Book Title: Samadhimaran
Author(s): Rajjan Kumar
Publisher: Parshwanath Shodhpith Varanasi

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Page 163
________________ १५० समाधिमरण आदि इसके भँवर हैं।१२५ कर्म-रूपी भाण्ड से भरा हुआ जीव-रूपी जहाज शुभ-अशुभ परिणामरूपी वायु से संसार-रूपी महासागर में प्रवेश करके चिरकाल तक भ्रमण करता रहता है अर्थात् जीव इस संसार में विभिन्न प्रकार की योनियों में जन्म लेकर भ्रमण करता रहता है और दुःखों को भोगता रहता है।१२६ दुःख रूपी साम्राज्य से युक्त इस संसार में जीव अनन्तकाल से भ्रमण करता आ रहा है तथा अन्य समस्त जीवों के साथ मातापिता, बहन-भाई, पुत्री-पुत्र, पत्नी-पति आदि सापेक्ष सम्बन्धों से पीड़ित होता रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है जो एक जीव ने दूसरे अन्य जीवों के साथ नहीं भोगा है।१२७ संसार-भावना समाधिमरण के लिए सहायक रूप है। इस भावना के चिन्तन से व्यक्ति संसार के दुःखों को जान लेता है। उसे यह ज्ञान हो जाता है कि इस समय जो कुछ भी उसके पास है वह इस जन्म के पूर्व उसका अपना नहीं था तथा अगले जन्म में भी यह सब उसका अपना नहीं रह जाएगा। उसके अपने बन्धु-बान्धव पिछले जन्म में उसके अपने नहीं थे और शायद अगले जन्म में भी उसके नहीं होंगे। उसका यह शरीर भी अपना नहीं था। अत: इन सबके प्रति राग या प्रीति रखना उचित नहीं है। व्यक्ति को जो भी कष्ट होता है, उसके बन्धु-बान्धवों को जो पीड़ा होती है उससे उसे दुःखी नहीं होना चाहिए। संसार दु:खों का साम्राज्य है इस भावना के चिन्तन से उसे हर प्रकार के दुःख का पूर्ण ज्ञान हो जाता है और वह किसी प्रकार के कष्टों से दुःखी नहीं होता है। इस ज्ञानोदय से व्यक्ति राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है। समाधिमरण के लिए राग-द्वेष से रहित होना अनिवार्य है। इस प्रकार यह भावना राग-द्वेष को दूर करने में सहायक होकर समाधिमरण में भी सहायक होती है। साधना के क्षेत्र में इसकी उपयोगिता यही है कि इसके चिन्तन के द्वारा व्यक्ति संसारजनित तृष्णा को त्यागकर असंसारी भाव को प्राप्त करता है या उसकी प्राप्तत्व की ओर अग्रसर होता है। वह जन्म-मरण से रहित होकर सिद्ध पद को प्राप्त करना चाहता है। असंसारी भाव से तात्पर्य है- सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, मोह से रहित, विध्नों से रहित, सम्यक् दर्शन से युक्त आत्मा (भाव)। एकत्व-भावना एकत्व-भावना का अर्थ है- प्राणी अकेले ही जन्म लेता है और अकेले ही मृत्यु को प्राप्त करता है। अपने शुभाशुभ कर्मों का उपभोग भी वह अकेले ही करता है। मृत्यु के आगमन पर सम्पूर्ण सांसारिक वैभव तथा कुटुम्ब का परित्याग करके व्यक्ति अकेले ही यहाँ से प्रयाण कर जाता है। उत्तराध्ययन के अनुसार आत्मा ही सुख-दुःख का कर्ता है, भोक्ता है और यही आत्मा कर्मों का क्षय करनेवाली है। श्रेष्ठ आचार से युक्त आत्मा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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