत्ताको अच्छी तरह जानता था। एक बार एक इन ग्रंथोंको स्वीकार करें। ब्राह्मणने दिल्लीमें सम्राट अकबर के समक्ष गर्वित होकर कहा हर्षकीर्तिसूरि-रचित धातुपाठवृत्ति-धातुतरंगिणीकी कि मेरे समान इस कलिकाल में कोई विद्वान नहीं है। यह प्रशस्तिसे पहावली उल्लिखित शाहि सभामें वाद-विजयके सुनकर सम्राटने उपाध्याय पद्मसुन्दरजीको शीघ्र बुलवाया। अतिरिक्त जोधपुरके नरेश मालदेवके श्राप मान्य थे आदि उपाध्यायजीने शीघ्र ही पाकर सम्राट के समक्ष तर्कमें उस प्रतीत होता है। यथाःब्राह्मणको परास्त कर दिया। इससे सम्राट अकबर उनके साहेः संसदि पद्मसुन्दरगणिर्जित्वा महापंडितं । मंत्री और सभासदवर्ग सभी बहुत प्रसन्न हुए। पद्मसुन्दरजी क्षौम-ग्राम-सुखासनाधकबर श्रीसाहितोलब्धवान् ।। को सम्राट ने पहिरामणी कर सुखासनादि प्रदान किये और हिन्दकाधिपमालदेवनपतेमोन्या-वदान्योधिक। प्रागरेमें धर्मस्थान बनवा दिया। उनकी इस विजयसे नाग- श्रीमद्योधपुरे सुरेप्सितवचाः पद्माह्वयं पाठकं ॥१० *विशेषके लिये देखें भारमल्ल-पुत्रकारित वैराटमंदिर-शिला (हमारे संग्रहकी प्रति) लेख सानुवाद, प्र० जैन सत्यप्रकाश वर्ष ४ अंक ३ से ६; सं० १६२५ मि. व. १२ को तयागच्छीय बुद्धिसागर एवं प्राचीन जैनलेखसंग्रह लेखाङ्क ३७६ । भारमल्लकी कीर्तिके जीसे खरतर साधुकीर्तिजीकी सम्राट की सभा पौषधकी चर्चा जा कह कवित्त 'श्रीमालीवाणिश्रोनोज्ञातिभेद' में छपे हैं। हुई थी और साधुकीर्तिजीने विजय प्राप्त की थी। उस समय +देशाइजीने उनकी जो गुरुपरम्परा रायमल्लाभ्युदयमें बतलाई पमत पद्मसुन्दरजी आगरेमें ही थे, ऐसा हमारे द्वारा सम्पादित है ठीक वही 'सुन्दरप्रकाशशब्दार्णव' श्रादिमें भी है, अत: *गुजराती संस्करण पृ० १२० दोनों एक ही नागौरी तपागच्छके है। + हीरविजयसूरि सम्राट अकबरसे सं० १६३६ में मिले थे। अत: जैनयुवकमंडल, अहमदाबादसे प्रकाशित (गुजराती) पद्मसुन्दरजीका स्वर्गवास इससे पूर्व होना निश्चित होता है । Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ८] पद्मसुन्दर और उनके ग्रन्थ ४७१ 'ऐतिहासिक जैनकायसंग्रह' के पृ० १४० में प्रकाशित मानकीर्तिसूरि विद्यमाने पं० चउहथ शिष्य वीराह्न 'जइतपदवेलि' सं स्पष्ट है। लिखितं स्ववाचनाय शृंगारदर्पण काव्यग्र० ६०० ।श्री। उपाध्याय पद्मसुन्दरजीके ग्रंथ भिन्नाक्षरप्रशस्ति___ हमारे अन्वेषणसे उपाध्याय पद्मसुन्दरजीका श्रृंगार- चतुः शृंगस्त्रिपादश्च द्विशीर्षा सप्तहर्षवान । दर्पण" नामक ग्रंथ मिला है, उससे सम्राट अकबरके साथ त्रिधावद्धो महान देवो, वृषभोगैरवीति ॥१॥ अापका घनिष्ट सम्बन्ध भलीभांति प्रमाणित होता है । यह मान्यो वा "भुभुजोलजघराट् तद्वत हुमायूं नृपो। ग्रंथ सम्राट अकबरके लिये ही बनाया गया था। अतः इस ऽत्यर्थ प्रीतमनः सुमान्य ककोदानन्दरायाऽमिधं । का नाम "अकबरशाहिशृङ्गारदर्पण' रखा गया है । साहित्य तद्वत्साहिशिरोमणेर कबरक्ष्मापालचूडामणे । संसारमें अद्यावधि इस ग्रंथका कोई पता नहीं था। सर्वप्रथम मान्यःपंडितपद्मसुन्दर इहाऽभूत पंडितबातजित।।