Book Title: Sanatkumar Charitra
Author(s): Vardhmansuri, Hiralal Hansraj
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj
View full book text
________________
सनत्कुमार 8 अर्थ:-मनवांछित रूप धरनारो ते विद्याधर कौतुकथी आपना रूपनी माया करीने आपना अर्धा आसनपर बेसीने सभामंड- || सान्वय चरित्रं पना लोकोने भ्रांति उपजाववा लाग्यो. ॥ ६५ ।।
भाषान्तर स्वकण्ठन्यस्तमालायां वालायां स विलक्षधीः । अलब्धपिण्डः काकोल इवोत्पत्य वियत्यगात् ॥६६॥ ॥१९८॥
अन्वयः-चालायां व कंठ न्यस्त मालायां विलक्षर्धाः सः अलब्ध पिंड; काकोलः इव उत्पत्य वियति अगात्. ॥६६॥ 8| ॥१९८॥ अर्थः-(परंतु ) ते वालाए पोतानाज कंठमां वरमाला नाखवाथी विलखो पडेलो ते विद्याधर, पिंड नही मेळवनारा कागडानीपेठे उडीने आकाशमा चाल्यो गयो. ॥ ६६ ॥
मया सह सहर्षोऽयमद्य खेलनिहागतः । ददर्श दर्शनीयाङ्गी दोलालोलां तव प्रियाम् ॥ ६७ ॥ अन्वमः-सहर्षः मया सह खेलन् अयं अद्य इह आगतः, दर्शनीय अंगी, दोला लोला तव प्रियां ददर्श ॥ ६७ ॥ अर्थः-हर्षसहित मारी साथे क्रीडा करतोथको ते विद्याधर आजे अहीं आव्यो, (अने) मनोहर शरीरवाळी हींचोळापर झुलती । तमारी स्त्रीने तेणे दीठी. ।। ६७! किमेतदिति संमोहप्ररोहद्रोहितस्वरा । हृता धृतानुरागेण ततस्तेनाना तव ॥ ६८॥
अन्वयः-ततः धृत अनुरागेण तेन, एतत् किं इति संमोह प्ररोह द्रोहित स्वरा तब अंगना हृता. ॥ ६८ ॥ की अर्थः-पछी धारण करेल छे अनुराग जेणे एवा ते भीमविद्याधरे, आ शुं? एम मुंझवणमा पडवाथी रुंधायो छे कंठ जेणीनो एवी 131
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 192 193 194 195 196 197 198 199 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224 225 226 227 228