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नमो नमो निम्मलदंसणस्स
बाल ब्रह्मचारी श्री नेमिनाथाय नमः
पूज्य आनन्द- क्षमा-ललित - सुशील-सुधर्मसागर-गुरूभ्यो नमः
आगम-८
अंतकृत्-दशा आगमसूत्र हिन्दी अनुवाद
अनुवादक एवं सम्पादक
आगम दीवाकर मुनि दीपरत्नसागरजी
[ M.Com. M.Ed. Ph.D. श्रुत महर्षि ]
आगम हिन्दी अनुवाद-श्रेणी पुष्प-८
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, ' अंतकृत् दशा '
क्रम
१
२
३
४
वर्ग पहेला
वर्ग- दुसरा
वर्ग - तिसरा
वर्ग - चौथा
विषय
आगमसूत्र-८- ‘अंतकृत्-दशा' अंगसूत्र- ८ - हिन्दी अनुवाद
कहां क्या देखे ?
पृष्ठ
क्रम
०५
०७
०८
१६
५
६
७
८
वर्ग- पांचवां
वर्ग छट्ठा
वर्ग- सातवां
वर्ग आठवां
वर्ग/अध्ययन / सूत्रांक
दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा)" आगमसूत्र - हिन्द-अनुवाद”
विषय
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१७
२०
२७
२८
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
४५ आगम वर्गीकरण सूत्र क्रम
क्रम
आगम का नाम
आगम का नाम
सूत्र
०१ | आचार
अंगसूत्र-१
२५
आतुरप्रत्याख्यान
पयन्नासूत्र-२
सूत्रकृत्
२६
पयन्नासूत्र-३
स्थान
महाप्रत्याख्यान २७ भक्तपरिज्ञा
| तंदुलवैचारिक
पयन्नासूत्र-४
समवाय
पयन्नासूत्र-५
२९
संस्तारक
भगवती ०६ ज्ञाताधर्मकथा
अंगसूत्र-२ अंगसूत्र-३ अंगसूत्र-४ अंगसूत्र-५ अंगसूत्र-६ अंगसूत्र-७ अंगसूत्र-८ अंगसूत्र-९ अंगसूत्र-१० अंगसूत्र-११ उपांगसूत्र-१
३०.१ | गच्छाचार ३०.२ | चन्द्रवेध्यक
उपासकदशा
अंतकृत् दशा
गणिविद्या
पयन्नासूत्र-६ पयन्नासूत्र-७ पयन्नासूत्र-७ पयन्नासूत्र-८ पयन्नासूत्र-९ पयन्नासूत्र-१० छेदसूत्र-१
देवेन्द्रस्तव वीरस्तव
अनुत्तरोपपातिकदशा
प्रश्नव्याकरणदशा ११ | विपाकश्रुत
| औपपातिक
३४ । निशीथ
१२
३५
बृहत्कल्प
छेदसूत्र-२
१३
उपांगसूत्र-२
व्यवहार
राजप्रश्चिय | जीवाजीवाभिगम
१४
उपांगसत्र-३
३७
१५
प्रज्ञापना
उपागसूत्र-४
दशाश्रुतस्कन्ध
जीतकल्प ३९ महानिशीथ
उपांगसूत्र-५
१७
उपांगसूत्र-६
१६ | सूर्यप्रज्ञप्ति
चन्द्रप्रज्ञप्ति | जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति १९ | निरयावलिका २० | कल्पवतंसिका
छेदसूत्र-३ छेदसूत्र-४ छेदसूत्र-५ छेदसूत्र-६ मूलसूत्र-१ मूलसूत्र-२ मूलसूत्र-२ मूलसूत्र-३ मूलसूत्र-४ चूलिकासूत्र-१
१८
उपांगसूत्र-७
उपागसूत्र-८
४० ।
आवश्यक ४१.१ | ओघनियुक्ति
| पिंडनियुक्ति
दशवैकालिक ४३ उत्तराध्ययन
नन्दी
४२
पुष्पिका
उपांगसूत्र-९ उपांगसूत्र-१० उपांगसूत्र-११ उपांगसूत्र-१२
पुष्पचूलिका
अनुयोगद्वार
चूलिकासूत्र-२
वृष्णिदशा २४ | चतु:शरण
पयन्नासूत्र-१
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
[49]
06
02
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05
.5
09
मुनि दीपरत्नसागरजी प्रकाशित साहित्य आगम साहित्य
आगम साहित्य साहित्य नाम बक्स क्रम
साहित्य नाम मूल आगम साहित्य:
| 147 6 आगम अन्य साहित्य:|-1- आगमसुत्ताणि-मूलं print
-1- माराम थानुयोग -2- आगमसुत्ताणि-मूलं Net
[45]] -2- आगम संबंधी साहित्य -3- आगममञ्जूषा (मूल प्रत) | [53] -3- ऋषिभाषित सूत्राणि | आगम अनुवाद साहित्य:165 -4- आगमिय सूक्तावली
01 -1-मागमसूत्रगुती मनुवाह | [47] आगम साहित्य- कुल पुस्तक
516 -2- आगमसूत्र हिन्दी अनुवाद Net: | [47] -3- Aagam Sootra English Trans. [11] -4- सामसूत्र सटी5 J४२राती अनुवाद | [48] -5- आगमसूत्र हिन्दी अनुवाद print [12]
अन्य साहित्य:आगम विवेचन साहित्य:
| 171 1तत्त्वात्यास साहित्य-1- आगमसूत्र सटीक
[46] 2 सूत्रात्यास साहित्य-2- आगमसूत्राणि सटीकं प्रताकार-11 [51]] 3 | व्या२ए। साहित्य-3- आगमसूत्राणि सटीकं प्रताकार-2009]/ 4
વ્યાખ્યાન સાહિત્ય.
04 -4- आगम चूर्णि साहित्य
| [09]]
જિનભક્તિ સાહિત્ય|-5- सवृत्तिक आगमसूत्राणि-1 [40] 6 aoसाहित्य-6- सवृत्तिक आगमसूत्राणि-2 | [08] 7 माराधना साहित्य -7- सचूर्णिक आगमसुत्ताणि [08] 8 परियय साहित्य
04 आगम कोष साहित्य:
| 149 ५४न साहित्य-1- आगम सद्दकोसो
[04] 10 तीर्थं२ संक्षिप्त र्शन -2- आगम कहाकोसो [01] 11 ही साहित्य
05 -3-आगम-सागर-कोष: | [05] | 12ीपरत्नसागरना वधुशोधनिबंध
05 -4- आगम-शब्दादि-संग्रह (प्रा-सं-गु) [04] આગમ સિવાયનું સાહિત્ય કૂલ પુસ્તક
85 आगम अनुक्रम साहित्य:-ROAD 09 -1- याराम विषयानुभ- (भूप) 02 | 1-आगम साहित्य (कुल पुस्तक) 51 -2- आगम विषयानुक्रम (सटीकं) 04 2-आगमेतर साहित्य (कुल 08 -3- आगम सूत्र-गाथा अनुक्रम
दीपरत्नसागरजी के कुल प्रकाशन | 60 છે મુનિ દીપરત્નસાગરનું સાહિત્ય 1 मुनिहीपरत्नसागरनुं आगम साहित्य [इस पुस्त8 516] तेना इस पाना [98,300] 2 | भुमिहीपरत्नसागरनुं अन्य साहित्य [हुत पुस्तs 85] तना हुआ पाना [09,270] 3 भुमिहीपरत्नसागर संलित तत्वार्थसूत्र'नी विशिष्ट DVD नास पाना [27,930] |
सभा। प्राशनोहुल 5०१ + विशिष्ट DVD हुआ पाना 1,35,500
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मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा). आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
[८]अंतकृत् दशा अंगसूत्र-८-हिन्दी अनुवाद
वर्ग-१
सूत्र-१
उस काल और उस समय में चंपा नाम की नगरी थी । पूर्णभद्र चैत्य था । उस काल और उस समय में आर्य सुधर्मा स्वामी चंपा नगरी में पधारे । नगर-निवासी जन नीकले । यावत् वापस लौटे । उस काल आउर उस समय में आर्य सुधर्मा स्वामी के आर्य जंबू पर्युपासना करते हुए इस प्रकार बोले- "हे भगवन् ! यदि श्रुतधर्म की आदि करने वाले तीर्थंकर, शाश्वत स्थान को प्राप्त श्रमण भगवान् ने सप्तम अंग उपासकदशाङ्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है, हे भगवन् ! अब यह बतलाओ-कि अष्टम अंग अन्तकृद्दशाङ्ग का क्या अर्थ बताया है ?' "जम्बू ! श्रमण भगवान ने अष्टम अन्तकृद्दशांग के आठ वर्ग प्रतिपादन किए हैं।" "भगवन् ! यदि श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त महावीर स्वामी ने आठवे अंग अन्तकृद्दशा के आठ वर्ग कथन किये हैं, तो भगवन् ! अन्तकृद्दशांग सूत्र के प्रथम वर्ग के कितने अध्ययन प्रतिपादन किये हैं ?'' 'जंबू ! यावत् मोक्षप्राप्त महावीर स्वामी ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा के प्रथम वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं । जैसे कि
सूत्र -२
गौतम, समुद्र, सागर, गंभीर, स्तिमित, अचल, काम्पिल्य, अक्षोभ, प्रसेनजित् और विष्णुकुमार | सूत्र-३
"भगवन् ! यदि श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त महावीर ने आठवें अंग अन्तगडसूत्र के प्रथम वर्ग के दश अध्ययन कथन किये हैं तो हे भगवन् ! अन्तगडसूत्र के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ?" "जंबू ! उस काल और उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी । वह बारह योजन लम्बी, नौ योजन चौड़ी, वैश्रमण देव कुबेर के कौशल से निर्मित, स्वर्ण-प्राकारों से युक्त, पंचवर्ण के मणियों से जटित कंगूरों से सुशोभित थी और कुबेर की नगरी सदृश थी । प्रमोद और क्रीड़ा का स्थान थी, साक्षात् देवलोक के समान देखने योग्य, चित्त को प्रसन्न करने वाली, दर्शनीय थी, अभिरूप थी, प्रतिरूप थी । उस द्वारका नगरी के बाहिर ईशान कोण में रैवतक पर्वत था । उस रैवतक पर्वत पर नन्दनवन नाम का उद्यान था (वर्णन) । वहाँ सुरप्रिय यक्ष का मंदिर था, वह बहुत प्राचीन था और चारों ओर से वनखंड से घिरा हुआ था । उस वनखंड के मध्य में एक अशोक वृक्ष था ।'' द्वारका नगरी में कृष्ण वासुदेव राजा राज्य करते थे, वे महान् थे । वे समुद्रविजय प्रमुख दश दशार्ह, बलदेव प्रमुख पाँच महावीर, प्रद्युम्न प्रमुख साढ़े तीन करोड़ राजकुमार, शाम्ब आदि प्रमुख ६० हजार दुर्दान्त कुमार, महासेन प्रमुख १६ हजार राजा, रुक्मिणी आदि १६ हजार रानियाँ, अनंगसेना आदि हजारों गणिकाएं, तथा और भी अनेकों ऐश्वर्यशाली, यावत् सार्थवाह-इन सब पर तथा द्वारका एवं आधे भारतवर्ष पर आधिपत्य करके यावत् विचरते थे । उस द्वारका नगरी में अन्धकवृष्णि राजा था । वह हिमवान्-पर्वत की तरह महान् था । अन्धकवृष्णि राजा की धारिणी नाम की रानी थी। कभी वह धारिणी रानी अन्यत्र वर्णित उत्तम शय्या पर शयन कर रही थी, जिसका वर्णन महाबल समान समझ लेना चाहिए । तत्पश्चात्सूत्र -४
स्वप्न-दर्शन, पुत्रजन्म, उसकी बाल-लीला, कलाज्ञान, यौवन, पाणिग्रहण, रम्य प्रासाद एवं भोगादि-(यह सब वर्णन महाबल जैसा ही समझना)।
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक सूत्र-५
विशेष यह कि उस बालक का नाम गौतम रखा गया, उसका एक ही दिन में आठ श्रेष्ठ राजकुमारियों के साथ पाणिग्रहण करवाया गया तथा दहेज में आठ-आठ प्रकार की वस्तुएं दी गईं । उस काल तथा उस समय श्रुतधर्म का आरेभ करने वाले, धर्म के प्रवर्तक अरिष्टनेमि भगवान् यावत् विचरण कर रहे थे । चार प्रकार के देव उपस्थित हुए । कृष्ण वासुदेव भी वहाँ आए । तदनन्तर उनके दर्शन करने को गौतम कुमार भी तैयार हुए । मेघ कुमार श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास गये थे वैसे गौतम कुमार ने भी भगवान अरिष्टनेमि से धर्मश्रवण किया । विशेष यह कि मैं अपने मातापिता से पूछकर आपके पास दीक्षा ग्रहण करूँगा । जिस प्रकार श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास मेघ कुमार दीक्षित हुए थे यावत् उसी प्रकार गौतम कुमार ने भी पंचमुष्टिक लोच किया । गौतम निर्ग्रन्थ-प्रवचन को सन्मुख रखकर भगवान की आज्ञाओं का पालन करते हुए विचरने लगे।
इसके पश्चात् गौतम अनगार ने अन्यदा किसी समय भगवान अरिष्टनेमि के सान्निध्य में रहने वाले आचार, विचार की उच्चता को पूर्णतया प्राप्त स्थविरों के पास सामायिक से लेकर आचारांगादि ११ अंगों का अध्ययन किया यावत् आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । अरिहंत भगवान अरिष्टनेमि ने अब द्वारका नगरी के नन्दन वन से विहार कर दिया और वे अन्य जनपदों में विचरण करने लगे । गौतम मुनि अवसर पाकर भगवान अरिष्टनेमि की सेवा में उपस्थित हुए । विधिपूर्वक वंदना, नमस्कार करने के अनन्तर उन्होंने भगवान से निवेदन किया"भगवन् ! मेरी ईच्छा है यदि आप आज्ञा दें तो मैं मासिकी भिक्षु-प्रतिमा की आराधना करूँ ।' भगवान से आज्ञा पाकर वे साधना में लीन हो गए । स्कन्धक मुनि के समान मुनि गौतम ने भी बारह भिक्षु-प्रतिमाओं का आराधन करके गुणरत्न नामक तप का भी वैसे ही आराधन किया, चिंतन किया, भगवान से पूछा तथा स्थविर मुनियों के साथ वैसे ही शत्रुजय पर्वत पर चढ़े । १२ वर्ष की दीक्षा पर्याय पूर्ण कर एक मास की संलेखना द्वारा यावत् सिद्ध, बुद्ध, मुक्त, सकल कर्मजन्य संतापों से रहित एवं सब प्रकार के दुःखों से विमुक्त हो गए।
"हे जंबू ! भगवान महावीर ने आठवें अंतगडसूत्र के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययनों का यह अर्थ कहा है। जिस प्रकार गौतम का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार समुद्र, सागर, गम्भीर, स्तिमित, अचल, काम्पिल्य, अक्षोभ, प्रसेनजित और विष्णु, इन नव अध्ययनों का अर्थ भी समझ लेना । सब के पिता अन्धकवृष्णि थे । माता धारिणी थी। सब का वर्णन एक जैसा है। इस प्रकार दस अध्ययनों के समुदाय रूप प्रथम वर्ग का वर्णन किया गया है।"
वर्ग-१-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग-२
सूत्र -७
हे जंब ! श्रमण भगवान महावीर ने द्वितीय वर्ग के आठ अध्ययन फरमाये हैं । उस काल और उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी । महाराज अंधकवृष्णि राज्य करते थे। रानी का नाम धारिणी था। उनके आठ पुत्र थेसूत्र-८
अक्षोभ, सागर, समुद्र, हैमवन्त, अचल, धरण, पूर्ण और अभिचन्द्र । सूत्र - ९
प्रथम वर्ग के समान इन आठ अध्ययनों का वर्णन भी समझ लेना । इन्होंने भी गुणरत्न तप का आराधन किया और १६ वर्ष का संयम पालन करके अन्त में शत्रुजय पर्वत पर एक मास की संलेखना द्वारा सिद्धिपद प्राप्त किया।
वर्ग-२-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक वर्ग-३
अध्ययन-१ सूत्र-१०
श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अंतगडदशा के तृतीय वर्ग के १३ अध्ययन फरमाये हैं जैसे किअनीयस, अनन्तसेन, अनिहत, विद्वत्, देवयश, शत्रुसेन, सारण, गज, सुमुख, दुर्मुख, कूपक, दारुक और अनादृष्टि। भगवन् ! यदि श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त भगवान महावीर ने अन्तगडदशा के १३ अध्ययन बताये हैं तो भगवन् ! अन्तगडसूत्र के तीसरे वर्ग के प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? हे जंबू ! उस काल और उस समय में भद्दिलपुर नामक नगर था । उसके ईशानकोण में श्रीवन नामक उद्यान था । जितशत्रु राजा था । नाग नाम का गाथापति था । वह अत्यन्त समृद्धिशाली यावत् तेजस्वी था । उस नाग गाथापति की सुलसा नाम की भार्या थी । वह अत्यन्त सुकोमल यावत् रूपवान् थी । उस नाग गाथापति का पुत्र सुलसा भार्या का आत्मज अनीयस नामक कुमार था । (वह) सुकोमल था यावत् सौन्दर्य से परिपूर्ण था । पाँच धायमाताओं से परिरक्षित दृढ़प्रतिज्ञ कुमार की तरह सर्व वृत्तान्त समझना । यावत् गिरिगुफा में स्थित चम्पक वृक्ष के समान सुखपूर्वक बढ़ने लगा । तत्पश्चात् अनीयस कुमार को आठ वर्ष से कुछ अधिक उम्र वाला हुआ जानकर माता-पिता ने उसे कलाचार्य के पास भेजा । तत्पश्चात् कलाचार्य ने अनीयस कुमार को बहत्तर कलाएं सूत्र से, अर्थ से और प्रयोग से सिद्ध करवाई तथा सिखलाई-यावत् वह भोग भोगने में समर्थ हो गया।
तब माता-पिता ने अनीयस कुमार को बाल्यावस्था से पार हुआ जानकर बत्तीस उत्तम इभ्य-कन्याओं का एक ही दिन पाणिग्रहण कराया । विवाह के अनन्तर वह नाग गाथापति अनीयस कुमार को प्रीतिदान देते समय बत्तीस करोड़ चाँदी के सिक्के तथा महाबल कुमार की तरह अन्य बत्तीस प्रकार की अनेकों वस्तुएं दी । उस काल तथा उस समय श्रीवन नामक उद्यान में भगवान अरिष्टनेमि स्वामी पधारे । यथाविधि अवग्रह की याचना करके संयम एवं तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । जनता उनका धर्मोपदेश सूनने के लिए उद्यान में पहुँची और धर्मोपदेश सून कर अपने-अपने घर वापस चली गई। भगवंत के दर्शन के लिए अनीयस कुमार भी आया यावत् गौतमकुमार की तरह उसने दीक्षा ग्रहण की । दीक्षा लेने के अनन्तर उन्होंने सामायिक से लेकर चौदह पूर्वो का अध्ययन किया । बीस वर्ष दीक्षा का पालन किया । अन्त समय में एक मास की संलेखना करके शत्रुजय पर्वत पर सिद्ध गति को प्राप्त किया । हे जम्बू ! इस प्रकार श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अष्टम अंग अन्तगड के तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का अर्थ प्रतिपादन किया था।