२।। हमें इस ग्रंथकी अपने हस्तलिखित अपूर्ण ग्रंथों में एक चंद्रप्रभः श्रीप्रभुचंद्रकीर्तिसूरीश्वर श्रंद्रकलाब्धिचंद्र । प्रति मिली। फिर पं० दशरथ जी M. A. से ज्ञात हुआ कि ___ चंद्रोज्वलश्लोकभरःसुखवश्चंद्र क तारावधि मातनोतु ।। इसकी एक पूर्ण प्रति बीकानेर-स्टेट-लाइबरीमें भी है । अतः नागपुरीय तपागणराजः श्रीचंद्रकीर्तिसूरीश्वरा । स्टेट-लायब्ररीके समग्रकाव्यग्रंथोंको दो दिन तक टटोलने पर तच्छिष्य हर्षकार्तिसूरिः समलेखय (स्यार्थ)। ४ सबसे अन्नके बंडल में उसकी प्रति प्राप्त हुई। नीचे इन दोनों कल्याणविपुलं भूयात ए विपरीत रते स्वशीकृता । प्रतियोंके परिचयके साथ ग्रन्थका परिचय दिया जा रहा है- दरहासातिमना रमो नानाविधवाधवसंगता स्मिर अकबरशाहिशृगारदर्पण-स ग्रंथमें चार उल्लास युद्धे विजितोप्य चाप्पलं ॥१॥ हैं, जिनमें क्रमशः ६८, ७६, ८६ और १८ पद्य हैं, आदिवंत प्रातपरिचय:इस प्रकार है: A बीकानेर स्टेट लायब्ररी-१६ पत्रकी प्रति है। आदि-यद्भासा सकलं विभाति दुर्लक्षाम् श्वगिदशा। प्रत्येक पृष्ठमें पंक्किये १२ से १४ और प्रति पंक्ति अक्षर ४५ यस्मिन्नोतमिदं हितं तुमणिवश्यत्यं सदाशाश्वत। से ४६ तक हैं। प्रति सं १६२६ अर्थात् रचनाकालके करीब यत्परि तमसः स्थितं च रहयानित्याद्वयं तत्परम। की लिखी हुई है। ज्योतिःसाहिशिरोमणे अकबर त्वाम् सर्वा देवावतात Bहमारे संग्रहमें-पत्र २ से १३ तककी अपूर्ण प्रति x x x x है। प्रथम सर्गकी २२ वीं गाथासे प्रारंभ होकर चोथे सर्गकी अंत्यः-अनेन पदचातुरी नियतनायिकालक्षणा। २० गाथा तक सम्बन्ध है। प्रति १६ वीं शताब्दीके पूर्वाद्ध स्फुरन्नवरसाल्लास व (वि!) णिमप्रबंधेन त। की लिखित प्रतीत होती है। अनंगरससंगप्रथितमानमुद्रावतीं। २सुन्दरप्रकाश शब्दार्णव-इस ग्रन्थमें ५ तरंग हैं. प्रसादयतु भामिनीमकबरे स्वरोहनिशा ॥९॥ जिनके समग्र पद्योंकी संख्या २६६८ (ग्रंथाग्रंथ ३९७८) है । यद्यस्ति काव्यरचनासु रुचिर्विदग्धा यह एक कोष ग्रंथ है। नानारसेषु रसिकत्व-कुतूहलं च। . .. आदि-यच्चांतर्वहिरात्मशक्तिविलसच्चिद्रूपमुद्रांकितं । तत्पद्मसुन्दरकविग्रथितं सुरम्यं, स्यादित्थं ततदित्यणेह विषयाः ज्ञानप्रकाशोदितं शृंगाग्दपणमुपाद्धमदुष्टचिन्ता ।। ९८ ॥ शब्दभ्रान्तितमः प्रकांडवदनबध्नेन्दुकोटिभ्रम। इति - सकलकलापारीण रसिकसाम्राज्यधुरीण बंदे निवृतिमार्गदर्शनपरं सारस्वतं तन्मठं ॥१॥ श्रीअकबरसाहिशृंगारदर्पणे चतुर्थउल्लासो। यादशं xxxx इत्यादि । ले० सं० १६२६ वर्षे प्राषाढमासे कृष्णपक्षे अंत्यः-आनंदोदयपर्वतैकतरेण रानंदमेरोगुगै। अष्टम्यां तिथौ भौमवासरे पातिसाह श्रीअकबरराज्ये । शिष्य पंडितमौलिमंडनमणिः श्रीपद्ममेरुर्गुरुः। आगरामध्ये । भ० श्रीचंद्रकीर्तिसूरिपट्टे भ० श्री श्रीश्री [शेषांश पृष्ठ ४७६ पर पढ़िये ] Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीजैनमन्दिर सेठका कुँचा देहलीके कुछ हस्तलिखित ग्रन्थोंकी सूची हली सेठके कुँचेके जैनमन्दिरमें भी हस्तलिखित ग्रन्थोंका अच्छा भण्डार है। इस शास्त्रभण्डारका दर प्रबन्ध प्रायः