SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 5
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम सूत्र-८, अंगसूत्र-८, 'अंतकृत् दशा' वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक [८]अंतकृत् दशा अंगसूत्र-८-हिन्दी अनुवाद वर्ग-१ सूत्र-१ उस काल और उस समय में चंपा नाम की नगरी थी । पूर्णभद्र चैत्य था । उस काल और उस समय में आर्य सुधर्मा स्वामी चंपा नगरी में पधारे । नगर-निवासी जन नीकले । यावत् वापस लौटे । उस काल आउर उस समय में आर्य सुधर्मा स्वामी के आर्य जंबू पर्युपासना करते हुए इस प्रकार बोले- "हे भगवन् ! यदि श्रुतधर्म की आदि करने वाले तीर्थंकर, शाश्वत स्थान को प्राप्त श्रमण भगवान् ने सप्तम अंग उपासकदशाङ्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है, हे भगवन् ! अब यह बतलाओ-कि अष्टम अंग अन्तकृद्दशाङ्ग का क्या अर्थ बताया है ?' "जम्बू ! श्रमण भगवान ने अष्टम अन्तकृद्दशांग के आठ वर्ग प्रतिपादन किए हैं।" "भगवन् ! यदि श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त महावीर स्वामी ने आठवे अंग अन्तकृद्दशा के आठ वर्ग कथन किये हैं, तो भगवन् ! अन्तकृद्दशांग सूत्र के प्रथम वर्ग के कितने अध्ययन प्रतिपादन किये हैं ?'' 'जंबू ! यावत् मोक्षप्राप्त महावीर स्वामी ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा के प्रथम वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं । जैसे कि सूत्र -२ गौतम, समुद्र, सागर, गंभीर, स्तिमित, अचल, काम्पिल्य, अक्षोभ, प्रसेनजित् और विष्णुकुमार | सूत्र-३ "भगवन् ! यदि श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त महावीर ने आठवें अंग अन्तगडसूत्र के प्रथम वर्ग के दश अध्ययन कथन किये हैं तो हे भगवन् ! अन्तगडसूत्र के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ?" "जंबू ! उस काल और उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी । वह बारह योजन लम्बी, नौ योजन चौड़ी, वैश्रमण देव कुबेर के कौशल से निर्मित, स्वर्ण-प्राकारों से युक्त, पंचवर्ण के मणियों से जटित कंगूरों से सुशोभित थी और कुबेर की नगरी सदृश थी । प्रमोद और क्रीड़ा का स्थान थी, साक्षात् देवलोक के समान देखने योग्य, चित्त को प्रसन्न करने वाली, दर्शनीय थी, अभिरूप थी, प्रतिरूप थी । उस द्वारका नगरी के बाहिर ईशान कोण में रैवतक पर्वत था । उस रैवतक पर्वत पर नन्दनवन नाम का उद्यान था (वर्णन) । वहाँ सुरप्रिय यक्ष का मंदिर था, वह बहुत प्राचीन था और चारों ओर से वनखंड से घिरा हुआ था । उस वनखंड के मध्य में एक अशोक वृक्ष था ।'' द्वारका नगरी में कृष्ण वासुदेव राजा राज्य करते थे, वे महान् थे । वे समुद्रविजय प्रमुख दश दशार्ह, बलदेव प्रमुख पाँच महावीर, प्रद्युम्न प्रमुख साढ़े तीन करोड़ राजकुमार, शाम्ब आदि प्रमुख ६० हजार दुर्दान्त कुमार, महासेन प्रमुख १६ हजार राजा, रुक्मिणी आदि १६ हजार रानियाँ, अनंगसेना आदि हजारों गणिकाएं, तथा और भी अनेकों ऐश्वर्यशाली, यावत् सार्थवाह-इन सब पर तथा द्वारका एवं आधे भारतवर्ष पर आधिपत्य करके यावत् विचरते थे । उस द्वारका नगरी में अन्धकवृष्णि राजा था । वह हिमवान्-पर्वत की तरह महान् था । अन्धकवृष्णि राजा की धारिणी नाम की रानी थी। कभी वह धारिणी रानी अन्यत्र वर्णित उत्तम शय्या पर शयन कर रही थी, जिसका वर्णन महाबल समान समझ लेना चाहिए । तत्पश्चात्सूत्र -४ स्वप्न-दर्शन, पुत्रजन्म, उसकी बाल-लीला, कलाज्ञान, यौवन, पाणिग्रहण, रम्य प्रासाद एवं भोगादि-(यह सब वर्णन महाबल जैसा ही समझना)। मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (अंतकृद्दशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 5
SR No.034675
Book TitleAgam 08 Antkruddasha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages35
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 08, & agam_antkrutdasha
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy