Book Title: Savruttik Aagam Sootraani 1 Part 21 Sooryapragyapti Mool evam Vrutti
Author(s): Anandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Vardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana

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Page 523
________________ आगम (१६) प्रत सूत्रांक [ee] दीप अनुक्रम [११६] “सूर्यप्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र- ५ ( मूलं + वृत्ति:) मूलं [८८] प्राभृत [१७], ----- ---- प्राभृतप्राभृत [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित ..आगमसूत्र - [१६] उपांगसूत्र- [५] "सूर्यप्रज्ञप्ति" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः Education International तदेवमुक्तं षोडशं प्राभृतं सम्प्रति सप्तदशमारभ्यते, तस्य चायमर्थाधिकारः च्यवनोपपाती वक्तव्याविति ततस्तद्विषयं प्रश्नसूत्रमाह ता कहं ते चयणोववाता आहितेति बदेखा ?, तत्थ खलु इमाओ पणवीसं पडिवत्तीओ पण्णताओ, तत्थ एगे एवमाहंसु ता अणुसमयमेव चंदिमसूरिया अण्णे चयंति अण्णे उववनंति एगे एवमाहंसु १, एगे पुण एवमाहंसु ता अणुमुहतमेव चंदिमसूरिया अण्णे चयंति अण्णे उपबति २ एवं जब हा तहेब जाव ता एगे पुण एवमाहंसु ता अणुओसप्पिणी उस्सप्पिणीमेव चंदिमसूरिया अण्णे चयंति अण्णे उववति एगे एवमाहंसु, वयं पुण एवं बदामो-ता चंदिमसूरियाणं देवा महिहीआ महाजुतीया महाबला महाजसा महासोक्खा महाणुभावा वरवत्थधरा वरमलधरा वरगन्धधरा वराभरणधरा अघोछित्तिणपट्टताए काले | अण्णे चयंति अण्णे उववर्जति ॥ सूत्रं ८८ ) सत्तरसमं पाहुडं समत्तं ॥ 'ता कहं ते' इत्यादि, ता इति प्राग्वत् कथं ?-केन प्रकारेण भगवन् ! त्वया चन्द्रादीनां चयवनोपपाती व्याख्याताविति यदेत् ?, सूत्रे च द्विवेऽपि बहुवचनं प्राकृतत्वात् उक्तं च- "बहुधयणेण दुवयण" मिति प्रश्ने कृते भगवानेतद्विपये यावत्यः प्रतिपत्तयः सन्ति तावती रुपदर्शयति तत्थे' त्यादि, तत्र ध्ययनोपपातविषये खल्विमा वक्ष्यमाणस्वरूपाः पञ्चविंशतिः प्रतिपत्तयः- परतीर्थिकाभ्युपगमरूपराः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा - 'तत्येंगे इत्यादि, तत्र तेषां पञ्चविंशतेः परतीर्थिकानां मध्ये एके-परतीर्थिका एवमाहुः, ता इति तेषां प्रथमं स्वशिष्यं प्रत्यने कवक्तव्य तोपक्रमे क्रमोपदर्शनार्थः, अनुसम्य For Par Use Only अथ सप्तदशं प्राभृतं आरभ्यते ~ 523~ wor

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