पं० महबूबसिंहजीके हाथमें है, जो स्वभावके बड़े सजन हैं और हमेश। ग्रन्थावलोकन - करने वालोंको अवलोकनकार्य में यथेष्ट सुविधा देते रहते हैं। यहाँ भी ग्रन्थ अल्मारियोंमें अच्छी व्यवस्थाके साथ विराजमान हैं-लटकती हुई गत्तेकी पट्टियों पर प्रत्येक वेष्ठनमें पाये जाने वाले ग्रन्थोंके नम्बर तथा नामादिक अंकित हैं । ग्रन्थसूची यद्यपि ग्रन्थकर्ताके नामादि सम्बन्धी अनेक त्रुटियोंको लिये हुए है, फिर भी उस परसे ग्रन्थोंके निकालने में कोई दिक्कत नहीं होती । इस ग्रन्थसूचीकी कापी भी बाबू पन्नालालजी अग्रवालने अपने हाथसे उतार कर मेरे पास भेजी है, जिसके लिये मैं उनका आभारी हूँ । सूची परसे ग्रन्थप्रतियोंकी संख्या सब मिलाकर १४०० के करीब जान पड़ती है। अनेक ग्रन्थोंकी कई कई प्रतियाँ हैं, इससे ग्रन्थ संख्या ६०० या ७०० के करीब होगी। इसी ग्रन्थसूची परसे कुछ खास खास ग्रन्थोंकी यह सूची तय्यार कराई गई है। इस सूचीमें उन बहुतसे ग्रन्थोंको नहीं लिया गया है-छोड़ दिया है-जो पिछली दो किरणोंमें प्रकाशित नयामन्दिरकी सूचीमें श्राचुके हैं। साथ ही, सूचीमें ग्रन्थकर्ताके नामोंकी जो त्रटियाँ थीं और लिपि सम्वतोंका पूर्णतया अभाव था उस सबकी पूर्ति भी ग्रन्थप्रतियों परसे, दो दिन देहली ठहरकर चा. पन्नालालजीके सहयोगसे करदी गई है । फिर भी समयाभावके कारण पिछले कुछ ग्रन्थ जाँचसे रह गये है-उनके लिपि सम्बतोंका नोट नहीं होसका । कुछ ग्रन्थ बाहर गये होनेके कारण भी जाँच तथा नोटसे रह गये हैं। जाँचके समय जिन ग्रन्थोंका रचना-सम्वत् सहज हीमें मालूम होसका है उसे भी नोट कर दिया गया है-शेषको छोड़ दिया है। इस भण्डारमें हिन्दी ग्रन्थोंकी संख्या अधिक है और उनपरसे हिन्दीके कितने ही अज्ञात लेखकों तथा कवियोंका पता चलता है। 'बुद्धिसागर' नामका ग्रन्थ मुसलमान कविकी श्राजसे ३०० वर्ष पहलेकी हिन्दी रचना है और वह सम्राट अकबर आदि से सम्बन्ध रखने वाली अनेक ऐतिहासिक बातोंके उल्लेखको लिये हए है। -सम्पादक ग्रन्थ-नाम ग्रन्थकार-नाम भाषा पत्रसंख्या रचना सं० लिपिसंवत् हिन्दी पद्य ११६ १९८५ १६८० ४१ ४५१ १९८४ संस्कृत-हिन्दी हिंदी पद्म प्राकृत-हिन्दी १९८३ १८६२ १८७४ १६७७ हिन्दी पद्य अक्कलसार पं० खूबचन्द अजितनाथपुराण पं० देवदत्त अध्यात्मदोहा पं. रूपचन्द अनगारधर्मामृत (भा. टी.) पं० श्राशाधर अनिरुद्धकुमारचरित भागचन्द श्रावक अनुत्तरोपपाददशांग (श्वे.,हि.टि.) अन्त:कृतदशांग अभिनन्दनपुराण पं० देवदत्त अमरविलास अमरकवि आचारसार (सटिप्पण) वीरनन्दी आदित्यव्रतकथा मल्लपुत्र अगरवाल उद्यमप्रकाश कवि क्षत्रपति पद्मावती पुरवाल उद्धारकोष (मंत्रबीजादिकोष) दक्षिणामूर्ति (अजैन) उपदेशरत्नमाला भ. सकलभूषण उपामकदशांगसूत्र (श्वे.) ऋषिदत्ताचरित्र (शीलप्रबंध) | देवकलस (पाठकदेवका शिष्य) नई टि.