Book Title: Shrutsagar Ank 2013 07 030
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 11
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir नलोडापुरमंडन पद्मावती स्तोत्र आईना ॐ ह्रीं श्रीं पासजिणंद, तेहनी सेव सारि घरणिंद्र । तस' पटराणी बुहु गुणवती. नित हुं वादु पदमावती ||१|| नलराजा दमयंती धणी, कूबरनी प्रशद्धि जि घणी। वासी नगर थापी भगवती, नित हुं वादं पदमावती ।।२।। (आंचली) ऊत्तम गाम नलोडं ठाम, साचुं तीरथ अति अभिराम | सचराचरि साची दीपती, नित हुं वादं पदमावती ।।३।। पदम ऊपरि नितु पदमासनि, बइठी सोहिइ भलइ आसणि'। नर-नारिनी आस्यां पूरिति, नित हुं वादं पदमावती ।।४।। मुख सोहइ जिसउ पूनिमचंद, जोता हरख हुवइ आणंद। मउड मूगट टीलि सोभती, नित हुं वादं पदमावती ।।५।। त्रिण पणावली' निज सरि धरइ, नवकुल नागसि क्रीडा करइ। करकमलइ कमल मालती, नित हुं वायूँ पदमावती ।।६।। चतुर्भुजा तनु रातइ वांनि, सोहइ कुडल झलकइ कानि। हीइ हार कुसम सोमती, नित हुं वादं पदमावती' |७ ।। पहिरणि चरणा पीला चंग, कांचलडी चुनडी सुरंग | सुर-नर मुनिजन मन मोहती, नित हुं वायूँ पदमावती ||८|| मृगनयणीनइ गजगामिनी, रूपवंत उतम पदमिनी। पाए घूघर झांझर झमकती', नित हुं वावु पदमावती ।।९।। मस्तकि मुगट श्रीपारश्वनाथ, सपतफणा मणि विस्वानाथ | निज सरि' धरती अतिगुणवती, नित हुं वायूँ पदमावती ।।१०।। * वांदु पद के स्थान पर प्रणमुं पद का प्रयोग मिलता है. १. जस, २. प्रणमुं, ३. कुबेरनी परे सिद्ध ज घणी, ४. नलोडु, ५. बइठी कूकसर्प आसनिं, ६. जोता हुइ हर्ष आणंद, ७. फेणावली, ८. आ गाथा २८३२७ नं. नी प्रतमा नथी. ९. पाए घूघरडी रमझिमकती, १०. विश्व सनाथ, ११. सिर. For Private and Personal Use Only

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