Book Title: Laghustotra Ratnakar
Author(s): Hemendrasagar
Publisher: Buddhisagarsuri Jain Gyanmandir
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(१७९ )
ॐ विसहरदावानल - साइणिवेयालमारियायंका | सिरिनीलकंठपासस्स, समरण मित्ते नासंति पद्मा संगोपीडां कुरग्गददंसणं भयं काये | श्रावी न हुंति एए, तहवि तिसंझं गुणिजासु
"
पीडजंत भगंदर - खाससाससूल तद्दद्द | सिरी सामलपासमहंत नामपऊर पऊलेख | ॐ ह्री पासवरणसंजुत्तं, विसहरविअं जवेइ सुद्धमणेां । पावेई इच्छियसुहं, ॐ ह्रीं श्रीं म्यूँ स्वाहा रोगजलजला विसहर - चोरारिमइंदगयरणभयाई । पास जिणनामसंकित्तयोण पसमंति सव्वाइं
॥ १९ ॥
॥ २० ॥
॥ १६ ॥
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॥ १७ ॥
।। १८ ।।
॥ १ ॥
( १ ) अतः परं गाथाचतुष्टयं पठ्यते । तँ नमह पासनाहं, धरणें दनमंसियं दुहं पणासेइ । तस्स पभावेण सया, नासंति सयलदुरियाई एए समरंताणं, मणे िन दुवाहीनासमाहिदुक्खं । नामंचियमंतसमं, पयडो नत्थित्थ संदेहो जलजलगतहसप्पसीहो, चोरारी संभवेवि खिं जो समरे पास पहु, पहवइ न कयावि किंचितस्स ॥ ३ ॥ इहलो गट्ठी परलो गट्ठी, जो समरेइ पासनाईतु ।
॥ २ ॥
तत्तो सिज्झेइन, कोसह (संति) नाह सुरा भगवंतं । ४ ॥

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