१६२७ १७७० संस्कृत हिंदीपद्य (१५६) १९८३ संस्कृत प्राकृत हिंदी १४ । १५६६ x (जीर्ण) Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७३ १९८१ " गद्य " पद्य १७७६ पद्य , पद्य किरण ८] जैनमन्दिर सेठका कुंचा देहलीके कुछ हालि ग्रंथोंकी सूची ४७३ ग्रन्थ-नाम ग्रन्थकार-नाम भाषा पत्र संख्या रचना सं० लिपि सं० कर्मचरसारसंग्रह पं० हेमराज हिंदी गद्य १६०३ कर्मप्रकृति (१६० गाथा) नेमिचन्द सि. चक्रवर्ती प्राकृत १६२५ कर्मप्रकृति (श्वे.) टीका मलयगिरिसूरि प्रा० सं० ३१८ करिकंडुचरित भ० शुभचन्द्र संस्कृत करिकंडुचरित मुनि कनकामर अप्रभ्रंश १५७८ गुणधरचरित्र पं. नयनानन्द्र हिंदी पद्य गौतमचरित्र भ० धर्मचंद्र १९८४ चर्चानामावली १६५६ चर्चामंजरी वैद्य शीतलप्रसाद १६५५ " , चिकित्सासारसंग्रह (जैन) वंगसैन संस्कृत ११२२ चिद्विलास पं. दीपचंद हिंदी गद्य १६२६ चेतनविलास कवि जौहरी १९८१ चेलना रानीकी कथा , गद्य छहढाला पं० बुधजन १८७६ શર जम्बूस्वामिचरित कवि राजमल्ल संस्कृत १६३२ जिनगुणविलास पं० नथमल हिंदी पद्य १८२२ न्येष्ठजिनवरकथा पं. खुशालचंद ,,,,(८४) १७८२ १६५५ जैनागारप्रक्रिया त्यागी दुलीचंद सं० हिंदी गद्य १६५५ जैनधर्मसुधासागर हिंदीगद्य पद्य ज्ञानार्णव चौपई (श्वे.) लव्धविमलगणी हिंदी पद्य ज्ञानानन्दश्रावकाचार पं० जगतराय हिंदी गद्य १५० ज्ञानानन्दश्रावकाचार पं० टोडरमल्ल २२५ तत्त्वार्थटीका भ० धर्मचंद्र संस्कृत १४८६ तत्त्वार्थबोध (भाषा) पं० बुधजन हिंदी पद्य १८७६ १६२७ त्रिभंगी पंचक (भा. टी. सहित) मू० नेमिचंद्र, प्रा० हिंदी त्रिलोकदर्पण पं० खडगसैन हिंदी पद्य १७६४ दशवैकालिक (श्वे.) प्राकृत १८८७ दानशीलतपभावना अशोक मुनि दौलतविलास पं.दौलतराम हिंदी पद्य १६५४ द्रव्यप्रकाश पं० देवचंद्र १९८५ धर्मकुण्डलिका धर्मचर्चा १६३२ धर्मचर्चासंग्रह धर्मबुद्ध मंत्रीकी कथा कवि वृन्दावन . १९८४ धर्मरत्नोद्योत १९७६ १६६ ६६ , गद्य Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २३ नरचंद्र " ४७४ अनेकान्त [वर्ष ४ ग्रन्थ-नाम ग्रन्थकार-नाम भाषा पत्र संख्या रचना सं० लिपि सं० धर्मसरोवर कवि जोधराज हिंदी पद्य १७२४ - १९८४ धर्मोपदेशरत्नमाला त्यागी दुलीचंद ध्यानबत्तीसी नमोकारग्रन्थ पं० लक्ष्मीचंद वैनाड़ा -- ६८४वी ,२४४६ १९८० नयचक्र-वचनिका निझलचंद पुत्र विलासचंद ४६ । १८६७ । १८७६ नयनसुखविलास यति नयनसुखदास -पद्य १९८० नागकुमारचरित्र पं० नथमल विलाला १८३० १९७६ नाममाला (भाषाकोष) पं. बनारसीदास १६७० १६३३ नारचंद्र (ज्योतिषशास्त्र) संस्कृत १६३४ नित्यधर्म-प्रक्रिया त्यागी दुलीचंद हिंदी गद्य १६३६ निरपावलि-टीका (श्वे.) प्राकृत-हिंदी नेमिचन्द्रिका पं. मनरंगलाल हिंदी-यद्य पद्मनन्दिपच्चीसी पं० जगतराय १८६१ पद्मप्रभुपुराण पं० देवीदत्त १९८० पंचपरावर्तनचर्चा (वचनिका) " गद्य पंचमीव्रतकथा भ० सुरेन्द्रनाथ हिंदी पद्य १९६१ पंचाख्यान चौपई पं० निर्मलदास १६७१ परमानन्दविलास पं० देवीदास १९७६ पाशाकेवली भाषा (गर्गाचार्य कृतिका अनुवाद) प्रतिक्रमण सूत्र प्राकृत . प्रद्युम्नचरित शाहमहाराज पुत्र रायरछ हिंदी मद्य १६३८ प्रद्युम्नचरित (वचनिका) पं० ज्वालानाथ बखतावरसिंह १९६६ १११६ प्रद्युम्नचरित कवि बूलचंद १८४३ प्रभंजनचरित प्रश्नमाला १९८० प्रश्नसमाधान पं. बनवारीलाल प्रीत्यंकरचरित्र पं० बखतावरमल बुद्धिसागर । क्यामखानी न्यामतखाँ ०५ .