Book Title: Sachitra Sushil Kalyan Mandir Stotra
Author(s): Sushilmuni, Gunottamsuri
Publisher: Sushil Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur

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Page 174
________________ स्वर्गाधिपोऽपि चरणाम्बुजसेवकस्ते, नित्यं शिरोमणिगणा निपतन्ति पादौ । शान्तिस्त्वदीयचरणे शरणे सदैव, त्वत्संगमे सुमनसो न रमन्त एव।।२८।। हे देवेश ! भवतां चरणारविन्दयोः सेवायाम् देवलोकाधिपतिरिन्द्रोऽपि सततमुपस्थितो भवति। यदा स देवराजो भवतां चरणकमलयोः विनतो भवति तदा तन्मुकुटमणिगणाः सहसा भवतां चरणशरणे पतन्ति। ते मणिगणाः रत्नजटितमुकुटान् परित्यज्य भवतां चरणयोः किमर्थं - पतन्ति ? इति मे मनसि शंका आसीत् किन्तु सम्प्रति समाधानं प्राप्तं यत् है - भवतां चरणशरणेऽखण्डाऽनन्ता शान्ति विराजते। अतएव सुमनसोऽपितत्रैव * रमन्ते। * हे देवेश ! आपकी चरणसेवा में देवराज इन्द्र भी विनीत भाव से सदैव उपस्थित * होते हैं। जब वह वन्दन के लिए आपके चरण-कमलों में झुकते हैं तब उनके * मुकुट की मणियाँ भी आपके चरणारविन्द पर बिखर जाती हैं, मानो वे भी समझती * हों कि शान्ति, स्वर्ग में नहीं अपितु प्रभु पार्श्वनाथ चरण-कमलों के सान्निध्य में ही है। वस्तुतः अखण्ड, अनन्त शान्ति आपकी चरण-शरण में ही प्राप्त होती है। હે દેવેશ! તમારા ચરણોમાં દેવરાજ ઇન્દ્ર પણ વિનય ભાવથી સદૈવ ઉપસ્થિત થાય છે. " જ્યારે તે વંદન કરવા તમારા ચરણકમળમાં ઝૂકે છે, ત્યારે તેના મુગટના મોતી પણ તમારા જ ચરણો પર વિખેરાઈ જાય છે, જાણે તે પણ સમજતા હોય કે શાંતિ સ્વર્ગમાં નહીં પરંતુ પ્રભુ ને પાર્શ્વનાથના ચરણકમળના સાન્નિધ્યમાં જ છે. વસ્તુતઃ અખંડ, અનંત શાંતિ તમારા અને ચરણ-શરણમાં જ પ્રાપ્ત થાય છે. O God of gods ! Indra, the king of gods, too is in your attendance at your feet with all modesty. When he bows at your lotus-feet to pay his homage, the the gems in his crown get scattered at your feet. It is as if they too understand that peace is not in heaven but in the proximity of the lotus-feet of Prabhu Parshva Naath. In fact undisturbed and endless peace can be availed only in the refuge of your pious feet. Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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