वर्ग-३ अध्ययन-२ से ६ सूत्र - ११
इसी प्रकार अनन्तसेन से लेकर शत्रुसेन पर्यन्त अध्ययनों का वर्णन भी जान लेना चाहिए । सब का बत्तीस-बत्तीस श्रेष्ठ कन्याओं के साथ विवाह हुआ था और सब को बत्तीस-बत्तीस पूर्वोक्त वस्तुएं दी गई । बीस वर्ष तक संयम का पालन एवं १४ पूर्त का अध्ययन किया । अन्त में एक मास की संलेखना द्वारा शत्रुजय पर्वत पर पाँचों ही सिद्ध गति को प्राप्त हुए।
वर्ग-३ अध्ययन-७ सूत्र-१२
उस काल तथा उस समय में द्वारका नगरी थी । वसदेव राजा था । रानी धारिणी थी। उसने गर्भाधान के पश्चात् स्वप्नमें सिंह देखा । समय आने पर बालक को जन्म दिया, उसका नाम सारणकुमार रखा । उसे विवाहमें ५०-५० वस्तुओं का दहेज मिला । सारणकुमारने सामायिक से १४ पूर्वो का अध्ययन किया । बीस वर्ष दीक्षापर्याय का पालन किया । शेष सब वृत्तान्त गौतम की तरह । शत्रुजयपर्वत पर एक मास संलेखना कर यावत् सिद्ध हुए।
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग-३ अध्ययन-८ सूत्र-१३
भगवन् ! तृतीय वर्ग के आठवें अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? हे जंबू ! उस काल, उस समय में द्वारका नगरीमें प्रथम अध्ययनमें किये गये वर्णन के अनुसार यावत् अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान पधारे । उस काल, उस समय भगवान नेमिनाथ के अंतेवासी-शिष्य छ मुनि सहोदर भाई थे । वे समान आकार, त्वचा और समान अवस्थावाले प्रतीत होते थे । उन का वर्ण नीलकमल, महिष के शृंग के अन्तर्वर्ती भाग, गुलिका-रंग विशेष
और अलसी समान था । श्रीवत्स से अंकित वक्ष वाले और कुसुम के समान कोमल और कुंडल के समान धुंघराले बालों वाले वे सभी मुनि नलकूबर के समान प्रतीत होते थे । तब वे छहों मुनि जिस दिन मुंडित होकर आगार से अनगार धर्म में प्रव्रजित हए, उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि को वंदना नमस्कार कर इस प्रकार बोले-'हे भगवन् ! आपकी आज्ञा पाकर हम जीवन पर्यन्त निरन्तर बेले-बेले तप द्वारा आत्मा कद भावित करते हुए विचरण करें ।' अरिहंत अरिष्टनेमिने कहा-देवानुप्रियों! जैसे तुम्हें सुख हो, करो, शुभ कर्म करनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिए । तब भगवान की आज्ञा पाकर उन्होंने जीवनभर के लिए बेले-बेले की तपस्या करते हुए यावत् विचरण करने लगे।
तदनन्तर उन छहों मुनियों ने अन्यदा किसी समय, बेले की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय किया और गौतम स्वामी के समान यावत् निवेदन करते हैं-भगवन् ! हम बेले की तपस्या के पारणे में आपकी आज्ञा लेकर दो-दो के तीन संघाड़ों से द्वारका नगरी में यावत् भिक्षा हेतु भ्रमण करना चाहते हैं । तब उन छहों मुनियों ने अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा पाकर प्रभु को वंदन नमस्कार किया । वंदन नमस्कार कर वे भगवान् अरिष्टनेमि के पास से सहस्राम्रवन उद्यान से प्रस्थान करते हैं। फिर वे दो दो के तीन संघाटकों में सहज गति से यावत् भ्रमण करने लगे।
उन तीन संघाटकों में से एक संघाटक द्वारका नगरी के ऊंच-नीच-मध्यम घरों में, एक घर से दूसरे घर, भिक्षाचर्या के हेतु भ्रमण करता हुआ राजा वसुदेव की महारानी देवकी के प्रासाद में प्रविष्ट हुआ । उस समय वह देवकी रानी उन दो मुनियों के एक संघाड़े को अपने यहाँ आता देखकर हृष्टतुष्ट होकर यावत् आसन से उठकर वह सात-आठ कदम मुनियुगल के सम्मुख गई। सामने जाकर उसने तीन बार दक्षिण की ओर से उनकी प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा कर उन्हें वन्दन-नमस्कार किया । जहाँ भोजनशाला थी वहाँ आई । भोजनशाला में आकर सिंहकेसर मोदकों से एक थाल भरा और थाल भर कर उन मुनियों को प्रतिलाभ दिया । पुनः वन्दन-नमस्कार करके उन्हें प्रतिविसर्जित किया । पश्चात उन छह सहोदर साधओं में से दसरा संघाटक भी देवकी के प्रासाद में 3 उन्हें प्रति विसर्जित किया । इसके बाद मुनियों का तीसरा संघाटक आया यावत् उसे भी देवकी देवी प्रतिलाभ देकर वह इस प्रकार बोली-''देवानुप्रियो ! क्या कृष्ण वासुदेव की इस बारह योजन लम्बी, नव योजन चौड़ी प्रत्यक्ष स्वर्गपुरी के समान द्वारका नगरी में श्रमण निर्ग्रन्थों को यावत् आहार-पानी के लिए जिन कुलों में पहले आ चूके हैं, उन्हीं कुलों में पुनः आना पड़ता है ?''
देवकी द्वारा इस प्रकार कहने पर वे मुनि इस प्रकार बोले-''देवानुप्रिये ! ऐसी बात तो नहीं है कि कृष्ण वासुदेव की यावत् प्रत्यक्ष स्वर्ग के समान, इस द्वारका नगरी में श्रमण-निर्ग्रन्थ उच्च-नीच-मध्यम कुलों में यावत् भ्रमण करते हुए आहार-पानी प्राप्त नहीं करते । और मुनिजन भी जिन घरों से एक बार आहार ले आते हैं, उन्हीं घरों से दूसरी या तीसरी बार आहारार्थ नहीं जाते हैं । "देवानुप्रिये ! हम भद्दिलपुर नगरी के नाग गाथापति के पुत्र
और उनकी सुलसा भार्या के आत्मज छह सहोदर भाई हैं । पूर्णतः समान आकृति वाले यावत् हम छहों भाइयों ने अरिहंत अरिष्टनेमि के पास धर्म-उपदेश सूनकर संसार-भय से उद्विग्न एवं जन्ममरण से भयभीत हो मुंडित होकर यावत् श्रमणधर्म की दीक्षा ग्रहण की । उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि को वंदन-नमस्कार कर इस प्रकार का अभिग्रह करने की आज्ञा चाही-हे भगवन् ! आपकी अनुज्ञा पाकर हम जीवन पर्यन्त बेले-बेले की तपस्या से अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरना चाहते हैं ।'' यावत् प्रभु ने कहा-''देवानुप्रियों ! जिससे तुम्हें सुख हो
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक वैसा करो, प्रमाद न करो । उसके बाद अरिहंत अरिष्टनेमि की अनुज्ञा प्राप्त होने पर हम जीवनभर के लिए निरंतर बेले-बेले की तपस्या करते हुए विचरण करने लगे। आज हम छहों भाई बेले की तपस्या के पारण के दिन यावत् अरिष्टनेमि की आज्ञा प्राप्त कर, तीन संघाटकोंमें भिक्षार्थ भ्रमण करते तुम्हारे घर आ पहुंचे हैं। तो देवानुप्रिये! ऐसी बात नहीं है कि पहले दो संघाटकों में जो मुनि तुम्हारे यहाँ आये थे वे हम नहीं हैं । वस्तुतः हम दूसरे हैं ।'' उन मुनियों ने देवकी देवी को इस प्रकार कहा और यह कहकर वे जिस दिशा से आये थे उसी दिशा की ओर चले गए।
इस प्रकार की बात कहकर उन श्रमणों के लौट जाने के पश्चात् देवकी देवी को इस प्रकार का आध्यात्मिक, चिन्तित, प्रार्थित, मनोगत और संकल्पित विचार उत्पन्न हुआ कि "पोलासपुर नगर में अतिमुक्त कुमार नामक श्रमण ने मुझे बचपन में इस प्रकार कहा था-हे देवानुप्रिये देवकी ! तुम आठ पुत्रों को जन्म दोगी, जो परस्पर एक दूसरे से पूर्णतः समान नलकूबर के समान प्रतीत होंगे । भरतक्षेत्र में दूसरी कोई माता वैसे पुत्रों को जन्म नहीं देगी । पर वह कथन मिथ्या नीकला, क्योंकि प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है कि अन्य माताओं ने भी ऐसे यावत् पुत्रों को जन्म दिया है । अतः मैं अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान की सेवा में जाऊं, वंदन-नमस्कार करूँ, और इस प्रकार के उक्तिवैपरीत्य के विषय में पर्छ । ऐसा सोचकर कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया और बुलाकर कहा"शीघ्रगामी यानप्रवर-उपस्थित किया । तब देवानन्दा ब्राह्मणी की तरह देवकी देवी भी उपासना करने लगी।
तदनन्तर अरिहंत अरिष्टनेमि देवकी को सम्बोधित कर बोले-'हे देवकी ! क्या इन छह अनगारों को देखकर तुम्हारे मन में इस प्रकार का संकल्पित विचार उत्पन्न हुआ है कि-पोलासपुर नगर में अतिमुक्त कुमार ने तुम्हें एक समान, नलकूबरवत् आठ पुत्रों को जन्म देने का कथन किया था, यावत् वन्दन को नीकली और नीकलकर शीघ्रता से मेरे पास चली आई हो । देवकी देवी ! क्या यह बात सत्य है ? 'हाँ प्रभु, सत्य है।
अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा- देवानुप्रिये! उस काल उस समयमें भद्दिलपुर नामक नगरमें नाग गाथापति था वह पूर्णतया सम्पन्न था । नागरिकों में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी । उस नाग गाथापति की सुलसा नाम की भार्या थी। उस सुलसा गाथापत्नी को बाल्यावस्था में ही किसी निमित्तज्ञ ने कहा था-'यह बालिका निंदु होगी । तत्पश्चात् वह सुलसा बाल्यकाल से हरिणैगमेषी देव की भक्त बन गई। उसने हरिणैगमेषीदेव की प्रतिमा बनवाई । प्रतिमा बनवा कर प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके यावत् दुःस्वप्न निवारणार्थ प्रायश्चित्त कर आर्द्र साड़ी पहने हुए उसकी बहुमूल्य पुष्पोंसे अर्चना करती । पुष्पों द्वारा पूजा के पश्चात् घुटने टेककर पाँचों अंग नमाकर प्रणाम करती, तदनन्तर आहार करती, निहार करती एवं अपनी दैनन्दिनी के अन्य कार्य करती । तत्पश्चात् उस सुलसा गाथापत्नी की उस भक्तिबहुमानपूर्वक की गई शुश्रूषा से देव प्रसन्न हो गया । पश्चात् हरिणैगमेषी देव सुलसा गाथापत्नी को तथा तुम्हें दोनों को समकालमें ही ऋतुमती करता और तब तुम दोनों समकालमें ही गर्भ धारण करती, और समकाल में ही बालक को जन्म देतीं । प्रसवकाल में वह सुलसा गाथापत्नी मरे हुए बालक को जन्म देती । तब वह हरिणैगमेषी देव सुलसा पर अनुकंपा करने के लिए उसके मृत बालक को हाथों में लेता और लेकर तुम्हारे पास लाता । इधर उसी समय तुम भी नव मास का काल पूर्ण होने पर सुकुमार बालक को जन्म देती । हे देवानुप्रिये ! जो तुम्हारे पुत्र होते उनको हरिणैगमेषी देव तुम्हारे पास से अपने दोनों हाथों में ग्रहण करता और उन्हें ग्रहण कर सुलसा गाथापत्नी के पास लाकर रख देता । अतः वास्तव में हे देवकी ! ये तुम्हारे ही पुत्र हैं, सुलसा गाथापत्नी के पुत्र नहीं है।'
तदनन्तर देवकी देवी ने अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान के पास से उक्त वृत्तान्त को सूनकर और उस पर चिन्तन कर हृष्ट-तुष्ट यावत् प्रफुल्लहृदया होकर अरिष्टनेमि भगवान को वंदन नमस्कार किया । वे छहों मुनि जहाँ विराजमान थे वहाँ आकर उन छहों मुनियों को वंदना नमस्कार करती है । उन अनगारों को देखकर पुत्र-प्रेम के कारण उनके स्तनों से दूध झरने लगा । हर्ष के कारण लोचन प्रफुल्लित हो उठे, कंचुकी के बन्धन टूटने लगे, भुजाओं के आभूषण तंग हो गये, उसकी रोमावली मेघधारा से अभिताडित हुए कदम्ब पुष्प की भाँति खिल उठी। उन छहों मुनियों को निर्निमेष दृष्टि से चिरकाल तक निरखती ही रही । तत्पश्चात् उन छहों मुनियों को वंदननमस्कार करके जहाँ भगवान अरिष्टनेमि विराजमान थे वहाँ आई, अरिहन्त अरिष्टनेमि को वन्दन-नमस्कार करके
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक उसी धार्मिक श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होती है । रथारूढ़ हो जहाँ द्वारका नगरी थी, वहाँ आकर द्वारका नगरी में प्रवेश कर अपने प्रासाद के बाहर की उपस्थानशाला आती है, धार्मिक रथ से नीचे ऊतरकर जहाँ अपना वासागृह था, जहाँ अपनी शय्या थी उस पर बैठ जाती है।
उस समय देवकी देवी को इस प्रकार का विचार, चिन्तन और अभिलाषापूर्ण मानसिक संकल्प उत्पन्न हुआ कि अहो ! मैंने पूर्णतः समान आकृतिवाले यावत् नलकूबर के समान सात पुत्रों को जन्म दिया पर मैंने एक की भी बाल्यक्रीडा का आनन्दानुभव नहीं किया । यह कृष्ण वासुदेव भी छह-छह मास के अनन्तर चरण-वन्दन के लिए मेरे पास आता है, अतः मैं मानती हूँ कि वे माताएं धन्य हैं, जिनकी अपनी कुक्षि से उत्पन्न हुए, स्तन-पान के लोभी बालक. मधुर आलाप करते हए, तुतलाती बोलीसे मन्मन बोलते जिनके स्तनमूल कक्षाभाग करते हैं, फिर उन मुग्ध बालकों को जो माताएं कमल के समान अपने कोमल हाथों द्वारा पकड कर गोदमें बिठाती हैं और अपने बालकों से मधर-मंजल शब्दोंमें बार बार बातें करती हैं। मैं निश्चितरूपेण अधन्य, पुण्यहीन हँ क्योंकि मैंने इनमें से एक पुत्र की भी बालक्रीड़ा नहीं देखी । इस प्रकार देवकी खिन्न मन से यावत् आर्तध्यान करने लगी।
उसी समय वहाँ श्रीकृष्ण वासुदेव स्नान कर यावत् विभूषित होकर देवकी माता के चरण-वंदन के लिए शीघ्रतापूर्वक आए । वे कृष्ण वासुदेव देवकी माता के दर्शन करते हैं, चरणों में वंदन करते हैं । फिर देवकी देवी से इस प्रकार पूछने लगे-'हे माता ! पहले तो मैं जब-जब आपके चरण-वन्दन के लिए आता था, तब-तब आप मुझे देखते ही हृष्ट तुष्ट यावत् आज आर्तध्यान में निमग्न-सी क्यों दिख रही हो?'' कृष्ण द्वारा इस प्रकार का प्रश्न किये जाने पर देवकी देवी कृष्ण वासुदेव से कहने लगी-हे पुत्र ! वस्तुतः बात यह है कि मैंने समान आकृति यावत् समान रूप वाले सात पुत्रों को जन्म दिया । पर मैंने उनमें से किसी एक के भी बाल्यकाल अथवा बाल-लीला का सुख नहीं भोगा । पुत्र ! तुम भी छह छह महीनों के अन्तर से मेरे पास चरण-वंदन के लिए आते हो । अतः मैं ऐसा सोच रही हूँ कि वे माताएं धन्य हैं, यावत् आर्तध्यान कर रही हूँ।
माता की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण वासुदेव देवकी महारानी से इस प्रकार बोले-''माताजी ! आप उदास अथवा चिन्तित होकर आर्तध्यान मत करो । मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मेरा एक सहोदर छोटा भाई उत्पन्न हो।'' इस प्रकार कहकर श्रीकृष्ण ने देवकी माता को इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ वचनों द्वारा धैर्य बंधाया, आश्वस्त किया । श्रीकृष्ण अपनी माता के प्रासाद से नीकले, जहाँ पौषधशाला थी वहाँ आए । आकर अभयकुमार के समान अष्टमभक्त तप स्वीकार करके अपने मित्र देव की आराधना की । विशेषता यह कि इन्होंने हरिणैगमेषी देव की आराधना की । आराधना में अष्टम भक्त तप ग्रहण किया, यावत् हरिणैगमेषी देव आराधना से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण के पास आया । तब श्रीकृष्णने हाथ जोडकर इस प्रकार कहा-हे देवानप्रिय ! आप मुझे एक सहोदर लघुभ्राता दीजिए, यही मेरी ईच्छा है।