१६४५ | १८४० ब्रह्मगुलालचरित्र कवि क्षत्रपति पद्मावती पुरवाल ३२ वी०१६०६ २४५१ भक्तामरस्तोत्र-टीका मू० मानतुङ्गसूरि, टी. जयचंद सं०, हिंदी ४१ । १८७० भावदीपिका हिंदी गद्य १९६६ मदनपराजय (वचनिका सहित) | मू० कवि जिनदेव, स्वरूपचंद | सं०, हिंदी गद्य | टी०१६१८ मन्मोदनपंचशती | हिंदी पद्य १९१६ १९७३ मरकतमणिविलास (वचनिका) | पं. पन्नालाल गोधा . , मद्य १४४ १९३३ । मल्लिनाथचरित्र (वच निका) म. सकलकीर्ति, टी. दौलतराम | सं०, हिंदी गद्य ८२८ १४८ Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ " किरण ८] जैनमन्दिर सेठकाकूँचादेहलीके कुछ ह०लि. ग्रंथोंकी सूची ४७५ ग्रन्थ-नाम ग्रन्थकार-नाम भाषा पत्र संख्या रचना सं० लिपि सं० मल्लिनाथ पुराण (वचनिका) | भ. सकलकीर्तिटी.पं०गजाधरलाल सं०हिंदी गद्य ७५ १९८० महावीर पुराण भा. टीका मूल अशगकवि, टी. हिंद। गद्य १९७७ मिथ्यात्वखंडन पं० वखतराम २१ । १९७९ मिथ्यात्वनिषेध (वच निका) पं. कान्हा भजनी? मुक्तिस्वयंवर (भा. टीका) पं० वेणीचंद्र सं० हिंदी गद्य मुनिवंशदीपिका नयनसुख यशोधरचरित्र (वचनिका) हिंदी गद्य योगसार (हिंदी टीका सहित) मूल जोइन्दु. टी. अपभ्रंश हिंदी रत्नकरण्डश्रावकाचार (चौपई) हिंदी पद्य रत्नत्रयव्रतकथा ब्रह्मज्ञानसागर ,४५ रत्नत्रयव्रतकथा भ० सकलकीर्ति संस्कृत रत्नपरीक्षा रत्नसागर हिंदी पद्य १८७७ रविव्रतकथा भानुकीर्ति मुनि राजुलपच्चीसी लक्ष्मीविलास पं० लक्ष्मीचंद १०४ १९७७ वचनकोश बुलाकीचंद १८८३ विमलनाथपुराण पं० कृष्णदास , ३०४६ १७९ १६७४ | १९८१ विद्यानुशासन (मंत्रशास्त्र) सुकुमारसेन मुनि संस्कृत १२७४८ विद्याविलास (वच निका) हिंदी गद्य १८६३ः विद्युतचोरकथा पं० शनतराय . , पद्य अवल्लभ (अजैव) हस्तरुचि संस्कृत ६१८ वैरास्यबीसी (चौपई) हिंदा पद्य षटकर्मोपदेशमाला (भाषा) पाँडे लालचंद . | १९०६ सप्तमीकथा पं० ब्रह्मसय | १९६२ सप्तमीकथा पं० खुशालचंद | १९७३ सप्तव्यसनचरित्र पं० भारामल समयसार टीका भाषा पं० श्रमरचंद पन्नाल सम्मेदशिखर माहात्म्य पं० मनसुखसिंह सम्भवपुराण पं० देवदत्त सारस्वतमण्डन (श्वे.) बाहड पुत्र मंडन | मंकृत १६३४ सिद्धान्तसारसंग्रह (वचनिका) पं० जिनेन्द्रसैन हिंदी गद्य २१७ सिद्धान्तसारोद्धार (वच निका) पं० मग्गरुचि सीताशतक पं० भगवतीदास " पद्य सुखविलास पं० सुखानंद १७८ सुगंधदशमीकथा ब्रह्मज्ञानसागर हिंदी पद्य ४४ " , २१ Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५६ ग्रन्थ-नाम सुगंधदशमी कथा 39 ,, सुन्दर विलास सुन्दरदास के सवैये सुभाषितार्णव (भा० टी०) सुभाषितसार सुमतिनाथ पुराण सुलोचना चरित्र (भा० टी० ) सूतिकाधिकार सोलहकारण व्रत कथा 33 स्वप्नाध्याय (जैन) स्वप्नावली (मरुदेवी स्वप्नफल) हनुवंत कथा हरिवंश पुराण हितोपदेश वचनिका वीरसेवामन्दिर, सरसावा ग्रन्थकार नाम मकरन्द पद्मावतीखाल पं० खुशालचंद पं० भैरोंदास पं० सुन्दरदास 99 दुलीचन्द पं० देवदत्त अनेकान्त पं० भैरोंदास ब्रह्मज्ञानसागर वृहस्पति देवनन्दी ब्रह्मरायमल कवि वाहन पं० श्रभयचन्द ( पृष्ठ ४७१ का शेषांश) तस्योत्तमपद्मसुंदर कविः श्री सुंदरादिप्रकाशां 'तशास्त्र मरीरवत्सहृदयैः संशोधनीयं मुदा ||३७|| पदार्थचिन्तामणिचारुसुंदर प्रकाशशब्दार्णवनाममिम्तवयं । जगजिगीषु ज्जयंतत्सितां मुखे तरंगरंगो विरण्य पंचमः ॥ ६८ ॥ इति श्रीमन्नागपुगेयतपागच्छनमोनमामणि पंडितोत्तम श्री मेरुगुरु शिष्य पं० श्री पद्मसुंदरविरचिते सुंदरप्रकाशे शब्दार्णवे पंचमस्तरंगः पूर्णः तत्समाद्दौपूर्ण: श्रीसुंदर प्रकाश ॥ सं० १६ - *यहां तक ग्रंथोंके जो भी वाक्य उद्धृत किये गये हैं वे बहुत कुछ शुद्ध हैं । शायद प्रतियाँ ऐसी ही अशुद्ध लिखी हुई होंगी, परन्तु लेखकने उसका कोई नोट नहीं किया । -सम्पादक भाषा हिंदी पद्य ५४ १४४ 23 "" हिंदी पद्य 39 " ८४ " गद्य " पद्य 39 " ११ गद्य सं० हिंदी हिदी पद्य ७१ ३७ 95 सं० पद्य ४६ " " "" हिंदी पद्य २२ " गद्य [ वर्ष ४ पत्र संख्या रचना सं० लिपि सं० ११ १० १८ ७६ ५८ १०४ ४१ २६ ५६ १६ ६ ४ ४ २ ७० ८७ ३५३ १७९२ १७९१ १६११ १६१६ १९६६ १९४७ ता०. प्रतिपरिचय — इसकी एकमात्र प्रति पनेचंदजी सिंधी संग्रहसुजान गढ़में देखने में भाई है। पत्र ८८, प्रति पृष्ठ पंक्ति १४ और प्रति पंक्ति अन्तर ४४ के करीब हैं, सरदीके कारण कहीं २ अक्षर नष्ट होगये हैं। कहीं २ पक्ष फट गये हैं। ३ प्रमाणसुंदर । ४ रायमल्लाभ्युदय काव्य (सं० १६१५ ) * पार्श्वनाथकाव्य (सं० १६१६ लि०) बीकानेरस्टेट ला० । ६ जंबूचरित्र ( बीकानेर ज्ञानभंडार ) ७ हामन (यन् ?) सुंदर (ज्योतिषकी, बीकानेर स्टेट लाइब्र ेरी) ८ परमत व्यच्छेद स्याद्वादसु दरद्वात्रिंशिंका( बीकानेर स्टेट ला• 8 षटभाषागर्भित नेभिस्तव गाथा ३० (हमारे संग्रहमें) १० वरमंगलमालिका स्त्रोत्र गा० २१ (बी० स्टेट लायब्र ेरी) ११ भारती स्तोत्र । (उ० सूरीश्वर सम्राट ) इनके सिवाय और ग्रंथोंका कुछ पता अभी तक मालूम नहीं हो सका । Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाई जयभगवानजी वकीलका सम्मान इस वर्ष दशलाक्षणिक पर्वके अवसरपर धर्मपुरा देहलीके नये मन्दिरमें भाई जयभगवानजी वकील पानीपतने दस दिनतक शास्त्रसभामें तत्त्वार्थसूत्रके ऊपर नई शैलीसे अपना प्रवचन किया था-व्याख्यान दिया था, जिसे सुनकर श्रोताजन बहुत प्रसन्न हुए-मुझे भी दो दिन आपका प्रवचन सुननेका अवसर मिला और प्रसन्नता हुई । अतः भादों की पूर्णिमाको रात्रिके समय आपके सम्मानमें एक सभा चौधरी ला० जग्गीमलजीके सभापतित्वमें की गई, जिसमें आपके गुणों का कीर्तन करते हुए भारी आभार प्रदर्शित किया गया और एक सुसज्जित चौखटेके भीतर जड़ा हुआ 'अभिनन्दन-पत्र' श्रद्धाञ्जलिके रूप में आपको भेंट किया गया। उस समयका प्रेमदृश्य बड़ा ही हृदय-द्रावक था-जनता सुगंधित पुष्पोंकी मालाएँ आपके गले में डालती हुई तृप्त नहीं होती थी। इस समय ब्रा० उग्रसेनजी एम०ए० (वकील रोहोक) प्रिंसिपल जैन गुरुकुल मथुराका अच्छा मार्मिक भाषण हुआ था, जिसमें भाई जयभगवानकी शिक्षा, प्रकृति, परिणति, अध्ययनशीलता और वेदों तथा षट्दर्शना दकं साथ तुलनात्मक