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विचारमाला. कि. ४. करै । सो तिनको तवलग श्रवण करै, जबलग श्रवणका फल प्रमाणगत संशयकी निवृत्ति होवै । सो फल यह है:पंथ कहिये वेदांतवाक्य अद्वितीयब्रह्मके प्रतिपादक हैं अपंथ कहिये अन्य स्वर्गादि अर्थके प्रतिपादक नहीं. इस रीतिसे समझै कहिये निश्चय करै ॥ २८ ॥ __यदि कहो, अद्वितीय ब्रह्ममैं वेदांतवाक्योंके तात्पर्यका निश्चय पलिंगोते. होवे है, परंतु ब्रह्मात्माका अभेद निश्वय काहेते होवे हैं ? तहां सुनोःदोहा-तत्त्वमसि अहंब्रह्मास्मि, इत्यादिक महावाक्य ॥ गुरुमुख श्रवण करे भले, सारासार हताक ॥ २९॥
टीकाः-गुरुमुखसे तत्त्वमसि महावाक्यके अर्थ श्रवण करणेते "अहं ब्रह्मास्मि " मैं ब्रह्म हूं यह ज्ञान होवै है। सो या रीतिसे होवै हैः-तत्त्वमसि या वाक्यमें तत्, त्वम्, 'असि, ये तीन पद हैं, तिनमें प्रथम पदका वाच्य कहे हैं:-माया उपाहत जगतका कारण, सर्वज्ञतादि