तब हरिणैगमेषी देव श्रीकृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोला-''हे देवानुप्रिय ! देवलोक का एक देव वहाँ का आयुष्य पूर्ण होने पर देवलोक से च्युत होकर आपके सहोदर छोटे भाई के रूप में जन्म लेगा और इस तरह आपका मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा, पर वह बाल्यकाल बीतने पर, यावत् युवावस्था प्राप्त होने पर भगवान श्रीअरिष्टनेमी के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करेगा।'' श्रीकृष्ण वासुदेव को उस देव ने दूसरी बार, तीसरी बार भी यही कहा और यह कहने के पश्चात् जिस दिशा से आया था उसी में लौट गया। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण-वासुदेव पौषधशाला से नीकले, देवकी माता के पास आए, आकर देवकी देवी का चरण-वंदन किया, वे माता से इस प्रकार बोले-'हे माता ! मेरा एक सहोदर छोटा भाई होगा ।'' ऐसा कह करके उन्होंने देवकी माता को मधुर एवं इष्ट, यावत् आश्वस्त करके जिस दिशा से प्रादुर्भूत हुए थे उसी दिशा में लौट गए।
तदनन्तर वह देवकी देवी अपने आवासगृह में शय्या पर सोई हुई थी। तब उसने स्वप्न में सिंह को देखा । वह इस प्रकार के उदार यावत् शोभावाले महास्वप्न को देखकर जागृत हुई । देवकी देवी ने स्वप्न का सारा वृत्तांत अपने स्वामी को सूनाया । महाराजा वसुदेव ने स्वप्न पाठकों को बुलवाया और स्वप्नसंबंधि फल के विषय में पूछा
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, ' अंतकृत् दशा '
वर्ग / अध्ययन / सूत्रांक स्वप्न पाठकों ने बताया कि इस स्वप्न के फल स्वरूप देवकी देवी को एक सुयोग्य पुण्यात्मा पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी। माता देवकी भी स्वप्न का फल सूनकर बहुत प्रसन्न हुई । वह देवकी देवी सुखपूर्वक अपने गर्भ का पालन करने लगी । तत्पश्चात् नव मास पूर्ण होने पर माता देवकी ने जातकुसुम समान, रक्तबन्धुजीवक समान, वीरवहुकी समान, लाख के रंग समान विकसीत पारिजात के पुष्प जैसा प्रातःकालिन सूर्य की लालिमा समान, कान्तियुक्त, सर्वजन नयनाभिराम सुकुमाल अंगोवाले यावत् स्वरूपवान एवं गजतुला के समान रक्तवर्ण ऐसे सुकुमाल पुत्र को जन्म दिया । पुत्र का जन्म संस्कार मेघकुमार के समान जानना । "क्योंकि हमारा यह बालक गज के तालु के समान सुकोमल एवं सुन्दर है, अतः हमारे इस बालक का नाम गजसुकुमाल हो ।" इस प्रकार विचार कर उस बालक के माता-पिता ने उसका "गजसुकुमार' यह नाम रखा । शेष वर्णन मेघकुमार के समान समझना । क्रमशः गजसुकुमार भोग भोगने में समर्थ हो गया ।
उस द्वारका नगरी में सोमिल नामक एक ब्राह्मण रहता था, जो समृद्ध था और ऋग्वेद, यावत् ब्राह्मण और पारिव्राजक सम्बन्धी शास्त्रों में बड़ा निपुण था। उस सोमिल ब्राह्मण के सोमश्री नामकी ब्राह्मणी थी। सोमश्री सुकुमार एवं रूपलावण्य और यौवन से सम्पन्न थी । उस सोमिल ब्राह्मण की पुत्री और सोमश्री ब्राह्मणी की आत्मजा सोमा नाम की कन्या थी, जो सुकोमल यावत् बड़ी रूपवती थी । रूप, आकृति तथा लावण-सौन्दर्य की दृष्टि से उस में कोई दोष नहीं था, अत एव वह उत्तम तथा उत्तम शरीरवाली थी। वह सोमा कन्या अन्यदा किसी दिन स्नान कर यावत् वस्त्रालंकारों से विभूषित हो, बहुत सी कुब्जाओं, यावत् महत्तरिकाओं से घिरी हुई अपने घर से बाहर नीकली । घर से बाहर नीकल कर जहाँ राजमार्ग था, वहाँ आई और राजमार्ग में स्वर्ण की गेंद से खेल खेलने लगी ।
उस काल और उस समय में अरिहंत अरिष्टनेमि द्वारका नगरी में पधारे । परिषद् धर्मकथा सूनने को आई । उस समय कृष्ण वासुदेव भी भगवान के शुभागमन के समाचार से अवगत हो, स्नान कर, यावत् वस्त्रालंकारों से विभूषित हो गजसुकुमाल कुमार के साथ हाथी के होदे पर आरूढ़ होकर कोरंट पुष्पों की माला सहित छत्र धारण किये हुए, श्वेत चामरों से दोनों ओर से निरन्तर वीज्यमान होते हुए, द्वारका नगरी के मध्य भाग से होकर अर्हत् अरिष्टनेमि के वन्दन के लिए जाते हुए, राज-मार्ग में खेलती हुई उस सोमा कन्या को देखते हैं । सोमा कन्या के रूप लावण्य और कान्ति युक्त यौवन को देखकर कृष्ण वासुदेव अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए । तब वह कृष्ण वासुदेव आज्ञाकारी पुरुषों को बुलाते हैं। बुलाकर इस प्रकार कहते हैं-"हे देवानुप्रियों ! तुम सोमिल ब्राह्मण के पास जाओ और उससे इस सोमा कन्या की याचना करो, उसे प्राप्त करो और फिर उसे लेकर कन्याओं के अन्तःपुर में पहुँचा दो यह सोमा कन्या, मेरे छोटे भाई गजसुकुमाल की भार्या होगी। तब आज्ञाकारी पुरुषों ने यावत् वैसा ही किया ।
तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य भाग से होते हुए नीकले, जहाँ सहस्राम्रवन उद्यान था और भगवान अरिष्टनेमि थे, वहाँ आए । यावत् उपासना करने लगे । उस समय भगवान अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव और गजसुकुमार कुमार प्रमुख उस सभा को धर्मोपदेश दिया। प्रभु की अमोघ वाणी सूनने के पश्चात् कृष्ण अपने आवास को लौट गए । तदनन्तर गजसुकुमार कुमार भगवान श्री अरिष्टनेमि के पास धर्मकथा सूनकर विरक्त होकर बोले- भगवन् ! माता-पिता से पूछकर मैं आपके पास दीक्षा ग्रहण करूँगा । मेघकुमार की तरह, विशेष रूप से माता-पिता ने उन्हें महिलावर्ज वंशवृद्धि होने के बाद दीक्षा ग्रहण करने को कहा । तदनन्तर कृष्ण वासुदेव गजसुकुमार के विरक्त होने की बात सूनकर गजसुकुमार के पास आए और आकर उन्होंने गजसुकुमार कुमार का आलिंगन किया, आलिंगन कर गद में बिठाया, गोद में बिठाकर इस प्रकार बोले-'हे देवानुप्रिय ! तुम मेरे सहोदर छोटे भाई हो, इसलिए मेरा कहना है कि इस समय भगवान अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होकर अगार से अनगार बनने रूप दीक्षा ग्रहण मत करो। मैं तुमको द्वारका नगरी में बहुत बड़े समारोह के साथ राज्याभिषेक से अभिषिक्त करूँगा ।'' तब गजसुकुमार कुमार कृष्ण वासुदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर मौन रहे। कुछ समय मौन रहने के बाद
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, ' अंतकृत् दशा '
वर्ग / अध्ययन / सूत्रांक
गजसुकुमार अपने बड़े भाई कृष्ण वासुदेव एवं माता-पिता को दूसरी बार और तीसरी बार भी इस प्रकार बोले
'हे देवानुप्रियों ! वस्तुतः मनुष्य के कामभोग एवं देह यावत् नष्ट होने वाले हैं। इसलिए हे देवानुप्रियों ! मैं चाहता हूँ कि आपकी आज्ञा मिलने पर मैं अरिहंत अरिष्टनेमि के पास प्रव्रज्या ग्रहण कर लूँ ।" तदनन्तर गजसुकुमाल कुमार को कृष्ण-वासुदेव और माता-पिता जब बहुत-सी अनुकूल और स्नेहभरी युक्तियों से भी समझाने में समर्थ नहीं हुए तब निराश होकर श्रीकृष्ण एवं माता-पिता इस प्रकार बोले -"यदि ऐसा ही है तो हे पुत्र ! हम एक दिन ही तुम्हारी राज्यश्री देखना चाहते हैं । इसलिए तुम कम से कम एक दिन के लिए तो राजलक्ष्मी को स्वीकार करो।" तब गजसुकुमार कुमार वासुदेव कृष्ण और माता-पिता की ईच्छा का अनुसरण करके चूप रह गए। यावत् गजसुकुमाल राज्याभिषेक से अभिषिक्त हो गए। जगसुकुमाल राजा हो गए। यावत् हे पुत्र ! हम तुझे क्या देवे ? क्या प्रयोजन है ? तब गजसुकुमाल ने कहा " हे मातापिता ! मेरे लिए रजोहरण और पात्र मँगवाना तथा नापित को बुलाना चाहता हूँ ।" यावत् महाबलकुमार की तरह गजसुकुमाल भी प्रव्रजित हो गए । इरिया समिति आदि का पालन करने लगे यावत् जितेन्द्रिय होकर शुद्ध ब्रह्मचर्य की परिपालना करने लगे ।
"
श्रमणधर्म में दीक्षित होने के पश्चात् गजसुकुमाल मुनि जिस दिन दीक्षित हुए, उसी दिन के पीछले भाग में जहाँ अरिहंत अरिष्टनेमि बिराजमान थे, वहाँ आकर उन्होंने भगवान नेमीनाथ की प्रदक्षिणा करके इस प्रकार बोले'भगवन्! आपकी अनुज्ञा प्राप्त होने पर मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महापडिमा धारण कर विचरना चाहता हूँ। प्रभु ने कहा- हे देवानुप्रिय ! जिससे तुम्हें सुख प्राप्त हो वही करो। तदनन्तर वह गजसुकुमाल मुनि अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा मिलने पर, भगवान नेमिनाथ को वंदन नमस्कार करते हैं । अर्हत् अरिष्टनेमि के सान्निध्य से चलकर सहस्राम्रवन उद्यान से नीकले। जहाँ महाकाल श्मशान था, वहाँ आते हैं। प्रासुक स्थंडिल भूमि की प्रतिलेखना करते हैं। पश्चात् उच्चार-प्रसवण त्याग के योग्य भूमि का प्रतिलेखन करते हैं। पश्चात् एक स्थान पर खड़े हो अपनी देह-यष्टि को किंचित् झुकाये हुए, यावत् दोनों पैरों को एकत्र करके एक रात्रि की महाप्रतिमा अंगीकार कर ध्यान में मग्न हो जाते हैं ।
इधर सोमिल ब्राह्मण समिधा लाने के लिए द्वारका नगरी के बाहर सुकुमाल अणगार के श्मशानभूमि में से पूर्व ही नीला था। वह समिधा, दर्भ, कुश, डाभ एवं में पत्रामोडों को लेता है । उन्हें लेकर वहाँ से अपने घर की तरफ लौटता है । लौटते समय महाकाल श्मशान के निकट से जाते हुए संध्याकाल की बेला में, जब मनुष्यों का गमनागमन नहीं के समान हो गया था, उसने गजसुकुमाल मुनि को वहाँ ध्यानस्थ खड़े देखा । उन्हें देखते ही सोमिल के हृदय में बैरभाव जागृत हुआ। वह क्रोध से तमतमा उठता है और मन ही मन इस प्रकार बोलता है-अरे ! यह तो वही अप्रार्थनीय का प्रार्थी यावत् लज्जा परिवर्जित, गजसुकुमाल कुमार है, जो मेरी निर्दोष पुत्री सोमा कन्या को अकारण ही त्याग कर मुण्डित हो यावत् श्रमण बन गया है । इसलिए मुझे निश्चय ही गजकुमाल से इस वैर का बदला लेना चाहिए। इस प्रकार वह सोमिल सोचता है और सोचकर सब दिशाओं की ओर देखता है कि कहीं से कोई देख तो नहीं रहा है । इस विचार से चारों ओर देखता हुआ पास के ही तालाब से वह गिली मिट्टी लेता है, गजसुकुमाल मुनि के मस्तक पर पाल बाँधकर जलती हुई चिता में से फूले हुए किंशुक के फूल के समान लाल-लाल खेर के अंगारों को किसी खप्पर में लेकर उन दहकते हुए अंगारों को गजसुकुमाल मुनि के सिर पर रख देता है। रखने के बाद इस भय से कि कहीं उसे कोई देख न ले, भयभीत होकर घबरा कर त्रस्त होकर एवं उद्विग्न होकर वह वहाँ से शीघ्रतापूर्वक पीछे की ओर हटता हुआ भागता है । वहाँ से भागता हुआ वह सोमिल जिस ओर से आया था उसी ओर चला जाता है ।
सिर पर उन जाज्वल्यमान अंगारों के रखे जाने से गजसुकुमाल मुनि के शरीर में महाभयंकर वेदना उत्पन्न हुई जो अत्यन्त दाहक दुःखपूर्ण यावत् दुस्सह थी । इतना होने पर भी गजसुकुमाल मुनि सोमिल ब्राह्मण पर मन से भी, लेशमात्र भी द्वेष नहीं करते हुए उस एकान्त दुःखरूप यावत् दुस्सह वेदना को समभावपूर्वक सहन करने लगे। उस समय उस एकान्त दुःखपूर्ण दुःसह दाहक वेदना को समभाव से सहन करते हुए शुभ परिणामों तथा प्रशस्त
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक शुभ अध्यवसायों के फलस्वरूप आत्मगुणों को आच्छादित करनेवाले कर्मों के क्षय से समस्त कर्मरज को झाड़कर साफ कर देने वाले, कर्म-विनाशक अपूर्ण-करण में प्रविष्ट हुए । उन गजसुकुमाल अनगार को अनंत अनुत्तर यावत् केवलज्ञान एवं केवलदर्शन की उपलब्धि हुई । तत्पश्चात् आयुष्य पूर्ण हो जाने पर वे सिद्ध-कृतकृत्य, यावत् सर्व प्रकार के दुःखों से रहित हो गए। उस समय वहाँ समीपवर्ती देवों ने 'अहो ! इन गजसुकुमाल मुनि ने श्रमणधर्म की अत्यन्त उत्कृष्ट आराधना की है। यह जानकर अपनी वैक्रिय शक्ति के द्वारा दिव्य सुगन्धित जल की तथा पाँच वर्गों के दिव्य फूलों एवं वस्त्रों की वर्षा की और दिव्य मधुर गीतों तथा गन्धर्ववाद्ययन्त्रों की ध्वनि से आकाश को गँजा दिया।
तदनन्तर कृष्ण वासुदेव दूसरे दिन प्रातःकाल सूर्योदय होने पर स्नान कर वस्त्रालंकारों से विभूषित हो, हाथी पर आरूढ़ हुए । कोरंट पुष्पों की माला वाला छत्र धारण किया हुआ था । श्वेत एवं उज्ज्वल चामर उनके दायें-बायें ढोरे जा रहे थे । वे जहाँ भगवान अरिष्टनेमि विराजमान थे, वहाँ के लिए रवाना हए । तब कृष्ण वासुदेव ने द्वारका नगरी के मध्य भाग से जाते समय एक पुरुष को देखा, जो अति वृद्ध, जरा से जर्जरित एवं थका हआ था। वह बहुत दुःखी था । उसके घर के बाहर राजमार्ग पर ईंटों का एक विशाल ढेर पड़ा था जिसे वह वृद्ध एकएक ईट करके अपने घर में स्थानान्तरित कर रहा था । तब उन कृष्ण वासुदेव ने उस पुरुष की अनुकंपा के लिए हाथी पर बैठे हुए ही एक ईंट उठाई, उठाकर बाहर रास्ते से घर के भीतर पहुँचा दी । तब कृष्ण वासुदेव के द्वारा एक ईंट उठाने पर अनेक सैकड़ों पुरुषों द्वारा वह बहुत बड़ा ईंटो का ढेर बाहर गली में से घर की भीतर पहुँचा दिया गया।
वृद्ध पुरुष की सहायता करने के अनन्तर कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य में से होते हुए जहाँ भगवंत अरिष्टनेमि विराजमान थे वहाँ आ गए । यावत् वंदन-नमस्कार किया । बाद पूछा-''भगवन् ! मेरे सहोदर लघुभ्राता मुनि गजसुकुमाल कहाँ हैं ? मैं उनको वन्दना-नमस्कार करना चाहता हूँ ।' अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा मुनि गजसुकुमाल ने मोक्ष प्राप्त करने का अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया है । कृष्ण वासुदेव अरिष्टनेमि भगवान् के चरणों में पनः निवेदन करने लगे-भगवन ! मनि गजसकमाल ने अपना प्रयोजन कैसे सिद्ध कर लिया है ? "हे कृष्ण ! वस्तुतः कल के दिन के अपराह्न काल के पूर्व भाग में गजसुकुमाल मुनि ने मुझे वन्दन-नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन किया-हे प्रभो ! आपकी आज्ञा हो तो मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महाभिक्षप्रतिमा धारण करके विचरना चाहता हूँ । यावत् भिक्षु की महाप्रतिमा धारण करके ध्यानस्थ खड़े हो गए । इसके बाद गजसुकुमाल मुनि को एक पुरुष ने देखा और देखकर वह उन पर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ । इत्यादि, इस प्रकार गजसुकुमाल मुनि ने अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया।
यह सूनकर कृष्ण वासुदेव भगवान नेमिनाथ से इस प्रकार पूछने लगे-'भंते ! वह अप्रार्थनीय का प्रार्थी अर्थात् मृत्यु को चाहने वाला, यावत् निर्लज्ज पुरुष कौन है जिसने मेरे सहोदर लघु भ्राता गजसुकुमाल मुनि का असमय में ही प्राण-हरण कर लिया ?" तब अर्हत् अरिष्टनेमि कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोले-'हे कृष्ण ! तुम उस पुरुष पर द्वेष-रोष मत करो, क्योंकि उस पुरुष ने सुनिश्चित रूपेण गजसुकुमाल मुनि को अपना अपना प्रयोजन सिद्ध करने में सहायता प्रदान की है ।'' यह सूनकर कृष्ण वासुदेव ने पुनः प्रश्न किया-'हे पूज्य ! उस पुरुष ने गजसुकुमाल मुनि को किस प्रकार सहायता दी ?' अर्हत् अरिष्टनेमि ने उत्तर दिया-"कृष्ण ! मेरे चरणवंदन के हेतु शीघ्रतापूर्वक आते समय तुमने द्वारका नगरी में एक वृद्ध पुरुष को देखा यावत् हे कृष्ण ! वस्तुतः जिस तरह तुमने उस पुरुष का दुःख दूर करने में उसकी सहायता की, उसी तरह हे कृष्ण ! उस पुरुष ने भी अनेकानेक लाखों भवों के संचित कर्मों की राशि की उदीरणा करने में संलग्न गजसुकुमाल मुनि को उन कर्मों की संपूर्ण निर्जरा करने में सहायता प्रदान की है।