अध्ययनको बतलाते हुए, उन्हें शास्त्रव्याख्याताके रूपमें चुननेके लिये देहली जैनसमाजके विवेककी प्रशंसा की गई, जिससे दो बड़े लाभ हुए-एक तो अच्छी समझमें आने योग्य भाषामें नई शैलीसे शास्त्रका व्याख्यान सुननेको मिला; दूसरे लगभग हजार रुपयकी वह रकम बची जो प्रायः हरसाल किसी अच्छे पंडितको बुलाने में खर्च होजाया करती थी। जनताकं अनुराधपर मैंने भी समयोपयोगी दो शब्द कहे। अन्तमें नम्रता और कृतज्ञतादिके भावोंसे भरा हुश्रा भाई जयभगवानका भाषण हुआ और उसमें आपकी भावी समाजसेवाओंका भी कितना ही आभास . मिला । अस्तु, जो ' अभिनन्दनपत्र' आपको स्थलाक्षरोंमें भेंट किया गया वह सूक्ष्माक्षरोंमें 'अमेकान्त' के पाठकों के जानने के लिये नीचे दिया जाता है। -सम्पादक T सेवामें, श्रीमान् विद्वदर्य धर्मवत्सल पं० जयभगवानजी बी०ए०, एलएल. बी. वकील, पानीपत श्रीमन् जयभगवान ! गुणी-जनके मन-भावन, दर्शनीय विद्वान् परमज्ञानाम्बुज पावन । तुलनात्मक है दृष्टि नीतिमय वचन तुम्हारे, वोर प्रभूके भक्त धन्य तुम बंधु हमारे ।। स्वाथ और सम्मानकी नहि इच्छा तव पास है। अनेकान्तमयि-धर्मका हृदय तुम्हारे वास है वेद और वेदान्त उपनिषद् मनन करे हैं, पाश्चात्य विज्ञान और सिद्धान्त पढ़े हैं। पदर्शनका तत्व हृदयमें सतत् भरा है, नूतन शैली महित परम उपदेश करा है ॥ नात्मक जिनधर्मका करें विवेचन आप हैं। सबके मापनके लिये स्याद्वादमयि माप हैं ॥२॥ विश्वोद्धारक जैनधर्मके --हो -व्याख्याता, प्रवचन सुन आनन्द भये हम पाई साता। जैनजाति-कुलचंद्र विभा, तुम हो उपकारी, पानीपत शुभठाम जहाँ तुमसे सुविचारी ॥ सज्जनताकी मूर्ति ! हम रखते श्रद्धा आपमें | करते मन-रंजन सभी, तव गुणकीर्ति-कलापमें ॥३॥ की यह हमपर कृपा यहाँ जो आप पधारे, संवा हमसे बनी नाहिं नैननके तारे! हृदय विशाल महान वचन शीतल जिमि चंदन, प्रेम-भावसे करें भ्रात हम तव अभिनन्दन । - समदर्शी विद्वान अति जयभगवान उदार हैं। अर्पित श्रद्धाभाषसे हार्दिक ये उद्गार हैं ॥४॥ __ भाद्रपद शुक्ला १५ । ... कृपाकांक्षी-सदस्य शास्त्रसभा .. . वीर निर्वाण सं० २४६७ , . श्री दिगम्बर जैन नयामन्दिर, धर्मपुरा, देहली। Je.. Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्तके सहायक जिन सजनोंने अनेकान्तकी ठोस सेवाओं के प्रति आशा है अनेकान्तके प्रेमी दूसरे सज्जन भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए, उसे घाटेकी चिन्ता आपका अनुकरण करेंगे और शीघ्र ही सहायक स्कीम से मुक्त रहकर निराकुलतापूर्वक अपने कार्य में प्रगति को सफल बनाने में अपना सहयोग प्रदान करके यश के भागी बनेंगे। करने और अधिकाधिक रूपसे समाज सेवाओं में अग्रसर होनेके लिये सहायताका वचन दिया है और नोट-जिन रकमों के सामने * यह चिन्ह दिया है वे इस प्रकार अनेकान्तकी सहायक श्रेणी में अपना नाम पूरी प्राप्ती हो चुकी है। लिखाकर अनेकान्तके संचालकोंको प्रोत्साहित किया तृतीय मार्ग से प्राप्त हुई सहायता है उनके शुभ नाम सहायताको रकम सहित इस द्वितीय मार्ग से प्राप्त