Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 7
________________ सम्पादकीय "जैनदर्शन के मूल सिद्धान्त के रूप में 'कषाय पाहुड' नामक प्रथम ग्रन्थ की रचना ईसा की प्रथम शताब्दी में आचार्य गुणधर ने की थी । इसके पश्चात् इसी शताब्दी में आचार्य द्वय पुष्पदन्त एवं भूतबली ने ‘षट्खण्डागम' की रचना की। ये रचनाएँ केवलि-कथित करणानुयोग कर्म - सिद्धान्त के गूढ़ रहस्यों से सम्बन्धित हैं। इन दोनों ग्रन्थों की विशद टीका /व्याख्या 9वीं शताब्दी में आचार्य वीरसेन द्वारा की गई जो क्रमशः जयधवला और धवला के नाम से प्रसिद्ध हुईं। ये टीका ग्रन्थ अपने आप में स्वतंत्र एवं परिपूर्ण ग्रन्थ जैसे हैं। करणानुयोग के उक्त ग्रन्थ अत्यन्त सूक्ष्म एवं जटिल हैं अतः परवर्ती आचार्यों द्वारा यह प्रयास किया जाता रहा है कि उसके रहस्य को जनसामान्य के समझने योग्य भाषा में व्यक्त किया जाये।" "इस उद्देश्य की पूर्ति (विक्रम की) ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा की गई। उन्होंने षटखण्डागम एवं उसकी धवला टीका तथा कषाय पाहुड एवं उसकी जयधवला टीका का गहन एवं सूक्ष्म अध्ययन कर उनके आधार पर 'गोम्मटसार' (द्वितीय नाम पंचसंग्रह) तथा 'लब्धिसार' ग्रन्थों की रचना की। इनके अलावा उन्होंने 'त्रिलोकसार' की भी रचना की। इन रचनाओं में नेमिचन्द्राचार्य ने गागर में सागर भरने की कहावत चरितार्थ की है । " " वे प्रतिभासम्पन्न, मेधावी, अध्यात्म-रसिक एवं (जैनदर्शन में) कर्म-सिद्धान्त के पारगामी आचार्य थे। वे गंगवंशी राजा राचमल्ल के मंत्री व सेनापति चामुण्डराय के गुरु थे।" "नेमिचन्द्राचार्य ने आचार्य अभयनन्दि, वीरनन्दि एवं इन्द्रनन्दि को अपना गुरु बताया है । " " आचार्य नेमिचन्द्र (विक्रम की 11वीं श) के समय यद्यपि सिद्धान्त ग्रन्थों की पर्याप्तरूपेण उपलब्धता थी, किन्तु वे बृहत्काय और जनसामान्य के लिए न केवल दुर्लभ अपितु दुरूह भी थे। जनसामान्य द्वारा बृहत्काय ग्रन्थों का अध्ययन - स्वाध्याय दुष्कर प्रतीत हो रहा था, जिससे प्रेरित होकर आचार्य नेमिचन्द्र जैसे विद्वत्प्रवर ने बृहत्काय सिद्धान्त ग्रन्थों का सार लिपिबद्ध किया । " "प्राचीनकाल में किसी शास्त्रीयमूल ग्रन्थ पर लिखी गई टीकाएँ इतनी मौलिक और तात्त्विक होती थीं कि उन्हें एक स्वतंत्र ग्रन्थ के रूप में पण्डितों का समादर प्राप्त होता था । " "नेमिचन्द्राचार्य ने करणानुयोग के गोम्मटसार, लब्धिसार एवं त्रिलोकसार ग्रन्थों की रचना की। उनके इस योगदान के कारण उन्हें 'सिद्धान्तचक्रवर्ती' की उपाधि से विभूषित किया गया।" " षट्खण्डागम की धवला टीका का मंथन करके आचार्य नेमिचन्द्र ने 'गोम्मटसार' ग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त हैं- जीवकाण्ड और कर्मकाण्ड । " ‘“नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने महाकर्मप्रकृतिप्राभृत से उद्धृत प्रथम सिद्धान्त - ग्रन्थ के जीवस्थान आदि छ: खण्डों के प्रमेयांश का उद्धार करके गोम्मटसार अपरनाम पंचसंग्रह की रचना की थी। इन टीकाओं से यह स्पष्ट है कि ग्रन्थ की रचना चामुण्डराय के निमित्त हुई थी ।

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