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विचारमाला. वि०. ४. ब्रह्मका चिंतनरूप मनन करे । सो युक्तियां यह हैजैसे सच्चित् आनंद लक्षण श्रुतिमें आत्मा कहा है, तैसेही सचित् आनंद लक्षण ब्रह्म कहा है, याते ब्रह्मरूप आत्मा है। किंवा:-ब्रह्म नाम व्यापकका है। देशते जाका अंत नहीं होवै सो व्यापक कहिये, ताते जो आत्मा भिन्न होवै तो देशते अंतवाला होगा। जाका देशते अंत होवै ताका कालतेभी अंत होवै है यह नियम है, याते आत्मा अनित्य होवैगा । जाका कालते अंत होवै सो अनित्य कहिये है। याते ब्रह्मसे भिन्न आत्मा नहीं। किंवाः-आत्मासे भिन्न जो ब्रह्म होवै तो, सो अनात्मा होवैगा, जो अनात्मा घटादिक हैं सो जड़ हैं, याते आत्मासे भिन्न ब्रह्मभी जड़ही होवैगा। किंवा:-अनुमानरूप युक्ति कहे हैं:-"जीवो ब्रह्माभिन्नः चेतनत्वात् यत्र यत्र चेतनत्वं तत्र तत्र ब्रह्माभेदः यथा ब्रह्मणि"। जो वादी यामैं यह शंका करे कि:-जीवरूप पक्षमें चेतनत्वरूप हेतु तो है, ब्रह्माभेदरूप साध्य नहीं ? या शंकाका तर्कसे प्रहार करणा,