हुई सहायता अनेकान्त की प्रकार हैं पूर्व किरणों में प्रकाशित हो चुकी है / तृतीय मार्ग से * 125) बा. छोटेलालजी जैन रईस, कलकत्ता।। प्राप्त हुई सहायता इस प्रकार है जिसके लिये दातार *101) बा० अजितप्रसादजी जैन एडवोकेट, लखनऊ महानुभाव धन्यवाद के पात्र हैं। * 101) बा० बहादुरसिंहजी सिंघी, कलकत्ता / 11) बा० राजकृष्ण जी जैन, दरियागंज, देहली 5) कुँवर लक्ष्मीनारायणजी जैन छावड़ा, कलकत्ता 100) साहू यांसप्रसादजी जैन, लाहौर / 5) ला० जम्बूप्रसादजी जैन रईस व बैंकर, मेरठ। * 100) साहू शान्तिप्रसादजी, जैन डालमियानगर। 4) बा० ज्योति सादजी जैन, एम. ए. वकील, मेरठ * 100) बा० शांतिनाथ सुपुत्र बा नन्दलालजी जैन, 4) ला० फूलचन्द नेमचन्दजी झावुक जैन, फलोधी कलकत्ता। 2) ला मामराजजी जैन, बूढाखेड़ी। 100) ला० तनसुखरायजी जैन न्यू देहली। 2) बा० गोपीलालजी जैन, लश्कर ग्वालियर। *100) सेठ जोखाराम बैजनाथजी सरावगी, कलकत्ता 2) स्व० ला० भिक्खीमलजी जैन मुनीम, मेरठ। 100) बा० लालचन्दजी जैन, एडवोकेट, रोहतक। 1) बा० छुट्टनलालजी जैन मुख्तार, मेरठ। 100) बा० जयभगवानजीवकील आदि जैन पंचान 1) बा० कैलाशचन्दजी जैन बी.एस.सी., मेरठ / पानीपत। 1) बा० शीतलप्रसादजी जैन रिठानेवाले, मेरहा। *51) राब० उलफतरायजी जैन इन्जिनियर, मेरठ अनेकान्त की सहायता के चार मार्ग *50) ला० दलीपसिंह काग़जी और उनकी मार्फत, देहली। (1) 25), 50), 100) या इससे अधिक रकम देकर 25) पं० नाथूरामजी प्रेमी, हिन्दी ग्रन्थ-रत्नाकर सहायकोंकी चार श्रेणियों में से किसीमें अपना नाम लिखाना। (2) अपनी ओरसे असमर्थोंको तथा अजैन संस्थाओं बम्बई। * 25) ला० रूड़ामलजी जैन, शामियाने वाले, को अनेकान्त फ्री बिना मूल्य) या अर्धमूल्यमें भिजवाना। और इस तरह दूसरोंको अनेकान्तके पढ़नेकी सविशेष प्रेरणा सहारनपुर। करना / (इस मदमें सहायता देने वालोंकी ओरसे प्रत्येक *25) बा० रघुवरदयालजी, एम. ए. करोलबाग, दस रुपयेकी सहायताके पीछे अनेकान्त चारको फ्री अथवा देहली। आठको अर्धमूल्य में भेजा जा सकेगा। *25 सेठ गुलाबचन्दजी जैन टोंग्या, इन्दौर / (3) उत्सव-विवाहादि दानके अवसरों पर अनेकान्तका * 25 ला० बाबूराम अकलंकप्रसादजी जैन, तिस्सा बराबर खयाल रखना और उसे अच्छी सहायता भेजना (मुम्न०) तथा भिजवाना, जिससे अनेकान्त अपने अच्छे विशेषाङ्क 25) मुंशी सुमतप्रसादजी जैन, रिटायर्ड अमीन, निकाल सके, उपहार ग्रंथोंकी योजना कर सके और उत्तम लेखों पर पुरस्कार भी दे सके / स्वतः अपनी ओर पहार सहारनपुर। ग्रंथोंकी योजना भी इस मदमें शामिल होगी। *25) ला० दीपचन्दजी जैन रईस, देहरादून। (4) अनेकान्तके ग्राहक बनना.. दसरोंको जनाला और * २मंद्रिका प्रकाशक पाल परमानौशा खीसेवामनिदारा, सरसावाले दियो न्यासललाल श्रीवास्तव द्वारा लावास्तवासम मादता / * 24/ संवाई. सिंघई धर्मदास भगवानंदासजी जैन, सामग्री जुटाना तथा उसमें प्रकाशित होने के लिये उपयोगी सतना। चित्रोंकी योजना करना, कराना। व्यवस्थापक अनेकान्त' ग्रंथोंकी मानेकान्तक श्रीवास्तवाल होने के