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वि० २०
संतमहिमा.
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हो सो अधिभूत कहिये है । यक्ष राक्षस प्रेत ग्रहादिक औ शीत वात आतपतें जो दुःख होवै सो अधिदैव कहिये है ॥ १० ॥ दोहा - पदवंदन तन अघ हरण, तीरथमय पद दोय | संभाषण चित शांत कर, कृपा परम पद होय ॥ ११ ॥
टीका:- संतचरणों के ताई जो वंदन सो शरीरनिष्ठ संचित पापनकों हरे है, काहे ? संतचरणोंकूं तीर्थरूप होने'तैं; सोई भगवान्ने एकादश में कहा है :- " सात्विक गु णधारी नरदेहा, शुद्ध करों ता चरणन खेहा" पुनः बोल'गा जिनका चित्त शांत करै है औ जिनकी कृपा से परमपद की प्राप्ति होवे है, सोई कहा है: - "ज्ञानं विना सु क्तिपदं लभते गुर्वनुग्रहात् " ॥ ११ ॥
अब शिष्य पूछे है :- हे भगवन् ! संतसंगमें सुख कितनाक है ? तहां गुरु कहे हैं:
दोहा - सतसंगति सुखसिंधुवर, मुक्ता नि