कृष्ण वासुदेव फिर निवेदन करने लगे-''भगवन् ! मैं उस पुरुष को किस तरह पहचान सकता हूँ ?' भगवान अरिष्टनेमि कहने लगे-'कृष्ण ! यहाँ से लौटने पर जब तुम द्वारका नगरी में प्रवेश करोगे तो उस समय एक पुरुष तुम्हें देखकर भयभीत होगा, वह वहाँ पर खड़ा-खड़ा ही गिर जाएगा । आयु की समाप्ति हो जाने से मृत्यु को
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग / अध्ययन / सूत्रांक प्राप्त हो जाएगा। उस समय तुम समझ लेना कि यह वही पुरुष है। अरिष्टनेमि को वंदन एवं नमस्कार करके श्रीकृष्ण ने वहाँ से प्रस्थान किया और अपने प्रधान हस्तिरत्न पर बैठकर अपने घर की ओर रवाना हुए। उधर उस सोमिल ब्राह्मण के मन में दूसरे दिन सूर्योदय होते ही इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ निश्चय ही कृष्ण वासुदेव अरिहंत अरिष्टनेमि के चरणों में वंदन करने के लिये गए हैं। भगवान तो सर्वज्ञ हैं उनसे कोई बात छिपी नहीं है । भगवान ने गजसुकुमाल की मृत्यु सम्बन्धी मेरे सम्बन्धी मेरे कुकृत्य को जान लिया होगा, पूर्णतः विदित कर लिया होगा। यह सब भगवान से स्पष्ट समझ सून लिया होगा । अरिहंत अरिष्टनेमि ने अवश्यमेव कृष्ण वासुदेव को यह सब बता दिया होगा । तो ऐसी स्थिति में कृष्ण वासुदेव रुष्ट होकर मुझे न मालूम किस प्रकार की कुमौत से मारेंगे । इस विचार से डरा हुआ वह अपने घर से नीकलता है, नीकलकर द्वारका नगरी में प्रवेश करते हुए कृष्ण वासुदेव के एकदम सामने आ पड़ता है ।
उस समय सोमिल ब्राह्मण कृष्ण वासुदेव को सहसा सम्मुख देख कर भयभीत हुआ और जहाँ का तहाँ स्तम्भित खड़ा रह गया। वहीं खड़े-खड़े ही स्थितिभेद से अपना आयुष्य पूर्ण हो जाने से सर्वांग शिथिल हो धड़ाम से भूमितल पर गिर पड़ा। उस समय कृष्ण वासुदेव सोमिल ब्राह्मण को गिरता हुआ देखते हैं और देखकर इस प्रकार बोलते हैं—'' अरे देवानुप्रियों ! यही वह मृत्यु की ईच्छा करने वाला तथा लज्जा एवं शोभा से रहित सोमिल ब्राह्मण है, जिसने मेरे सहोदर छोटे भाई गजसुकुमाल मुनि को असमय में ही काल का ग्रास बना डाला ।" ऐसा कहकर कृष्ण वासुदेव ने सोमिल ब्राह्मण के उस शव को चांडालों के द्वारा घसीटवा कर नगर के बाहर फिंकवा दिया और उस शब के स्पर्श वाली भूमि को पानी से धुलवाकर कृष्ण वासुदेव अपने राजप्रासाद में पहुँचे और अपने आगार में प्रविष्ट हुए । हे जंबू ! यावत् मोक्ष-सम्प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने अन्तकृद्दशांग सूत्र के तृतीय वर्ग के अष्टम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादित किया है ।
वर्ग-३ अध्ययन- ९ से १३
सूत्र - १४
" हे जंबू ! उस काल उस समय में द्वारका नामक नगरी थी, एक दिन भगवान अरिष्टनेमि तीर्थंकर विचरते हुए उस नगरी में पधारे । वहाँ बलदेव राजा था । वर्णन समझ लेना । उसकी धारिणी रानी थी । (वर्णन), उस धारिणी रानी ने सिंह का स्वप्न देखा, तदनन्तर पुत्रजन्म आदि का वर्णन गौतमकुमार की तरह जान लेना । विशेषता यह कि वह बीस वर्ष की दीक्षापर्याय वाला हुआ । शेष उसी प्रकार यावत् शत्रुंजय पर्वत पर सिद्धि प्राप्त की । "हे जंबू ! इस प्रकार यावत् मोक्ष प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने अन्तगडसूत्र के तृतीय वर्ग के नवम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है, ऐसा मैं कहता हूँ ।"
I
इसी प्रकार दुर्मुख और कूपदारक कुमार का वर्णन जानना दोनों के पिता बलदेव और माता धारिणी थी। दारुक और अनाधृष्टि भी इसी प्रकार हैं। विशेष यह है कि वसुदेव पिता और धारिणी माता थी। श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा- " हे जंबू ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने तीसरे वर्ग के तेरह अध्ययनों का यह भाव फरमाया है।"
वर्ग-३ का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " ( अंतकृद्दशा ) " आगमसूत्र - हिन्द-अनुवाद”
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग-४
सूत्र-१५
'भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने आठवें अंग अंतकृत्दशा के तीसरे वर्ग का जो वर्णन किया वह सूना । अंतगडदशा के चौथे वर्ग के हे पूज्य ! श्रमण भगवान ने क्या भाव दर्शाये हैं ?'' ''हे जंबू ! यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने अंतगडदशा के चौथे वर्ग में दश अध्ययन कहे हैं, जो इस प्रकार हैंसूत्र-१६
जालि कुमार, मयालि कुमार, उवयालि कुमार, पुरुषसेन कुमार, वारिषेण कुमार, प्रद्युम्न कुमार, शाम्ब कुमार, अनिरुद्ध कुमार, सत्यनेमि कुमार और दृढ़नेमि कुमार | सूत्र-१७
जंबू स्वामी ने कहा-भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने चौथे वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं, तो प्रथम अध्ययन का श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने क्या अर्थ बताया है ?'' हे जंबू ! उस काल और उस समय में द्वारका नगरी थी, श्रीकृष्ण वासुदेव वहाँ राज्य कर रहे थे । उस द्वारका नगरी में महाराज 'वासुदेव' और रानी 'धारिणी' निवास करते थे । जालि कुमार का वर्णन गौतम कुमार के समान जानना । विशेष यह कि जालि कुमार ने युवावस्था प्राप्त कर पचास कन्याओं से विवाह किया तथा पचास-पचास वस्तुओं का दहेज मिला । दीक्षित होकर जालि मुनि ने बारह अंगों का ज्ञान प्राप्त किया, सोलह वर्ष दीक्षापर्याय का पालन किया, यावत् शत्रुजय पर्वत पर जाकर सिद्ध हुए।
इसी प्रकार मयालि कुमार, उवयालि कुमार और वारिषेण का वर्णन जानना चाहिए । इसी प्रकार प्रद्युम्न कुमार का वर्णन भी जानना । विशेष-कृष्ण उनके पिता और रुक्मिणी देवी माता थी। इसी प्रकार साम्ब कुमार भी; विशेष-उनकी माता जाम्बवती थी । इसी प्रकार अनिरुद्ध कुमार का भी, विशेष यह है कि प्रद्युम्न पिता और वैदर्भी उसकी माता थी । इसी प्रकार सत्यनेमि कुमार भी, विशेष, समुद्रविजय पिता और शिवा देवी माता थी। इसी प्रकार दृढ़नेमि कुमार का भी । ये सभी अध्ययन एक समान हैं । इस प्रकार हे जंबू ! दश अध्ययनों वाले इस चौथे वर्ग का श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त प्रभु ने यह अर्थ कहा है।
वर्ग-४-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग
सूत्र - १८, १९
"भगवन् ! यावत् मोक्षप्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने अन्तकृत्दशा के पंचम वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ?'' '' हे जंबू ! यावत् मोक्ष-प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने अन्तकृत्दशा के पंचम वर्ग के दस अध्ययन बताए हैं। पद्मावती, गौरी, गान्धारी, लक्ष्मणा, सुसीमा, जाम्बवती, सत्यभामा, रुक्मिणी, मूलश्री और मूलदत्ता ।
वर्ग-५ अध्ययन-१ सूत्र-२०
जम्बूस्वामी ने पुनः पूछा-'भन्ते ! श्रमण भगवान महावीर ने पंचम वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ?'' ''हे जंबू ! उस काल उस समय में द्वारका नामक नगरी थी, यावत् श्रीकृष्ण वासुदेव वहाँ राज्य कर रहे थे । श्रीकृष्ण वासुदेव की पद्मावती नाम की महारानी थी । (राज्ञीवर्णन जान लेना) । उस काल उस समय में अरिहंत अरिष्टनेमि विचरते हुए द्वारका नगरी में पधारे । श्रीकृष्ण वंदन-नमस्कार करने हेतु राजप्रासाद से नीकलकर प्रभु के पास पहुँचे यावत् प्रभु अरिष्टनेमि की पर्युपासना करने लगे । उस समय पद्मावती देवी ने भगवान के आने की खबर सुनी तो वह अत्यन्त प्रसन्न हई । वह भी देवकी महारानी के समान धार्मिक रथ पर आरूढ़ होकर भगवान को वंदन करने गई । यावत् नेमिनाथ की पर्युपासना करने लगी । अरिहंत अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव, पद्मावती देवी और परिषद को धर्मकथा कही । धर्मकथा सूनकर जन-परिषद् वापिस लौट गई।
तब कृष्ण वासुदेव ने भगवान नेमिनाथ को वंदन-नमस्कार करके उनसे इस प्रकार पृच्छा की-''भगवन् ! बारह योजन लम्बी और नौ योजन चौड़ी यावत् साक्षात देवलोक के समान इस द्वारका नगरी का विनाश किस कारण से होगा ?" 'हे कृष्ण !' इस प्रकार संबोधित करते हुए अरिहंत अरिष्टनेमि ने उत्तर दिया-''हे कृष्ण ! निश्चय ही बारह योजन लम्बी और नौ योजन चौड़ी यावत् प्रत्यक्ष स्वर्गपुरी के समान इस द्वारका नगरी का विनाश मदीरा, अग्नि और द्वैपायन के कोप के कारण होगा ।'' अरिहंत अरिष्टनेमि से द्वारका नगरी के विनाश का कारण सून-समझकर श्रीकृष्ण वासुदेव के मन में ऐसा विचार, चिन्तन, प्रार्थित एवं मनोगत संकल्प उत्पन्न हुआ कि-वे जालि, मयालि, उवयालि, परिससेन, वीरसेन, प्रद्यम्न, शाम्ब, अनिरुद्ध, दृढनेमि और सत्यनेमि प्रभति कुमार धन्य हैं जो हिरण्यादि देयभाग देकर, नेमिनाथ प्रभु के पास मुण्डित यावत् प्रव्रजित हो गए हैं । मैं अधन्य हूँ, अकृत-पुण्य हूँ कि राज्य, अन्तःपुर और मनुष्य संबंधी कामभोगों में मूर्च्छित हूँ, इन्हें त्यागकर भगवान नेमिनाथ के पास मुण्डित होकर अनगार रूप प्रव्रजित होने में असमर्थ हूँ।
भगवान नेमिनाथ प्रभु ने अपने ज्ञान-बल से कृष्ण वासुदेव के मन में आये इन विचारों को जानकर आर्त्तध्यान में डूबे हुए कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा- 'निश्चय ही हे कृष्ण ! तुम्हारे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ-वे जालि, मयालि आदि धन्य हैं यावत् मैं प्रव्रज्या नहीं ले सकता । हे कृष्ण ! क्या यह बात सही है ?'' श्रीकृष्ण ने कहा- 'हाँ भगवन् ! है ।'' "तो हे कृष्ण ! ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं और होगा भी नहीं कि वासुदेव अपने भव में धन-धान्य-स्वर्ण आदि संपत्ति छोड़कर मुनिव्रत ले लें । वासुदेव दीक्षा लेते नहीं, नहीं एवं भविष्य में कभी लेंगे भी नहीं।'' श्रीकृष्ण ने कहा-''हे भगवन् ! ऐसा क्यों कहा जाता है कि ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं और होगा भी नहीं ?" "हे कृष्ण ! निश्चय ही सभी वासुदेव पूर्व भव में निदानकृत होते हैं, इसलिए मैं ऐसा कहता हूँ कि ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं और होगा भी नहीं कि वासुदेव कभी प्रव्रज्या अंगीकार करें।"
__ तब कृष्ण वासुदेव अरिहंत अरिष्टनेमि को इस प्रकार बोले-'"हे भगवन् ! यहाँ से काल के समय काल कर मैं कहाँ जाऊंगा, कहाँ उत्पन्न होऊंगा ?'' अरिष्टनेमि भगवान ने कहा-हे कृष्ण ! तुम सूरा, अग्नि और द्वैपायन के कोप के कारण इस द्वारका नगरी के जल कर नष्ट हो जाने पर और अपने माता-पिता एवं स्वजनों का वियोग हो जाने पर राम बलदेव के साथ दक्षिणी समुद्र के तट की ओर पाण्डुराजा के पुत्र युधिष्ठिर आदि पाँचों पाण्डवों के मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक समीप पाण्डु मथुरा की ओर जाओगे । रास्ते में विश्राम लेने के लिए कौशाम्ब वन-उद्यान में अत्यन्त विशाल एक वटवृक्ष के नीचे, पृथ्वीशिलापट्ट पर पीताम्बर ओढ़कर तुम सो जाओगे । उस समय मृग के भ्रम में जराकुमार द्वारा चलाया हुआ तीक्ष्ण तीर तुम्हारे बाएं पैर में लगेगा । इस तीक्ष्ण तीर से विद्ध होकर तुम काल के समय काल करके वालुकाप्रभा नामक तीसरी पृथ्वी में जन्म लोगे । प्रभु के श्रीमुख से अपने आगामी भव की यह बात सुनकर कृष्ण वासुदेव खिन्नमन होकर आतध्यान करने लगे।
तब अरिहंत अरिष्टनेमि पुनः बोले-''हे देवानुप्रिय ! तुम खिन्नमन होकर आर्त्तध्यान मत करो । निश्चय से कालान्तर में तुम तीसरी पृथ्वी से नीकलकर इसी जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में आने वाले उत्सर्पिणी काल में पुंड्र जनपद के शतद्वार नगर में ''अमम'' नाम के बारहवें तीर्थंकर बनोगे । वहाँ बहुत वर्षों तक केवली पर्याय का पालन कर तुम सिद्ध-बुद्ध-मुक्त होओगे ।' अरिहंत प्रभु के मुखारविन्द से अपने भविष्य का यह वृत्तान्त सूनकर कष्ण वासदेव बडे प्रसन्न हए और अपनी भजा पर ताल ठोकने लगे। जयनाद करके त्रिपदी-भमि में तीन बार पाँव का न्यास किया-कूदे । थोड़ा पीछे हटकर सिंहनाद किया और फिर भगवान नेमिनाथ को वंदन-नमस्कार करके अपने अभिषेक-योग्य हस्तिरत्न पर आरूढ़ हए और द्वारका नगरी के मध्य से होते हुए अपने राजप्रासाद में आए । अभिषेकयोग्य हाथी से नीचे ऊतरे और फिर जहाँ बाहर की उपस्थानशाला थी वहाँ आए | वे सिंहासन पर पूर्वाभिमुख बिराजमान हुए । फिर अपने आज्ञाकारी पुरुषों को बुलाकर बोले
देवानुप्रियों ! तुम द्वारका नगरी के शंगाटक आदि में जोर-जोर से घोषणा करते हुए इस प्रकार कहो कि"हे द्वारकावासी नगरजनों ! इस बारह योजन लम्बी यावत् प्रत्यक्ष-स्वर्गपुरी के समान द्वारका नगरी का सूरा, अग्नि एवं द्वैपायन के कोप के कारण नाश होगा, इसलिए हे देवानुप्रियों ! द्वारका नगरी में जिसकी ईच्छा हो, चाहे वह राजा हो, युवराज हो, ईश्वर हो, तलवर हो, माडंबिक हो, कौटुम्बिक हो, इभ्य हो, रानी हो, कुमार हो, कुमारी हो, राजरानी हो, राजपुत्री हो, इनमें से जो भी प्रभु नेमिनाथ के निकट मुण्डित होकर यावत् दीक्षा लेना चाहे, उसे कृष्ण वासुदेव ऐसा करने की आज्ञा देते हैं । दीक्षार्थी के पीछे उसके आश्रित सभी कुटुंबीजनों की भी श्रीकृष्ण यथायोग्य व्यवस्था करेंगे और बड़े ऋद्धि-सत्कार के साथ उसका दीक्षा-महोत्सव संपन्न करेंगे ।'' इस प्रकार दो-तीन बार घोषणा को दोहरा कर पुनः मुझे सूचित करो ।' कृष्ण का यह आदेश पाकर उन आज्ञाकारी राजपुरुषों ने वैसी ही घोषणा दो-तीन बार करके लौटकर इसकी सूचना श्रीकृष्ण को दी।
इसके बाद वह पद्मावती महारानी भगवान अरिष्टनेमि से धर्मोपदेश सूनकर एवं उसे हृदय में धारण करके प्रसन्न और सन्तुष्ट हुई, उसका हृदय प्रफुल्लित हो उठा । यावत् वह अरिहंत नेमिनाथ को वंदना-नमस्कार करके इस प्रकार बोली-भन्ते ! निर्ग्रन्थ प्रवचन पर मैं श्रद्धा करती हूँ। जैसा आप कहते हैं वैसा ही है । आपका धर्मोपदेश यथार्थ है । हे भगवन् ! मैं कृष्ण वासुदेव की आज्ञा लेकर फिर देवानुप्रिय के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करना चाहती हूँ । प्रभु ने कहा-'जैसे तुम्हें सुख हो वैसा करो । हे देवानुप्रियों ! धर्म-कार्य में विलम्ब मत करो ।' बाद पद्मावती देवी धार्मिक श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होकर द्वारका नगरी में अपने प्रासाद में आकर जहाँ पर कृष्ण वासुदेव थे वहाँ आकर अपने दोनों हाथ जोड़कर सिर झुकाकर, मस्तक पर अंजलि कर कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोली-'देवानुप्रिय ! आपकी आज्ञा हो तो मैं अरिहंत नेमिनाथ के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करना चाहती हूँ । कृष्ण ने कहा- देवानुप्रिये ! जैसे तुम्हें सुख हो वैसा करो ।' तब कृष्ण वासुदेव ने अपने आज्ञाकारी पुरुषों को बुलाकर इस प्रकार आदेश दिया-देवानुप्रियों ! शीघ्र ही महारानी पद्मावती के दीक्षामहोत्सव की विशाल तैयारी करो, और तैयारी हो जाने की मुझे सूचना दो।
तब आज्ञाकारी पुरुषों ने वैसा ही किया और दीक्षामहोत्सव की तैयारी की सूचना दी । इसके बाद कृष्ण वासुदेव ने पद्मावती देवी को पट्ट पर बिठाया और एक सौ आठ सुवर्णकलशों से यावत् निष्क्रमणाभिषेक से अभिषिक्त किया । फिर सभी प्रकार के अलंकारों से विभूषित करके हजार पुरुषों द्वारा उठायी जाने वाली शिबिका में बिठाकर द्वारका नगरी के मध्य से होते हुए नीकले और जहाँ रैवतक पर्वत और सहस्राम्रवन उद्यान था उस और
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक चले । वहाँ पहुँच कर पद्मावती देवी शिबिका से ऊतरी । तदनन्तर कृष्ण वासुदेव जहाँ अरिष्टनेमि भगवान थे वहाँ आए, आकर भगवान को तीन बार प्रदक्षिणा करके वंदना-नमस्कार किया, इस प्रकार बोले-'भगवन ! यह पद्मावती देवी मेरी पटरानी है । यह मेरे लिए इष्ट है, कान्त है, प्रिय है, मनोज्ञ है और मन के अनुकूल चलने वाली है, अभिराम है । भगवन् ! यह मेरे जीवन में श्वासोच्छ्वास के समान है, मेरे हृदय को आनन्द देने वाली है । इस प्रकार का स्त्री-रत्न उदुम्बर के पुष्प के समान सूनने के लिए भी दुर्लभ है; तब देखने की तो बात ही क्या है ? हे देवानु-प्रिय ! मैं ऐसी अपनी प्रिय पत्नी की भिक्षा शिष्या रूप में आपको देता हूँ। आप उसे स्वीकार करें ।' कृष्ण वासुदेव की प्रार्थना सूनकर प्रभु बोले- देवानुप्रिय ! तुम्हें जिस प्रकार सुख हो वैसा करो ।'
तब उस पद्मावती देवी ने ईशान-कोण में जाकर स्वयं अपने हाथों से आभूषण एवं अलंकार ऊतारे, स्वयं ही अपने केशों का पंचमुष्टिक लोच किया । फिर भगवान नेमिनाथ के पास आकर वन्दना की । इस प्रकार कहा"भगवन् ! यह संसार जन्म, जरा, मरण आदि दुःख रूपी आग में जल रहा है । यावत् मुझे दीक्षा दें।" इसके बाद भगवान नेमिनाथ ने पद्मावती देवी को स्वयमेव प्रव्रज्या दी, और स्वयं ही यक्षिणी आर्या को शिष्या के रूप में प्रदान की। तब यक्षिणी आर्या ने पद्मावती को धर्मशिक्षा दी, यावत् इस प्रकार संयमपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए। तब वह पद्मावती आर्या ईर्यासमिति यावत् ब्रह्मचारिणी आर्या हो गई। तदनन्तर उस पद्मावती आर्या ने यक्षिणी आर्या से सामयिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, बहुत से उपवास-बेले-तेले-चोले-पचोले-मास और अर्धमासखमण आदि विविध तपस्या से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी। इस तरह पद्मावती आर्या ने पूरे बीस वर्ष तक चारित्रधर्म का पालन किया और अन्त में एक मास की संलेखना से आत्मा को भावित कर, साठ भक्त अनशन पूर्ण कर, जिस अर्थ-प्रयोजन के लिए नग्नभाव, (आदि धारण किए थे यावत्) उस अर्थ का आराधन कर अन्तिम श्वास से सिद्ध-बुद्ध-मुक्त हो गई।
वर्ग-५ अध्ययन-२ से८ सूत्र - २१
उस काल और उस समय में द्वारका नगरी थी । उसके समीप रैवतक नाम का पर्वत था । उस पर्वत पर नन्दनवन उद्यान था । द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण वासुदेव राजा थे । उन की गौरी नाम की महारानी थी, एक समय उस नन्दनवन उद्यान में भगवान अरिष्टनेमि पधारे । कृष्ण वासुदेव भगवान के दर्शन करने के लिए गये । जन
| परिषद लौट गई। कष्ण वासदेव भी अपने राज-भवन में लौट गए । तत्पश्चात गौरी देवी पद्मावती रानी की तरह दीक्षित हुई यावत् सिद्ध हो गई। इसी तरह गांधारी, लक्ष्मण, सुसीमा, जाम्बवती, सत्यभामा और रुक्मिणी के भी छह अध्ययन पद्मावती के समान ही जानना।
वर्ग-५ अध्ययन-९,१०
सूत्र - २२
उस काल उस समय में द्वारका नगरी के पास रैवतक नाम का पर्वत था, जहाँ एक नन्दनवन उद्यान था। वहाँ कृष्ण-वासुदेव राज्य करते थे । कृष्ण वासुदेव के पुत्र और रानी जाम्बवती देवी के आत्मज शाम्बकुमार थे जो सर्वांग सुन्दर थे । उन शाम्ब कुमार की मूलश्री नाम की भार्या थी । अत्यन्त सुन्दर एवं कोमलांगी थी । एक समय अरिष्टनेमि वहाँ पधारे । कृष्ण वासुदेव उनके दर्शनार्थ गए । मूलश्री देवी भी पद्मावती के समान प्रभु के दर्शनार्थ गई। विशेष में बोली-''हे देवानुप्रिय ! कृष्ण वासुदेव से पूछती हूँ यावत् सिद्ध हो गई । मूलश्री के ही समान मूलदत्ता का भी सारा वृत्तान्त जानना ।
वर्ग-५-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, ' अंतकृत् दशा '
वर्ग / अध्ययन / सूत्रांक
वर्ग -६
सूत्र - २३
भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने छठे वर्ग के क्या भाव कहे हैं ? ' हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर ने अष्टम अंग अंतगडदशा के छठे वर्ग के सोलह अध्ययन कहे हैं, जो इस प्रकार हैं
सूत्र २४-२५
मकाई, किंकम, मुदगरपाणि, काश्यप, क्षेमक, धृतिधर, कैलाश, हरिचन्दन, वारत्त, सुदर्शन, पुण्यभद्र, सुमनभद्र, सुप्रतिष्ठित, मेघकुमार, अतिमुक्त कुमार और अलक्क कुमार । वर्ग-६ अध्ययन १, २
सूत्र - २६
भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने छट्ठे वर्ग के १६ अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? हे जम्बू ! उस काल उस समय में राजगृह नगर था । वहाँ गुणशील नामक चैत्य था । श्रेणिक राजा थे । वहाँ मकाई नामक गाथापति रहता था, जो अत्यन्त समृद्ध यावत् अपरिभूत था । उस काल उस समय में धर्म की आदि करने वाले श्रमण भगवान महावीर गुणशील उद्यान में पधारे । परिषद् दर्शनार्थ एवं धर्मोपदेश-श्रवणार्थ आई । मकाई गाथापति भी भगवतीसूत्र में वर्णित गंगदत्त के वर्णनानुसार अपने घर से नीकला । धर्मोपदेश सूनकर वह विरक्त हो गया । घर आकर ज्येष्ठ पुत्र को घरका भार सौंपा और स्वयं हजार पुरुषों से उठाई जाने वाली शिबिका में बैठकर श्रमणदीक्षा अंगीकार करने हेतु भगवान की सेवा में आया । यावत् वह अनगार हो गया । ईर्या आदि समितियों से युक्त एवं गुप्तियों से गुप्त ब्रह्मचारी बन गया ।
इसके बाद मकाई मुनि ने श्रमण भगवान महावीर के गुणसंपन्न तथा वेशसम्पन्न स्थविरों के पास सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और स्कंदक के समान गुणरत्नसंवत्सर तप का आराधन किया। सोलह वर्ष तक दीक्षापर्याय में रहे। अन्त में विपुलगिरि पर्वत पर स्कन्दक के समान ही संथारादि करके सिद्ध हो गए। किंकम भी मकाई के समान ही दीक्षा लेकर विपुलाचल पर सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए ।
वर्ग-६ अध्ययन- ३
सूत्र - २७
|
।
उस काल उस समय में राजगृह नगर था । गुणशीलक उद्यान था । श्रेणिक राजा थे । चेलना रानी थी । 'अर्जुन' नाम का एक माली रहता था। उसकी पत्नी बन्धुमती थी, जो अत्यन्त सुन्दर एवं सुकुमार थी अर्जुन माली का राजगृह नगर के बाहर एक बड़ा पुष्पाराम था। वह पुष्पोद्यान कहीं कृष्ण वर्ण का था, यावत् समुदाय की तरह प्रतीत हो रहा था उसमें पाँचों वर्णों के फूल खिले हुए थे। वह बगीचा इस भाँति हृदय को प्रसन्न एवं । प्रफुल्लित करने वाला अतिशय दर्शनीय था। उस पुष्पाराम फूलवाड़ी के समीप ही मुद्गरपाणि यक्ष का यक्षायतन था, जो उस अर्जुनमाली के पुरखाओं से चली आई कुलपरम्परा से सम्बन्धित था । वह 'पूर्णभद्र' चैत्य के समान पुराना, दिव्य एवं सत्य प्रभाववाला था। उसमें मुद्गरपाणि नामक यक्ष की एक प्रतिमा थी, जिसके हाथ में एक हजार पल-परिमाण भारवाला लोहे का एक मुद्गर था ।
वह अर्जुनमाली बचपन से ही मुद्गरपाणि यक्ष का उपासक था । प्रतिदिन बाँस की छबड़ी लेकर वह राजगृह नगर के बाहर स्थित अपनी उस फूलवाड़ी में जाता था और फूलों को चुन-चुन कर एकत्रित करता था । फिर उन फूलों में से उत्तम उत्तम फूलों को छाँटकर उन्हें उस मुद्गरपाणि यक्ष के समक्ष चढ़ाता था । इस प्रकार वह उत्तमोत्तम फूलों से उस यक्ष की पूजा-अर्चना करता और भूमि पर दोनों घुटने टेककर उसे प्रणाम करता । इसके बाद राजमार्ग के किनारे बाजार में बैठकर उन फूलों को बेचकर अपनी आजीविका उपार्जन किया करता था उस राजगृह नगर में 'ललिता' नाम की एक गोष्ठी थी । वह धन-धान्यादि से सम्पन्न थी तथा वह बहुतों से
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक भी पराभव को प्राप्त नहीं हो पाती थी। किसी समय राजा का कोई अभीष्ट-कार्य संपादन करने के कारण राजा ने उस मित्र-मंडली पर प्रसन्न होकर अभयदान दे दिया था कि वह अपनी ईच्छानुसार कोई भी कार्य करने में स्वतन्त्र है। राज्य की ओर से उसे पूरा संरक्षण था, इस कारण यह गोष्ठी बहुत उच्छंखल और स्वच्छन्द बन गई । एक दिन राजगृह नगर में एक उत्सव मनाने की घोषणा हुई । इस पर अर्जुनमाली ने अनुमान किया कि कल इस उत्सव के अवसर पर बहुत अधिक फूलों की माँग होगी । इसलिए उस दिन वह प्रातःकाल में जल्दी ही ऊठा और बाँस की छबड़ी लेकर अपनी पत्नी बन्धुमती के साथ जल्दी घर से नीकला । नगर में होता हुआ अपनी फुलवाड़ी में पहुंचा
और अपनी पत्नी के साथ फूलों को चून-चून कर एकत्रित करने लगा । उस समय पूर्वोक्त 'ललिता' गोष्ठी के छह गोष्ठिक पुरुष मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन में आकर आमोद-प्रमोद करने लगे।
उधर अर्जनमाली अपनी पत्नी बन्धमती के साथ फल-संग्रह करके उनमें से कुछ उत्तम फल छाँटकर उनसे नित्य-नियम अनुसार मुद्गरपाणि यक्ष की पूजा करने के लिए यक्षायतन की ओर चला । उन छह गोष्ठिक पुरुषों ने अर्जुनमाली को बन्धुमती भार्या के साथ यक्षायतन की ओर आते देखा । परस्पर विचार करके निश्चय किया"अर्जुनमाली अपनी बन्धुमती भार्या के साथ इधर ही आ रहा है । हम लोगों के लिए यह उत्तम अवसर है कि अर्जुनमाली को तो औंधी मुश्कियों से बलपूर्वक बाँधकर एक और पटक दें और बन्धुमति के साथ खूब काम क्रीड़ा करें ।" यह निश्चय करके वे छहों उस यक्षायतन के किवाड़ों के पीछे छिप कर निश्चल खड़े हो गए और उन दोनों के यक्षायतन के भीतर प्रविष्ट होने की श्वास रोककर प्रतीक्षा करने लगे । इधर अर्जुनमाली अपनी बन्धुमती भार्या के साथ यक्षायतन में प्रविष्ट हुआ और यक्ष पर दृष्टि पड़ते ही उसे प्रणाम किया । फिर चूने हुए उत्तमोत्तम फूल उस पर चढ़ाकर दोनों घुटने भूमि पर टेककर प्रणाम किया । उसी समय शीघ्रता से उन छह गोष्ठिक पुरुषों ने किवाड़ों के पीछे से नीकलकर अर्जुनमाली को पकड़ लिया और उसकी औंधी मुश्कें बाँधकर उसे एक ओर पटक दिया । फिर उसकी पत्नी बन्धुमती मालिन के साथ विविध प्रकार से कामक्रीड़ा करने लगे।
यह देखकर अर्जुनमाली के मन में यह विचार आया-''मैं अपने बचपन से ही भगवान मुद्गरपाणि को अपना इष्टदेव मानकर इसकी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पूजा करता आ रहा हूँ । इसकी पूजा करने के बाद ही इन फूलों को बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता हूँ। तो यदि मुद्गरपाणि यक्ष देव यहाँ वास्तव में ही होता हो तो क्या मुझे इस प्रकार विपत्ति में पड़ा देखता रहता ? अतः वास्तव में यहाँ मुद्गरपाणि यक्ष नहीं है । यह तो मात्र काष्ठ का
। तब मदगरपाणि यक्ष ने अर्जनमाली के इस प्रकार के मनोगत भावों को जानकर उसके शरीर में प्रवेश किया और उसके बन्धनों को तड़ातड़ तोड़ डाला । तब उस मुद्गरपाणि यक्ष से आविष्ट अर्जुनमाली ने लोहमय मुद् गर को हाथ में लेकर अपनी बन्धुमती भार्या सहित उन छहों गोष्ठिक पुरुषों को उस मुदगर के प्रहार से मार डाल इस प्रकार इन सातों का घात करके मुद्गरपाणि यक्ष से आविष्ट वह अर्जुनमाली राजगृह नगर की बाहरी सीमा के आसपास चारों ओर छह पुरुषों और एक स्त्री, इस प्रकार सात मनुष्यों की प्रतिदिन हत्या करत हुए घूमने लगा।
उस समय राजगृह नगर के शृंगाटक आदि सभी स्थानों में बहुत से लोग परस्पर इस प्रकार बोलने लगी"देवानुप्रियों ! अर्जुनमाली, मुद्गरपाणि यक्ष के वशीभूत होकर राजगृह नगर के बाहर एक स्त्री और छह पुरुष इस प्रकार सात व्यक्तियों को प्रतिदिन मार रहा है।' उस समय जब श्रेणिक राजा ने यह बात सूनी तो उन्होंने अपने सेवक पुरुषों को बुलाया और उनको इस प्रकार कहा-'हे देवानुप्रियों ! राजगृह नगर के बाहर अर्जुनमाली यावत् छह पुरुषों और एक स्त्री-इस प्रकार सात व्यक्तियों का प्रतिदिन घात करता हुआ घूम रहा है । अतः तुम सारे नगर में मेरी आज्ञा को इस प्रकार प्रसारित करो कि कोई भी घास के लिए, काष्ठ, पानी अथवा फल-फूल आदि के लिए राजगृह नगर के बाहर न नीकले । ऐसा न हो कि उनके शरीर का विनाश हो जाए । हे देवानुप्रियों ! इस प्रकार दो तीन बार घोषणा करके मुझे सूचित करो ।' यह राजाज्ञा पाकर राजसेवकों ने राजगृह नगर में घूम घूम कर राजाज्ञा की घोषणा की और घोषणा करके राजा को सूचित कर दिया। __उस रागजृह नगर में सुदर्शन नाम के एक धनाढ्य शेठ रहते थे । वे श्रमणोपासक-थे और जीव-अजीव का
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक ज्ञाता था यावत् अपनी आत्मा को भावित-वासित करते हुए विहरण कर रहे थे । उस काल और उस समय श्रमण भगवान महावीर राजगृह पधारे और बाहर उद्यान में ठहरे । उनके पधारने के समाचार सूनकर राजगृह नगर के शृंगाटक राजमार्ग आदि स्थानों में बहुत से नागरिक परस्पर इस तरह वार्तालाप करने लगे-यावत् विपुल अर्थ को ग्रहण करने से होने वाले फल की तो बात ही क्या है ? इस प्रकार बहुत से नागरिकों के मुख से भगवान के पधारने के समाचार सूनकर सुदर्शन शेठ के मन में इस प्रकार, चिंतित, प्रार्थित, मनोगत संकल्प उत्पन्न हुआ- 'निश्चय ही श्रमण भगवान महावीर नगर में पधारे हैं और बाहर गुणशीलक उद्यान में विराजमान हैं, इसलिए मैं जाऊं और श्रमण भगवान महावीर को वंदन-नमस्कार करूँ ।' ऐसा सोचकर वे अपने माता-पिता के पास आए और हाथ जोड़कर बोले
हे माता-पिता ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी नगर के बाहर उद्यान में बिराज रहे हैं । अतः मैं चाहता हूँ कि मैं जाऊं और उन्हें वंदन-नमस्कार करूँ। यावत पर्यपासना करूँ | यह सनकर माता-पिता, सदर्शन शेठ से इस प्रकार बोले-हे पुत्र ! निश्चय ही अर्जुन मालाकार यावत मनुष्यों को मारता हआ घूम रहा हे इसलिए हे पुत्र ! तुम श्रमण भगवान महावीर को वंदन करे के लिए नगर के बाहर मत नीकलो । सम्भव है तुम्हारे शरीर को हानि हो जाए। अतः यही अच्छा है कि तुम यहीं से श्रमण भगवान महावीर को वंदन-नमस्कार कर लो।' तब सुदर्शन शेठ ने कहा "हे माता-पिता ! जब श्रमण भगवान महावीर यहाँ पधारे हैं, और बाहर उद्यान में बिराजमान हैं तो मैं उनको यहीं से वंदन-नमस्कार करूँ यह कैसे हो सकता है । अतः आप मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं वहीं जाकर श्रमण भगवान महावीर को वंदन करूँ, नमस्कार करूँ यावत् उनकी पर्युपासना करूँ ।' सुदर्शन शेठ को माता-पिता जब अनेक प्रकार की युक्तियों से नहीं समझा सके तब माता-पिता ने अनिच्छापूर्वक इस प्रकार कहा
'हे पुत्र ! फिर जिस प्रकार तुम्हें सुख उपजे वैसा करो ।' सुदर्शन शेठ ने माता-पिता से आज्ञा प्राप्त करके स्नान किया और धर्मसभा में जाने योग्य शुद्ध मांगलिक वस्त्र धारण किये फिर अपने घर से नीकला और पैदल ही राजगृह नगर के मध्य से चलकर मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन के न अति दूर और न अति निकट से होते हुए जहाँ गुणशील नामक उद्यान और जहाँ श्रमण भगवान महावीर थे उस ओर जाने लगा । तब उस मुद्गरपाणि यक्ष ने सुदर्शन श्रमणोपासक को समीप से ही जाते हुए देखा । देखकर वह क्रुद्ध हुआ, रुष्ट हुआ, कुपित हुआ, कोपातिरेक से भीषण बना हुआ, क्रोध की ज्वाला से जलता हुआ, दाँत पीसता हुआ वह हजार पल भार वाले लोहे के मुद्गर को घूमात-घूमाते जहाँ सुदर्शन श्रमणोपासक था, उस ओर आने लगा । उस समय क्रुद्ध मुद् गरपाणि यक्ष को अपनी ओर आता देखकर सुदर्शन श्रमणोपासक मृत्यु की संभावना को जानकर भी किंचित् भय, त्रास, उद्वेग अथवा क्षोभ को प्राप्त नहीं हआ । उसका हृदय तनिक भी विचलित अथवा भयाक्रान्त नहीं हुआ। उसने निर्भय होकर अपने वस्त्र के अंचल से भूमि का प्रमार्जन किया । फिर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठ गया ! बैठकर बाएं घूटने को ऊंचा किया और दोनों हाथ जोड़कर मस्तक पर अंजलिपुट रखा । इसके बाद इस प्रकार बोला
मैं उन सभी अरिहंत भगवंतों को, जो अतीतकाल में मोक्ष पधार गए हैं, एवं धर्म के आदिकर्ता तीर्थंकर श्रमण भगवान महावीर को जो भविष्य में मोक्ष पधारने वाले हैं, नमस्कार करता हूँ | मैंने पहले श्रमण भगवान महावीर से स्थूल प्राणातिपात का आजीवन त्याग किया, स्थूल मषावाद, स्थूल अदत्तादान का त्याग किया, स्वदार संतोष और ईच्छापरिणाम रूप व्रत जीवनभर के लिए ग्रहण किया है । अब उन्हीं की साक्षी से प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन और संपूर्ण-परिग्रह का सर्वथा आजीवन त्याग करता हूँ। मैं सर्वथा क्रोध, यावत्
पादर्शन शल्य तक के समस्त पापों का भी आजीवन त्याग करता हूँ। सब प्रकार का अशन, पान, खादिम और स्वादिम इन चारों प्रकार के आहार का भी त्याग करता हूँ । यदि मैं इस आसन्नमृत्यु उपसर्ग से बच गया तो पारणा करके आहारादि ग्रहण करूँगा । यदि मुक्त न होऊं तो मुझे यह संपूर्ण त्याग यावज्जीवन हो । ऐसा निश्चय करके सुदर्शन शेठ ने उपर्युक्त प्रकार से सागारी पडिमा धारण की।
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आगम सूत्र- ८, अंगसूत्र- ८, ' अंतकृत् दशा '
वर्ग / अध्ययन / सूत्रांक
इधर वह मुद्गरपाणि यक्ष उस हजार पल के लोहमय मुद्गर को घूमाता हुआ जहाँ सुदर्शन श्रमणोपासक था वहाँ आया । परन्तु सुदर्शन श्रमणोपासक को अपने तेज से अभिभूत नहीं कर सका अर्थात् उसे किसी प्रकार से कष्ट नहीं पहुँचा सका । मुद्गरपाणि यक्ष सुदर्शन श्रावक के चारों ओर घूमता रहा और जब उसको अपने तेज से पराजित नहीं कर सका तब सुदर्शन श्रमणोपासक के सामने आकर खड़ा हो गया और अनिमेष दृष्टि से बहुत देर तक उसे देखता रहा । इसके बाद उस मुद्गरपाणि यक्ष ने अर्जुन माली के शरीर को त्याग दिया और उस हजार पल भार वाले लोहमय मुद्गर को लेकर जिस दिशा से आया था, उसी दिशा में चला गया । मुद्गरपाणि यक्ष से मुक्त होते ही अर्जुन मालाकार धस् इस प्रकार के शब्द के साथ भूमि पर गिर पड़ा। तब सुदर्शन श्रमणोपासक ने अपने को उपसर्ग रहित हुआ जानकर अपनी प्रतिज्ञा का पारण किया और अपना ध्यान खोला ।
इधर वह अर्जुन माली मुहूर्त्त भर के पश्चात् आश्वस्त एवं स्वस्थ होकर उठा और सुदर्शन श्रमणोपासक को सामने देखकर इस प्रकार बोला- देवानुप्रिय ! आप कौन हो ? तथा कहाँ जा रहे हो ?' यह सूनकर सुदर्शन श्रमणोपासक ने अर्जुन माली से इस तरह कहा- देवानुप्रिय में जीवादि नव तत्त्वों का ज्ञाता सुदर्शन नामक श्रमणोपासक हूँ और गुणशील उद्यान में श्रमण भगवान महावीर को वंदन नमस्कार करने जा रहा हूँ। यह सूनकर अर्जुन माली सुदर्शन श्रमणोपासक से बोला- 'हे देवानुप्रिय ! मैं भी तुम्हारे साथ श्रमण भगवान महावीर को वंदना यावत् पर्युपासना करना चाहता हूँ ।' सुदर्शन ने अर्जुन माली से कहा-'देवानुप्रिय ! जैसे तुम्हें सुख हो वैसा करो ।' इसके बाद सुदर्शन श्रमणोपासक अर्जुन माली के साथ जहाँ गुणशील उद्यान में श्रमण भगवान महावीर बिराजमान थे, वहाँ आया और अर्जुन माली के साथ श्रमण भगवान महावीर को आदक्षिण प्रदक्षिणा की, यावत् उस समय श्रमण भगवान महावीर ने सुदर्शन श्रमणोपासक, अर्जुन माली और उस विशाल सभा के सम्मुख धर्मकथा कही । सुदर्शन धर्मकथा सूनकर अपने घर लौट गया ।
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अर्जुन माली श्रमण भगवान महावीर के पास धर्मोपदेश सूनकर एवं धारण कर अत्यन्त प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हुआ और प्रभु महावीर को तीन बार आदक्षिण- प्रदक्षिणा कर, वंदन नमस्कार करके इस प्रकार बोला- भगवन् ! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ, रुचि करता हूँ, यावत् आपके चरणों में प्रव्रज्या लेना चाहता हूँ । भगवान महावीर ने कहा-'' देवानुप्रिय ! जैसे तुम्हें सुख उपजे, वैसा करो ।' तब अर्जुन माली ने ईशानकोण में जाकर स्वयं ही पंचमौष्टिक लुंचन किया, वे अनगार हो गये । संयम व तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । इसके पश्चात् अर्जुन मुनि ने जिस दिन मुण्डित होकर प्रव्रज्या ग्रहण की, उसी दिन इस प्रकार का अभिग्रह धारण किया - " आज से मैं निरन्तर बेले - बेले की तपस्या से आजीवन आत्मा को भावित करते हुए विचरूँगा ।" इसके पश्चात् अर्जुन मुनि बेले की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय और दूसरे प्रहर में ध्यान करते । फिर तीसरे प्रहर में राजगृह नगर में भिक्षार्थ भ्रमण करते थे ।
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उस समय अर्जुन मुनि को राजगृह नगर में उच्च-नीच - मध्यम कुलों में भिक्षार्थ घूमते हुए देखकर नगर के अनेक नागरिक-स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध इस प्रकार कहते -' इसने मेरे पिता को मारा है । इसने मेरी माता को मारा है। भाई को, बहन को, भार्या को, पुत्र को, कन्या को, पुत्रवधू को, एवं इसने मेरे अमुक स्वजन संबंधी या परिजन को मारा है । ऐसा कहकर कोई गाली देता यावत् ताड़ना करता। इस प्रकार उन बहुत से स्त्री-पुरुष, बच्चे, बूढ़े और जवानों से आक्रोश यावत् ताड़ित होते हुए भी वे अर्जुन मुनि उन पर मन से भी द्वेष नहीं करते हुए उनके द्वारा दिये गये सभी परीषहों को समभावपूर्वक सहन करते हुए उन कष्टों को समभाव से झेल लेते एवं निर्जरा लाभ समझते हुए राजगृह नगर के छोटे, बड़े एवं मध्यम कुलों में भिक्षा हेतु भ्रमण करते हुए अर्जुन मुनि को कभी भोजन मिलता तो पानी नहीं मिलता और पानी मिलता तो भोजन नहीं मिलता । वैसी स्थिति में जो भी और जैसा भी अल्प स्वल्प मात्रा में प्रासुक भोजन उन्हें मिलता उसे वे सर्वथा अदीन, अविमन, अकलुष, अमलिन, आकुलव्याकुलता रहित अखेद-भाव से ग्रहण करते, थकान अनुभव नहीं करते ।
इस प्रकार वे भिक्षार्थ भ्रमण करके वे राजगृह नगर से नीकलते और गुणशील उद्यान में, जहाँ श्रमण
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक भगवान महावीर बिराजमान थे, वहाँ आते और फिर भिक्षा में मिले हुए आहार-पानी को प्रभु महावीर को दिखाते । दिखाकर उनकी आज्ञा पाकर मूर्छा रहित, गृद्धि रहित, राग रहित और आसक्ति रहितः जिस प्रकार बिल में सर्प सीधा ही प्रवेश करता है उस प्रकार राग-द्वेष भाव से रहित होकर उस आहार-पानी का सेवन करते । तत्पश्चात् किसी दिन श्रमण भगवान महावीर राजगृह नगर के उस गुणशील उद्यान से नीकलकर बाहर जनपदों में विहार करने लगे । अर्जुन मुनि ने उस उदार, श्रेष्ठ, पवित्र भाव से ग्रहण किये गये, महालाभकारी, विपुल तप से अपनी आत्मा को भावित करते हुए पूरे छह मास श्रमण धर्म का पालन किया । इसके बाद आधे मास की संलेखना से अपनी आत्मा को भावित करके तीस भक्त के अनशन को पूर्ण कर जिस कार्य के लिए व्रत ग्रहण किया था उसको पूर्ण कर वे अर्जुन मुनि यावत् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गए।
वर्ग-६ अध्ययन-४ से १४ सूत्र - २८
उस काल उस समय राजगृह नगर में गुणशील नामक चैत्य था । श्रेणिक राजा था । काश्यप नाम का एक गाथापति रहता था । उसने मकाई की तरह सोलह वर्ष तक दीक्षापर्याय का पालन किया और अन्त समय में विपुलगिरि पर्वत पर जाकर संथारा आदि करके सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गया। सूत्र - २९
इसी प्रकार क्षेमक गाथापति का वर्णन समझें । विशेष इतना है कि काकंदी नगरी के निवासी थे और सोलह वर्ष का उनका दीक्षाकाल रहा, यावत् वे भी विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। सूत्र-३०
ऐसे ही धतिधर गाथापति का भी वर्णन समझें । वे काकंदी के निवासी थे। सूत्र - ३१
इसी प्रकार कैलाश गाथापति भी थे । विशेष यह कि ये साकेत नगर के रहने वाले थे, इन्होंने बारह वर्ष की दीक्षापर्याय पाली और विपुलगिरी पर्वत पर सिद्ध हुए ।
सूत्र-३२
ऐसे ही आठवें हरिवन्दन गाथापति भी थे । वे भी साकेत नगरनिवासी थे। सूत्र - ३३
इसी तरह नवमे वारत्त गाथापति राजगृह नगर के रहने वाले थे। सूत्र - ३४
दशवें सुदर्शन गाथापति का वर्णन भी इसी प्रकार समझें । विशेष यह कि वाणिज्यग्राम नगर के बाहर द्युतिपलाश नामका उद्यान था । वहाँ दीक्षित हुए । पाँच वर्ष का चारित्र पालकर विपुलगिरि में सिद्ध हुए। सूत्र - ३५
पूर्णभद्र गाथापति का वर्णन सुदर्शन जैसा ही है। सूत्र - ३६
सुमनभद्र गाथापति श्रावस्ती नगरी के वासी थे । बहुत वर्षों तक चारित्र पालकर विपुलाचल पर सिद्ध हुए। सूत्र-३७,३८
सुप्रतिष्ठित गाथापति श्रावस्ती नगरी के थे और सत्ताईस वर्ष संयम पालकर विपुलगिरि पर सिद्ध हए।
मेघ गाथापति का वृत्तान्त भी ऐसे ही समझें । विशेष-राजगृह के निवासी थे और बहुत वर्षों तक चारित्र पालकर विपुलगिरि पर सिद्ध हुए।
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग-६ अध्ययन-१५ सूत्र-३९
उस काल और उस समय में पोलासपुर नामक नगर था । वहाँ श्रीवन नामक उद्यान था । उस नगर में विजय नामक राजा था । उसकी श्रीदेवी नामकी महारानी थी, यहाँ राजा-रानी का वर्णन समझ लेना । महाराजा विजय का पुत्र, श्रीदेवी का आत्मज अतिमुक्त नामका कुमार था जो अतीव सुकुमार था । उस काल और उस समय श्रमण भगवान महावीर पोलासपुर नगर के श्रीवन उद्यान में पधारे । उस काल, उस समय श्रमण भगवान महावीर के ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभूति, व्याख्या प्रज्ञप्ति में कहे अनुसार निरन्तर बेले-बेले का तप करते हुए संयम और तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरते थे । पारणे के दिन पहली पौरीसी में स्वाध्याय, दूसरी पौरिसी में ध्यान
और तीसरी पौरिसी में शारीरिक शीघ्रता से रहित, मानसिक चपलता रहित, आकुलता और उत्सुकता रहित होकर मुख-वस्त्रिका की पडिलेखना करते हैं और फिर पात्रों और वस्त्रों की प्रतिलेखना करते हैं । फिर पात्रों की प्रमार्जना करके और पात्रों को लेकर जहाँ श्रमण भगवान महावीर विराजमान थे वहाँ आए, आकर भगवान को वंदनानमस्कार कर इस प्रकार निवेदन किया-'"हे भगवन् ! आज षष्ठभक्त के पारणे के दिन आपकी आज्ञा होने पर पोलासपुर नगर में यावत्-भिक्षार्थ भ्रमण करने लगे।
___ इधर अतिमुक्त कुमार स्नान करके यावत् शरीर की विभूषा करके बहुत से लड़के-लड़कियों, बालकबालिकाओं और कुमार-कुमारियों के साथ अपने घर से नीकले और नीकल कर जहाँ इन्द्रस्थान अर्थात् क्रीड़ास्थान था वहाँ आए । वहाँ आकर उन बालक बालिकाओं के साथ खेलने लगे। उस समय भगवान गौतम पोलासपुर नगर में सम्पन्न-असम्पन्न था मध्य कुलों में यावत् भ्रमण करते हुए उस क्रीड़ास्थल के पास से जा रहे थे । उस समय अतिमुक्त कुमार ने भगवान गौतम को पास से जाते हए देखा । देखकर जहाँ भगवान गौतम से बोले-'भन्ते ! आप कौन हैं ? और क्यों घूम रहे हैं ?' तब भगवान गौतम ने अतिमुक्त कुमार को इस प्रकार कहा'हे देवानुप्रिय ! हम श्रमण निर्ग्रन्थ हैं, ईयासमिति आदि सहित यावत् ब्रह्मचारी हैं, छोटे बड़े कुलों में भिक्षार्थ भ्रमण करते हैं।
यह सूनकर अतिमुक्त कुमार बोले-'भगवन् ! आप आओ ! मैं आपको भिक्षा दिलाता हूँ।' ऐसा कहकर अतिमुक्त कुमार ने भगवान गौतम की अंगुली पकड़ी और उनको अपने घर ले आए । श्रीदेवी महारानी भगवान गौतम स्वामी को आते देख बहत प्रसन्न हई यावत् आसन से उठकर सम्मुख आई। भगवान गौतम को तीन बार प्रदक्षिणा करके वंदना की, नमस्कार किया फिर विपल अशन, पान, खादिम और स्वादिम से प्रतिलाभ दिया यावत विधिपूर्वक विसर्जित किया । इसके बाद भगवान गौतम से अतिमुक्त कुमार इस प्रकार बोले-'हे देवानुप्रिय ! आप कहाँ रहते हैं ?' देवानुप्रिय ! मेरे धर्माचार्य और धर्मोपदेशक भगवान महावीर धर्म की आदि करने वाले, यावत् शाश्वत स्थान-के अभिलाषी इसी पोलासपुर नगर के बाहर श्रीवन उद्यान में मर्यादानुसार स्थान ग्रहण करके संयम एवं तप से आत्मा को भावित कर विचरते हैं । हम वहीं रहते हैं।'
