Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

View full book text
Previous | Next

Page 67
________________ जैनविद्या - 19 इसमें सन्देह नहीं कि उनके समक्ष उनके पूर्ववर्ती आचार्यों के न केवल मौलिक ग्रन्थ वरन् उन पर रची गईं विशाल टीकाएँ भी उपस्थित रही होंगी जिनके आधार पर वे अनन्त धर्मप्रीति के साथ उद्घोषित कर सके - जह चक्केण य चक्की छक्खंडं साहियं अविग्घेण। तह मइचक्केण मया छक्खंडं साहियं सम्म यह सुविदित है कि आचार्य भद्रबाहु (ई.पू. चतुर्थ सदी) एवं उनके दीक्षित शिष्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (प्रभाचन्द्राचार्य) ने मिलकर बारह वर्ष के समाधिकाल में एकान्त साधनारत हो दक्षिण भारत के श्रवणबेलगोल की चन्द्रगिरि पर निवास करते हुए अपने पूर्वो का कर्म-सिद्धान्त विषयक गणितमय विज्ञान दक्षिण भारत की आचार्य-परम्परा को ब्राह्मी एवं सुन्दरी लिपियों में (विस्मृति से बचाने हेतु) सौंपा होगा। भारत में अशोक की ब्राह्मी लिपि से पूर्व कोई लिपि उपलब्ध न होने से विलक्षण प्रतिभासम्पन्न चन्द्रगुप्त, जो यूनान एवं यूनानी लिपि-जानकारों के प्रगाढ़ संबंध में थे, गणित को सुन्दरी लिपि और भाषा को ब्राह्मी लिपि से सम्पन्न कर भारत में अपने प्रशासन के अतिरिक्त, जैन शासन को सुदृढ़ कर गये। यही ब्राह्मी- सुन्दरी लिपियों अथवा घनाक्षरी-हीनाक्षरी लिपियों में अंकित ज्ञान कुन्दकुन्दाचार्य, तुम्बुलूर, शामकुंड, यतिवृषभाचार्य, समन्तभद्राचार्य, वीरसेनाचार्या आदि की परम्परा में अंततः नेमिचन्द्राचार्य को प्राप्त हुआ, जिनके कार्य पर केशववर्णी की कर्णाटक वृत्ति, मुनि नेमिचन्द्र की संस्कृत टीका एवं पंडित टोडरमल की विशाल गणितीय संदृष्टिमयी टीकाएँ अवतरित होती चली आईं। ईस्वी सदी के कुछ पूर्व एवं पश्चात् आचार्य गुणधर एवं आचार्य धरसेन के शिष्यों; पुष्पदंत एवं भूतबलि द्वारा क्रमशः ज्ञानप्रवाद पूर्व एवं अग्रायणी पूर्व के कुछ अंशमात्र को लेकर जटिलतम कर्म सिद्धान्त की रचनाएँ 'कसाय पाहुड सुत्तं' एवं 'छक्खंडागम सूत्र' रूपों में हुईं। गणितमय ग्रन्थ संदृष्टि बिना निरुपयोगी होते हैं अतः आवश्यकता आविष्कार की जननी है' के अनुसार यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि सिन्धु-हड़प्पा की लिपि विस्मृत हो जाने के उपरान्त भारत में श्रुत एवं स्मृति-व्यवस्था चली आई, लौकिक एवं पारलौकिक व्यवहार क्रिया-कांडों में, अत: गणितमय कर्म-सिद्धान्त के इन ग्रन्थों तथा नेमिचन्द्राचार्य द्वारा रचित गोम्मटसारादि ग्रन्थों की टीकाओं में अर्थ संदृष्टि, अंक संदृष्टि एवं आकार रूप संदृष्टियों की परम्परा दीक्षित मौर्य चन्द्रगुप्त को ही इन लिपियों के आविष्कार का श्रेय देती प्रतीत हुई हैं। ___ इस प्रकार नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा सूत्रबद्ध की गईं रचनाएँ जो क्रमशः गोम्मटसार, लब्धिसार, क्षपणासार एवं त्रिलोकसार नाम से सुविख्यात हैं अपने आप में परिपूर्ण, क्रमबद्ध, सरलता से ग्राह्य, संस्थोपयोगी एवं ऐतिहासिक रूप ले सकीं। उनमें परम्परागत ज्ञान गणितीय सामग्री भरपूर आ गई जो सभी मतों से विलक्षण सिद्ध हुई। जहाँ तक न्यायगत पक्ष थे वे तो तुलना की वस्तु बन गये और भारतीय न्याय के अनेक मतों से सीधी टक्कर में आ गये किन्तु नेमिचन्द्राचार्य द्वारा चुनी एवं रची गई सामग्री सीधी गणितीय थी, विश्वरचना सम्बन्धी तथा सूक्ष्मतम जगत् के रहस्यों से भरी वैज्ञानिक नियंत्रण प्रणाली रूप विलक्षण थी, अत: वह अपने आप में भारतीय अन्य मतों से अथवा विश्व के अन्य मतों से विलग विशालरूप में पनपती, चुनौती रूप में उतर आयी।

Loading...

Page Navigation
1 ... 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78