Book Title: Tulsi Prajna 2006 04
Author(s): Shanta Jain, Jagatram Bhattacharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

View full book text
Previous | Next

Page 62
________________ छह द्रव्य - जैन दर्शनानुसार, समस्त चराचर जगत का स्वरूप छह द्रव्यों के द्वारा समझ सकते हैं। ये छहों द्रव्य जीव, पुदृगल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल हैं। इनमें एक मात्र पुद्गल रूपी द्रव्य है। शेष पाँच 'अरूपी' द्रव्य है। अतः समस्त जगत जीव-पुद्गल या रूपी और अरूपी इन दो भागों में बंटा हुआ है। इन्हीं छहों द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं अर्थात् छह द्रव्यों से पृथक संसार कुछ भी नहीं है। जैन दर्शनानुसार छहों द्रव्य स्वतंत्र हैं तथा अपने-अपने अस्तित्व को कायम रखते हैं, अत: संयोग ही संसार है, जगत को बनाने वाला अन्य कोई नहीं है, इससे संसार की अनादि-अनन्तता सिद्ध होती है। सात तत्त्व - "जीवाजीवाश्रबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्"13 अर्थात् जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं। जीव जब मोहवशात् अजीव के प्रति आसक्ति भाव करता है तो मोह से कर्मों का आगमन होता है, उसे आश्रव कहते हैं। आश्रव से बंध तथा ज्ञान के बल से आत्मा में शुद्धि की वृद्धि होने से नवीन कर्मों का आना रुक जाना संवर, पूर्वबद्ध कर्मों का आत्मा से पृथक् होना निर्जरा और आत्मा में से सम्पूर्ण कर्मों का अलग होना ही मोक्ष है। यही जीवन मुक्ति की प्रक्रिया है। कर्मसिद्धान्त - समस्त भारतीय दर्शन परम्परा को जैन परम्परा और संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान कर्म व्यवस्था है। जैन धर्मानुसार एवं वैदिक परम्परा में कर्मों को ही सुख-दुःख का कारण कहा गया है परन्तु जैन परम्परा में कर्मों को पुद्गल ही कहा गया है। ये आठों कर्म ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय, वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र घाति-अद्याति के भेद से दो प्रकार के हैं। प्रारंभ के चार जीवों के अनुजीवों गुणों का सर्वघात करने वाले होने से घाति तथा शेष चार आंशिक या किंचित घात करने वाले होने से अघाति कहलाते हैं। इन्हीं कर्मों का संयोग संसार और वियोग ही मोक्ष है।" सांस्कृतिक योगदान - भारतीय परम्परा में पर्व एवं त्योहारों का विशेष महत्त्व है। पर्वो के द्वारा ही समाज अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करता है तथा अपनी संस्कृति के अस्तित्त्व को बनाए रखता है। पर्यों अथवा त्योहारों की चर्चा सामने आते ही प्रत्येक जन सामान्य के मन में हर्षोल्लास छा जाता है तथा स्वादलोलुप तो षट्रस मिश्रित भोजन की कामना कर त्योहारों को मौज-मस्ती से मनाने की कल्पना में लग जाते हैं, परन्तु इन सबसे विपरीत जैन पर्व संयम की साधना, तप एवं त्याग की आराधना के सूचक होते हैं। कारण सभी जैन पर्व त्याग-तपस्या एवं मोक्ष प्राप्ति से संबंधित हैं, अतः प्रत्येक जैन श्रावक सभी पर्यों को यानि महावीर जयन्ती, अक्षय तृतीया श्रुतपंचमी, रक्षा बन्धन, महापर्व पर्युषण पर्व और दीपावली को संयम पूर्वक आत्मशांति की प्राप्ति हेतु मनाता है। कला विषयक योगदान - भारत के सांस्कृतिक इतिहास को भली-भांति आलोकित करने वाली आधार भूत सामग्री में साहित्य के अतिरिक्त पुरातत्त्व का अपना विशिष्ट तुलसी प्रज्ञा अप्रेल- जून, 2006 - - 57 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122