तब अतिमुक्त कुमार भगवान गौतम से इस प्रकार बोले-'हे पूज्य ! मैं भी आपके साथ श्रमण भगवान महावीर को वंदन करने चलता हूँ |' 'देवानुप्रिय ! जैसे तुम्हें सुख हो वैसा करो !' तब अतिमुक्त कुमार गौतम स्वामी के साथ श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास आये और आकर श्रमण भगवान महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा की । फिर वंदना करके पर्युपासना करने लगे। इधर गौतम स्वामी भगवान महावीर की सेवा में उपस्थित हुए, और गमनागमन संबंधी प्रतिक्रमण किया, तथा भिक्षा लेने में लगे हुए दोषों की आलोचना की । फिर लाया हुआ आहारपानी भगवान को दिखाया और दिखाकर संयम तथा तप से अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। तब श्रमण भगवान महावीर ने अतिमुक्त कुमार को तथा महती परिषद् को धर्म-कथा कही।
अतिमुक्त कुमार श्रमण भगवान महावीर के पास धर्मकथा सूनकर और उसे धारण कर बहुत प्रसन्न और सन्तुष्ट हुआ । विशेष यह है कि उसने कहा-''देवानुप्रिय ! मैं माता-पिता से पूछता हूँ । तब मैं देवानुप्रिय के पास
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक यावत् दीक्षा ग्रहण करूँगा ।'' ''हे देवानुप्रिय ! जैसे तुम्हें सुख हो वैसे करो । पर धर्मकार्य में प्रमाद मत करो ।' तत्पश्चात् अतिमुक्त कुमार अपने माता-पिता के पास पहुँचे । उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा-'माता-पिता ! मैंने श्रमण भगवान महावीर के निकट धर्म श्रवण किया है । वह धर्म मुझे इष्ट लगा है, पुनः पुनः इष्ट प्रतीत हुआ है और खूब रुचा है ।' वत्स ! तुम धन्य हो, वत्स ! तुम पुण्यशाली हो, वत्स ! तुम कृतार्थ हो कि तुमने श्रमण भगवान महावीर के निकट धर्म श्रवण किया है और वह धर्म तुम्हें इष्ट, पुनः पुनः इष्ट और रुचिकर हुआ है।
तब अतिमुक्त कुमार ने दूसरी और तीसरी बार भी यही कहा-'माता-पिता ! मैंने श्रमण भगवान महावीर के निकट धर्म सूना है और वह धर्म मुझे इष्ट, प्रतीष्ट और रुचिकर हुआ है । अत एव मैं हे माता-पिता ! आपकी अनुमति प्राप्त कर श्रमण भगवान महावीर के निकट मुण्डित होकर, गृहत्याग करके अनगार-दीक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ।' इस पर माता-पिता अतिमुक्त कुमार से इस प्रकार बोले-'हे पुत्र ! अभी तुम बालक हो, असंबुद्ध हो । अभी तम धर्म को क्या जानो?' हे माता-पिता ! मैं जिसे जानता हूँ, उसे नहीं जानता हूँ और जिसको नहीं जानता हूँ उसको जानता हूँ।' पुत्र ! तुम जिसको जानते हो उसको नहीं जानते और जिसको नहीं जानते उसको जानते हो, यह कैसे ? 'माता-पिता ! मैं जानता हूँ कि जो जन्मा है उसको अवश्य मरना होगा, पर यह नहीं जानता कि कब, कहाँ, किस प्रकार और कितने दिन बाद मरना होगा ? फिर मैं यह भी नहीं जानता कि जीव किन कर्मों के कारण नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव-योनि में उत्पन्न होते हैं, पर इतना जानता हूँ कि जीव अपने ही कर्मों के कारण नरक यावत् देवयोनि मे उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार निश्चय ही हे माता-पिता ! मैं जिसको जानता हूँ उसी को नहीं जानता और जिसको नहीं जानता उसीको जानता हूँ । अतः मैं आपकी आज्ञा पाकर यावत् प्रव्रज्या अंगीकार करना चाहता हूँ।''
अतिमुक्त कुमार को माता-पिता जब बहुत-सी युक्ति-प्रयुक्तियों से समझाने में समर्थ नहीं हुए, तो बोले-हे पुत्र ! हम एक दिन के लिए तुम्हारी राज्यलक्ष्मी की शोभा देखना चाहते हैं । तब अतिमुक्त कुमार माता-पिता के वचन का अनुवर्तन करके मौन रहे । तब महाबल के समान उसका राज्याभिषेक हुआ फिर भगवान के पास दीक्षा लेकर सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । बहुत वर्षों तक श्रमण-चारित्र का पालन किया । गुणरत्नसंवत्सर तप का आराधन किया, यावत् विपुलाचल पर्वत पर सिद्ध हए।
वर्ग-६ अध्ययन-१६ सूत्र -४०
उस काल और उस समय वाराणसी नगरी में काममहावन उद्यान था । अलक्ष नामक राजा था । उस काल और उस समय श्रमण भगवान महावीर यावत् महावन उद्यान में पधारे । जनपरिषद् प्रभु-वंदन को नीकली, राजा अलक्ष भी प्रभु महावीर के पधारने की बात सुनकर प्रसन्न हआ और कोणिक राजा के समान वह भी यावत् प्रभु की सेवा में उपासना करने लगा । प्रभु ने धर्मकथा कही । तब अलक्ष राजा ने श्रमण भगवान महावीर के पास 'उदयन' की तरह श्रमणदीक्षा ग्रहण की । विशेषता यह कि उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सिंहासन पर बिठाया। ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । बहुत वर्षों तक श्रमणचारित्र का पालन किया यावत् विपुलगिरि पर्वत पर जाकर सिद्ध हए । इस प्रकार"हे जंबू ! श्रमण भगवान महावीर ने अष्टम अंग अंतगडदशा के छटे वर्ग का यह अर्थ कहा है।"
वर्ग-६-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग-७
सूत्र -४१
भता
भगवन् ! यावत् मोक्षप्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने अंतगडदशा के छटे वर्ग का जो अर्थ बताया है, उसका मैंने श्रवण कर लिया है, अब श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त भगवान महावीर ने सातवें वर्ग का जो अर्थ कहा है उसे सूनाने की कृपा करें । हे जंबू ! सातवें वर्ग के तेरह अध्ययन कहे गए हैं। सूत्र - ४२
नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा, नन्दश्रेणिका, मरुता, समरुता, महामरुता, मरुद्देवा । सूत्र - ४३
भद्रा, सुभद्रा, सुजाता, सुमनायिका, भूतदत्ता । ये सब श्रेणिक राजा की रानियाँ थीं।'' सूत्र -४४
"भगवन् ! प्रभु ने सातवें वर्ग के तेरह अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का हे पूज्य ! श्रमण यावत् मुक्ति-प्राप्त प्रभु ने क्या अर्थ कहा है ?'' ''हे जंबू ! उस काल और उस समय में राजगृह नामका नगर था । उसके बाहर गुणशील चैत्य था । श्रेणिक राजा था, नन्दा रानी थी । प्रभु महावीर पधारे । परिषद् वंदन करने को नीकली। नन्दा देवी भगवान के आने का समाचार सूनकर बहुत प्रसन्न हई और आज्ञाकारी सेवक को बुलाकर धार्मिक-रथ लाने की आज्ञा दी। पद्मावती की तरह इसने भी दीक्षा ली यावत् ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । बीस वर्ष तक चारित्र का पालन किया, अंत में सिद्ध हुई।
सूत्र-४५
नन्दवती आदि शेष बारह अध्ययन नन्दा के समान हैं।
वर्ग-७-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक
वर्ग
सूत्र-४६, ४७
"भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त भगवान महावीर ने अंतगडदशा के आठवें वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ?" "हे जंबू ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु महावीर ने आठवें अंग अंतगडदशा के आठवें वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं |काली, सुकाली, महाकाली, कृष्णा, सुकृष्णा, महाकृष्णा, वीरकृष्णा, रामकृष्णा, पितृसेनकृष्णा और महासेनकृष्णा ।
वर्ग-८ अध्ययन-१ सूत्र-४८
"भगवन् ! यदि आठवें वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त महावीर ने क्या अर्थ कहा है ?'' ''हे जंबू ! उस काल और उस समय चम्पा नामकी नगरी थी । वहाँ पूर्णभद्र चैत्य था । वहाँ कोणिक राजा था । श्रेणिक राजा की रानी और महाराजा कोणिक की छोटी माता काली देवी थी। (वर्णन) । नन्दा देवी के समान काली रानी ने भी प्रभु महावीर के समीप श्रमणीदीक्षा ग्रहण करके सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया एवं बहुत से उपवास, बेले, तेले आदि तपस्या से अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी।
__एक दिन वह काली आर्या, आर्या चन्दना के समीप आई और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोली-''हे आर्ये ! आपकी आज्ञा प्राप्त हो तो मैं रत्नावली तप को अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ।" "देवानुप्रिये ! जैसे सुख हो वैसा करो, प्रमाद मत करो ।' तब काली आर्या, आर्या चन्दना की आज्ञा पाकर रत्नावली तप को अंगीकार करके विचरने लगी, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारण किया, पारणा करके बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारण किया, फिर तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर आठ बेले किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर दशम चोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर पंचोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर आठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर नौ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर दश उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया।
पारणा करके ग्यारह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर बारह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर तेरह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर चौदह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर पन्द्रह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर सोलह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर चौंतीस बेले किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर सोलह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर पन्द्रह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर चौदह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर तेरह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर बारह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर ग्यारह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर दस उपवास किये, करके सर्वकाम-गुणयुक्त पारणा किया।
फिर नौ उपवास किये, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर आठ उपवास किये, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पंचोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके चोला किया, करके सर्व-कामगुणयुक्त पारणा किया, करके, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके बेला किया, मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके आठ बेले किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । इस प्रकार इस रत्नावली तपश्चरण की प्रथम परिपाटी की काली आर्या ने आराधना की । सूत्रानुसार रत्नावली तप की इस आराधना की प्रथम परिपाटी एक वर्ष तीन मास और बाईस अहोरात्र में, आराधना पूर्ण की।
इस एक परिपाटी में तीन सौ चौरासी दिन तपस्या के एवं अठासी दिन पारणा के होते हैं । इस प्रकार कुल चार सौ बहत्तर दिन होते हैं । इसके पश्चात् दूसरी परिपाटी में काली आर्या ने उपवास किया और विगय रहित पारणा किया, बेला किया और विगय रहित पारणा किया । इस प्रकार यह भी पहली परिपाटी के समान है । इसमें केवल यह विशेष है कि पारणा विगयरहित होता है । इस प्रकार सूत्रानुसार इस दूसरी परिपाटी का आराधन किया जाता है । इसके पश्चात तीसरी परिपाटी में वह काली आर्या उपवास करती है और लेपरहित पारणा करती है। शेष पहले की तरह है। ऐसे ही काली आर्या ने चौथी परिपाटी की आराधना की । इसमें विशेषता यह है कि सब पारणे आयंबिल से करती हैं। शेष उसी प्रकार है। सूत्र -४९
प्रथम परिपाटी में सर्वकामगुण, दूसरी में विगय रहित पारणा किया । तीसरी में लेप रहित और चोथी परिपाटी में आयंबिल से पारणा किया। सूत्र -५०
इस भाँति काली आर्या ने रत्नावली तप की पाँच वर्ष दो मास और अट्ठाईस दिनों में सूत्रानुसार यावत् धना पूर्ण करके जहाँ आर्या चन्दना थीं वहाँ आई और आर्या चन्दना को वंदना-नमस्कार किया । तदनन्तर बहुत से उपवास, बेला, तेला, चार, पाँच आदि अनशन तप से अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी।
तत्पश्चात् काली आर्या यावत् नसों से व्याप्त हो गयी थी । जैसे कोई कोयलों से भरी गाड़ी हो, यावत् भस्म के समूह से आच्छादित अग्नि की तरह तपस्या के तेज से देदीप्यमान वह तपस्तेज की लक्ष्मी से अतीव शोभायमान हो रही थी । एक दिन रात्रि के पीछले प्रहर में काली आर्या के हृदय में स्कन्दकमुनि के समान विचार उत्पन्न हुआ"जब तक मेरे इस शरीर में उत्थान, कर्म, बल, वीर्य और पुरुषकार-पराक्रम है, मन में श्रद्धा, धैर्य एवं वैराग्य है तब तक मेरे लिये उचित है कि कल सूर्योदय होने के पश्चात् आर्या चन्दना से पूछकर, उनकी आज्ञा प्राप्त होने पर, संलेखना झूषणा का सेवन करती हुई भक्तपान का त्याग करके मृत्यु के प्रति निष्काम होकर विचरण करूँगा ।' ऐसा सोचकर वह अगले दिन सूर्योदय होते ही जहाँ आर्या चन्दना थी वहाँ आई । वंदन-नमस्कार कर इस प्रकार बोली-''हे आर्ये ! आपकी आज्ञा हो तो मैं संलेखना झूषणा करती हुई विचरना चाहती हूँ।'' ''हे देवानुप्रिये ! जैसे तुम्हें सुख हो, वैसा करो । सत्कार्य में विलम्ब न करो ।' तब आर्या वन्दना की आज्ञा पाकर काली आर्या संवेदना झूषणा ग्रहण करके यावत् विचरने लगी।
काली आर्या ने सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और पूरे आठ वर्ष तक चारित्रधर्म का पालन करके एक मास की संलेखना से आत्मा को झूषित कर साठ भक्त का अनशन पूर्ण कर, जिस हेतु से संयम ग्रहण किया था यावत् उसको अन्तिम श्वासोच्छ्वास तक पूर्ण किया और सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गई।
वर्ग-८ अध्ययन-२ सूत्र-५१
उस काल और उस समय में चम्पा नामकी नगरी थी। पूर्णभद्र चैत्य था, कोणिक राजा था । श्रेणिक राजा की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता सुकाली नाम की रानी थी। काली की तरह सुकाली भी प्रव्रजित हुई
और बहुत से उपवास आदि तपों से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । फिर वह सुकाली आर्या अन्यदा किसी दिन आर्या-चन्दना आर्या के पास आकर इस प्रकार बोली-''हे आर्ये ! आपकी आज्ञा हो तो मैं कनकावली
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक तप अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ।' आर्या चन्दना की आज्ञा पाकर रत्नावली के समान सुकाली ने कनकावली तप का आराधन किया । विशेषता इसमें यह थी कि तीनों स्थानों पर अष्टम-तेले किये जब कि रत्नावली में षष्ठ-बेले किये जाते हैं । एक परिपाटी में एक वर्ष, पाँच मास और बारह अहोरात्रियाँ लगती हैं । इस एक परिपाटी में ८८ दिन का पारणा और १ वर्ष, २ मास, १४ दिन का तप होता है । चारों परिपाटी का काल पाँच वर्ष, नौ मास
और अठारह दिन होते हैं । शेष वर्णन काली आर्या के समान है । नौ वर्ष तक चारित्र का पालन कर यावत् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गई।
वर्ग-८ अध्ययन-३ सूत्र-५२
