Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 71
________________ 62 जैनविद्या - 19 राजू क्या है? उसकी गणना असंख्यात द्वीप समुद्रों में स्थित ज्योतिष बिम्बों की संख्या पर भी आधारित है और ऊर्ध्वलोक तथा अधोलोक की सीमाओं से भी सम्बन्धित है। इस प्रकार लोक या अन्तरिक्ष की गहराइयाँ केवल दृष्ट आकाशीय पिण्डों पर आधारित नहीं हैं । उस अन्तिम दूरी से भी 7 राजू ऊपर तथा 7 राजू नीचे की ओर यह लोक (universe) विस्तृत है। ऊपर स्वर्ग, नीचे नरक, मध्य में तिर्यक्लोक ऐसे प्रमाणों को लिये है जो जीवों सम्बन्धी, स्वर्ग-नरक की रचना तथा मध्यलोक संबंधी रचना लेकर मानो करतल आमलकवत् है (त्रिलोकसार 110)। स्वर्ग भौतिक सुख की सांत सीमाएँ, नर्क नारकीय दुःख की सांत सीमाएँ तथा सिद्धलोक सिद्ध भगवानों की अनन्त सीमाएँ आत्मिक सुख को लेकर है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के लोकों का दिग्दर्शन त्रिलोकसार द्वारा हुआ (144-207, 451-560)। इन लोकों में ज्योतिर्लोक भी था जिसकी गणनाएँ रहस्य से भरी थी। चीन, बेल्लिन आदि देशों में भी कुछ इन्हीं प्रकारों की पद्धति प्रचलित थी। पथ को द्विगुणित कर उसे वृत्तों अर्थात् अक्षांशों और देशांशों में गगनखण्डादि रूप में तथा योजनों में निरूपित कर 1000 वर्षों तक पंचवर्षीय युगवाला पंचांग जारी रहा। इसमें वेदांगज्योतिष के ज्ञान के अतिरिक्त अयनादि युक्त नये-नये गणन प्रविष्ट किये गये। चन्द्र और सूर्य के गमन संबंधी पंचांग स्थूलरूप से, औसतरूप से सही थे किन्तु ग्रह-गमन सम्बन्धी सामग्री यतिवृषभ (पाँचवीं सदी) काल में ही विनष्ट हो चुकी थी। इन जैन धर्मग्रन्थों में, यूनानियों एवं अन्य भारतीय या जैन ज्योतिषियों की ज्योतिष-पद्धति प्रवेश नहीं कर सकी। धर्म में सर्वज्ञता या केवलज्ञान का अचल विश्वास जैनाचार्यों को पूर्व में स्वीकृत पद्धति से विचलित न कर सका। यह एकसूत्री पद्धति पर आधारित ज्ञान था जो सर्वथा मौलिक था। इसमें बीज डाले जा सकते थे तथा ग्रहगमन की वही युगपद्धति द्वारा समाविष्ट हो सकती थी, किन्तु मात्र चंद तिथियों पर ही अवलम्बित धार्मिक उत्सव आदि पर मुख्यतः जोर होने के कारण फलित ज्योतिष उन्हें आकर्षित बाद के काल में न कर सका होगा अतः दृक् ज्योतिष से दूर होते ही यह ज्ञान सीमित रह गया। चित्रा पृथ्वी क्या है? मेरु पर्वत क्या है? चित्रा पृथ्वी से ऊँचाई का क्या तात्पर्य है? शोधकर्ताओं ने यह पाया कि मेरु पर्वत एक खगोलीय अक्ष के रूप में निर्देशकों का चित्रण करता रहा होगा, जहाँ भी इसकी स्थिति रही हो, वह बीचों-बीच ही स्थित होगी और कहीं उत्तर दिशा की ओर इसका प्रेक्ष्य रहा होगा। चित्रा समतल को भूमध्य रेखीय समतल माना जाता रहा हो जिससे ज्योतिर्बिम्बों की ऊँचाइयाँ योजन के कोणीय माप देती रही हों। शेष विवरण पंचांग में अन्तर्भूत है । चंद्र और सूर्य आदि के वाहक देव उस प्राचीन काल की याद दिलाते हैं जब दैविक और आधिदैविक शक्तियों की मान्यता थी। उनमें वैज्ञानिक तथ्यों का प्रवेश नहीं हुआ था। क्या जैनमत में इन अगणनीय शक्तियोंकी मान्यता थी और वह भी किस सीमा तक? यह विचारणीय है। जैन मान्यता में एक द्रव्य की पर्यायों का दूसरे द्रव्य की पर्यायों पर नैमित्तिक प्रभाव माना गया है, जो उपादान द्रव्य की योग्यता पर निर्भर करता है । द्रव्य की द्रव्यता पर त्रिकाल में कोई प्रभाव नहीं होता है - जीव जीव ही रहेगा, कालद्रव्य काल ही, आकाश आकाश ही और पुद्गल पुद्गल ही रहेगा। उनके विशेषगुण भी वहीं रहेंगे। बात केवल पर्याय तक अटकती है, जो

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