काली की तरह महाकाली ने भी दीक्षा अंगीकार की। विशेष यह कि उसने लघुसिंह निष्क्रीडित तप किया जो इस प्रकार है-उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारण किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पचौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, सात उपवास किये, सर्व-कामगुणयुक्त पारणा किया, आठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया।
नौ उपवास किये, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, आठ उपवास किये, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, नौ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, आठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पाँच उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पचौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । इसी प्रकार चारों परिपाटियाँ समझनी चाहिए । एक परिपाटी में छह मास और सात दिन लगे । चारों परिपाटियों का काल दो वर्ष और अट्ठाईस दिन होते हैं यावत् महाकाली आर्या सिद्ध हुई।
वर्ग-८ अध्ययन-४ सूत्र-५३
इसी प्रकार कृष्णा रानी के विषय में भी समझना । विशेष यह कि कृष्णा ने महासिंह निष्क्रीडित तप किया। लघुसिंह निष्क्रीडित तप से इसमें इतनी विशेषता है कि इसमें एक से लेकर १६ तक अनशन तप किया जाता है और उसी प्रकार उतारा जाता है । एक परिपाटी में एक वर्ष, छह मास और अठारह दिन लगते हैं। चारों परिपाटियों में छह वर्ष, दो मास और बारह अहोरात्र लगते हैं।
वर्ग-८ अध्ययन-५ सूत्र-५४
काली आर्या की तरह आर्या सुकृष्णा ने भी दीक्षा ग्रहण की । विशेष यह कि वह सप्त-सप्तमिका भिक्षुप्रतिमा ग्रहण करके विचरने लगी, जो इस प्रकार है-प्रथम सप्तक में एक दत्ति भोजन की और एक दत्ति पानी की
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक ग्रहण की। द्वितीय सप्तक में दो दत्ति भोजन की और दो दत्ति पानी । तृतीय सप्तक में तीन दत्ति भोजन की और तीन दत्ति पानी । चतुर्थ सप्तक में चार दत्ति भोजन की और चार दत्ति पानी । पाँचवें सप्तक में पाँच दत्ति भोजन की और पाँच दत्ति पानी । छटे सप्तक में छह दत्ति भोजन की और छह दत्ति पानी । सातवें सप्तक में सात दत्ति भोजन की और सात दत्ति पानी । इस प्रकार उनचास रात-दिन में एक सौ छियानवे भिक्षा की दत्तियाँ होती हैं। सुकृष्णा आर्या ने सूत्रोक्त विधि के अनुसार इसी सप्तसप्तमिका' भिक्षुप्रतिमा तप की सम्यग् आराधना की। इसमें आहार-पानी की सम्मिलित रूप से प्रथम सप्ताह में सात दत्तियाँ हई, दूसरे सप्ताह में चौदह, तीसरे
बैंतीस, छठे में बयालीस और सातवें सप्ताह में उनचास दत्तियाँ होती हैं । इस प्रकार सभी मिलाकर कुल एक सौ छियानवे दत्तियाँ हुई । इस तरह सूत्रानुसार इस प्रतिमा का आराधन करके सुकष्णा आर्या आर्य चन्दना आर्या के पास आई और उन्हें वंदना-नमस्कार करके बोली- हे आर्ये ! आपकी आज्ञा हो तो मैं 'अष्ट-अष्टमिका' भिक्षु-प्रतिमा तप अंगीकार करके विचरूँ।'' हे देवानुप्रिये ! जैसे तुम्हें सुख हो वैसा करो। धर्मकार्य में प्रमाद मत करो।
आर्यवन्दना आर्या से आज्ञा प्राप्त होने पर आर्या सुकृष्णा देवी अष्ट-अष्टमिका नामक भिक्षुप्रतिमा को धारण करके विचरने लगी। पहले आठ दिनों में आर्या सुकृष्णा ने एक दत्ति भोजन की और एक दत्ति पानी की ग्रहण की। दूसरे अष्टक में अन्न-पानी की दो-दो दत्तियाँ लीं। इसी प्रकार क्रम से तीसरे में तीन-तीन, चौथे में चारचार, पाँचवे में पाँच-पाँच, छटे में छह-छह, सातवें में सात-सात और आठवें में आठ-आठ अन्न-जल की दत्तियाँ ग्रहण की । इस अष्ट-अष्टमिका भिक्षु-प्रतिमा की आराधना में ६४ दिन लगे और २८८ भिक्षाएं ग्रहण की गई। इस भिक्षु-प्रतिमा की सूत्रोक्त पद्धति से आराधना करने के अनन्तर आर्या सुकृष्णा ने नव-नवमिका नामक भिक्षु-प्रतिमा की आराधना आरम्भ कर दी।
नव-नवमिका भिक्षु-प्रतिमा की आराधना करते समय आर्या सुकृष्णा ने प्रथम नवक में प्रतिदिन एक एक दत्ति भोजन की और एक-एक दत्ति पानी की ग्रहण की । इसी प्रकार आगे क्रमशः एक-एक दत्ति बढ़ाते हुए नौवें नवक में अन्न-जल की नौ-नौ दत्तियाँ ग्रहण की । इस प्रकार यह नव-नवमिका भिक्षु-प्रतिमा इक्यासी दिनों में पूर्ण हुई। इसमें भिक्षाओं की संख्या ४०५ तथा दिनों की संख्या ८१ होती है। सूत्रोक्त विधि के अनुसार नव-नवमिका भिक्षुप्रतिमा की आराधना करने के अनन्तर आर्या सुकृष्णा ने दश-दशमिका नामक भिक्षुप्रतिमा की आराधना आरम्भ की।
दश-दशमिका भिक्षु-प्रतिमा की आराधना करते समय आर्या सुकृष्णा प्रथम दशक में एक-एक दत्ति भोजन और एक-एक दत्ति पानी की ग्रहण करती है। इसी प्रकार एक-एक दत्ति बढ़ाते हुए दसवें दशक में दस-दस दत्तियाँ भोजन की और पानी की स्वीकार करती हैं । दश-दशमिका भिक्षु-प्रतिमा में १०० रात्रि-दिन लग जाते हैं। इसमें ५५० भिक्षाएं और ११०० दत्तियाँ ग्रहण करनी होती हैं । सूत्रोक्त विधि अनुसार दश-दशमिका भिक्षुप्रतिमा की आराधना करने के अनन्तर आर्या सुकृष्णा ने उपवास, बेला, तेला, चौला, पचौला, छह, सात, आठ से लेकर पन्द्रह तथा मासखमण तक की तपस्या के अतिरिक्त अन्य अनेकविध तपों से अपनी आत्मा को भावित किया । इस कठिन तप के कारण सुकृष्णा अत्यधिक दुर्बल हो गई यावत् संपूर्ण कर्मक्षय करके मोक्षगति को प्राप्त हुई।
वर्ग-८ अध्ययन-६
सूत्र-५५
इसी प्रकार महाकृष्णा ने भी दीक्षा ग्रहण की, विशेष-वह लघुसर्वतोभद्र प्रतिमा अंगीकार करके विचरने लगी, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर बेला, तेला, चौला और पचौला किया और सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पचौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पचौला किया, करके
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक सर्वकामगुण-युक्त पारण किया, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पचौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, तेला किया, करके सर्व-कामगुणयुक्त पारणा किया।
इस प्रकार यह लघ सर्वतोभद्र तप-कर्म की प्रथम परिपाटी तीन माह और दस दिनों में पर्ण होती है। इसकी सूत्रानुसार सम्यग रीति से आराधना करके आर्या महाकृष्णा ने इसकी दूसरी परिपाटी में उपवास किया और विगय रहित पारणा किया । जैसे रत्नावली तप में चार परिपाटियाँ बताई गई है वैसे ही इसमें भी होती है । पारणा भी उसी प्रकार समझना चाहिए । इसकी प्रथम परिपाटी में पूरे सौ दिन लगे, जिसमें पच्चीस दिन पारणा के और ७५ दिन उपवास के होते हैं । चारों परिपाटियों का सम्मिलित काल एक वर्ष, एक मास और दस दिन होता है।
वर्ग-८ अध्ययन-७ सूत्र-५६
आर्या काली की तरह आर्या वीरकृष्णा ने भी दीक्षा अंगीकार की । विशेष यह कि उसने महत् सर्वतोभद्र तप कर्म अंगीकार किया, जो इस प्रकार है-उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, यावत् सात उपवास किए सब में सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह प्रथम लता हुई | चोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, इसी क्रम से पाँच-छ-सात-एक-दो और तीन उपवास किए । सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह दूसरी लता हुई । सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । इसी क्रम से एक-दो-यावत् छ उपवास किए । सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह तीसरी लता हुई।
तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर चार-पाँच-छ-सात-एक और दो उपवास किए । सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह चौथी लता हुई । छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया और फिर सात-एक-दो-यावत् पाँच उपवास किए । सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह पाँचवी लता हुई । बेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, फिर तीन-चार यावत् सात और एक उपवास किया सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । इस तरह छठी लता पूर्ण हुई । पचोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छ-सात-एक-दो यावत पाँच उपवास किए । सबमें सर्वकामगणयक्त पारणा किया । यह सातवीं लता हुई । इस प्रकार सात लताओं की परिपाटी का काल आठ मास और पाँच दिन हुआ । चारों परिपाटियों का काल दो वर्ष आठ मास और बीस दिन होता है । शेष पूर्ववत् जान लेना । पूर्ण आराधना करके अन्त में संलेखना करके वीरकृष्णा आर्या भी सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गई।
वर्ग-८ अध्ययन-८ सूत्र-५७
आर्या काली की तरह आर्या रामकृष्णा का भी वृत्तान्त समझना चाहिए । विशेष यह कि रामकृष्णा आर्या भद्रोत्तर प्रतिमा अंगीकार करके विचरण करने लगी, जो इस प्रकार है-पाँच उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह यावत्-नौ उपवास किये, सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह प्रथम लता हुई। सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके आठ-नौ-पाँच और छह उपवास किये, सबमें सर्व-कामगुणयुक्त पारणा किया । यह दूसरी लता हुई । नौ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पाँच-छ-सात और आठ उपवास किये, सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह तीसरी लता पूर्ण हुई।
छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके सात-आठ-नौ और पाँच उपवास किये, सबमें सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह चौथी लता हुई । आठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक किया, फिर नौ-पाँच-छह और सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया । यह पाँचवीं लता पूर्ण हुई। इस तरह पाँच लताओं की एक परिपाटी हुई । ऐसी चार परिपाटियाँ तप में होती है । एक परिपाटी का काल छह माह और बीस दिन है । चारों परिपाटियों का काल दो वर्ष, दो माह और बीस दिन होता है । शेष पूर्व वर्णन के अनुसार समझना चाहिए । काली के समान आर्या रामकृष्णा भी संलेखना करके यावत् सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो गई।
वर्ग-८ अध्ययन-९ सूत्र-५८
पितृसेनकृष्णा का चरित्र भी आर्या काली की तरह समझना । विशेष यह कि पितृसेनकृष्णा ने मुक्तावली तप अंगीकार किया है-उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके बेला, फिर उपवास, फिर तेला, फिर उपवास, फिर चौला, फिर उपवास और पचौला, फिर उपवास और छह, फिर उपवास और सात, इसी तरह क्रमशः बढ़ते बढ़ते उपवास और पंद्रह उपवास तक किए सब के बीच में पारणा सर्वकामगुणित किए । इस प्रकार जिस क्रम से उपवास बढ़ाए जाते हैं उसी क्रम से उतारते जाते हैं यावत् अन्त में उपवास करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया जाता है । इस तरह यह एक परिपाटी हुई । एक परिपाटी का काल ग्यारह माह और पन्द्रह दिन होते हैं। ऐसी चार परिपाटियाँ इस तप में होती हैं । इन चारों परिपाटियों में तीन वर्ष और दस मास का समय लगता है। शेष वर्णन पूर्ववत् ।
वर्ग-८ अध्ययन-१० सूत्र - ५९
इसी प्रकार महासेनकृष्णा का वृत्तान्त भी समझना । विशेष यह कि इन्होंने वर्द्धमान आयंबिल तप अंगीकार किया जो इस प्रकार है-एक आयंबिल किया, करके उपवास किया, करके दो आयंबिल किये, करके उपवास किया, करके तीन आयंबिल किये, करके उपवास किया, करके चार आयंबिल किये, करके उपवास किया, करके पाँच आयंबिल किये, करके उपवास किया । ऐसे एक एक की वृद्धि से आयंबिल बढ़ाए । बीच-बीच में उपवास किया, इस प्रकार सौ आयंबिल तक करके उपवास किया । इस प्रकार महासेनकृष्णा आर्या ने इस 'वर्द्धमान-आयंबिल' तप की आराधना चौदह वर्ष, तीन माह और बीस अहोरात्र की अवधि में सूत्रानुसार विधिपूर्वक पूर्ण की । आराधना पूर्ण करके आर्या महासेनकृष्णा जहाँ अपनी गुरुणी आर्या चन्दनबाला थीं, वहाँ आई
और चन्दनबाला को वंदना-नमस्कार करके, उनकी आज्ञा प्राप्त करके, बहुत से उपवास आदि से आत्मा को भावित करती हई विचरने लगीं।
इस महान तपतेज से महासेनकृष्णा आर्या शरीर से दुर्बल हो जाने पर भी अत्यन्त देदीप्यमान लगने लगी। एकदा महासेनकृष्णा आर्या को स्कन्दक के समान धर्म-चिन्तन उत्पन्न हुआ । आर्यवन्दना आर्या से पूछकर यावत् संलेखना की और जीवन-मरण की आकांक्षा से रहित होकर विचरने लगी । महासेनकृष्णा आर्या ने आर्यावन्दना के पास सामायिक से लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, पूरे सत्रह वर्ष तक संयमधर्म का पालन करके, एक मास की संलेखना से आत्मा को भावित करके साठ भक्त अनशन को पूर्ण कर यावत् जिस कार्य के लिये संयम लिया था उसकी पूर्ण आराधना करके अन्तिम श्वास-उच्छ्वास से सिद्ध बुद्ध हुई। सूत्र - ६०
पहली काली देवी का दीक्षाकाल आठ वर्ष का, तत्पश्चात् क्रमशः एक-एक वर्ष की वृद्धि करते-करते दसवीं महासेनकृष्णा का दीक्षाकाल सत्तरह वर्ष का जानना । सूत्र - ६१
इस प्रकार हे जंबू ! यावत् मुक्तिप्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा का यह अर्थ कहा है, ऐसा मैं कहता हूँ।
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा'
वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक सूत्र - ६२
अंतगडदशा अंग में एक श्रुतस्कंध है । आठ वर्ग हैं । आठ ही दिनों में इनकी वाचना होती है । इसमें प्रथम और द्वितीय वर्ग में दस दस उद्देशक हैं, तीसरे वर्ग में तेरह उद्देशक हैं, चौथे और पाँचवें में दस-दस उद्देशक हैं, छठे वर्ग में सोलह उद्देशक हैं । सातवें वर्ग में तेरह उद्देशक हैं और आठवें वर्ग में दस उद्देशक हैं । शेष वर्णन ज्ञाताधर्मकथा के अनुसार जानना चाहिए।
वर्ग-८-का मुनि दीपरत्नसागर कृत् हिन्दी अनुवाद पूर्ण
८ - अन्तकृद्दशा-आगमसूत्र-८-हिन्दी अनुवाद पूर्ण
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________________ आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा' वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक नमो नमो निम्मलदंसणस्स પૂજ્યપાદ્ શ્રી આનંદ-ક્ષમા-લલિત-સુશીલ-સુધર્મસાગર ગુરૂભ્યો નમ: अंतकृत्-दशा आगमसूत्र हिन्दी अनुवाद [अनुवादक एवं संपादक आगम दीवाकर मुनि दीपरत्नसागरजी ' [ M.Com. M.Ed. Ph.D. श्रुत महर्षि ] Q1 211892:- (1) (2) deepratnasagar.in भेल ड्रेस:-
[email protected] भोना 09825967397 मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 35