Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 65
________________ 56 जैनविद्या - 19 नहीं है। कर्म-सिद्धान्त जैसे अध्यात्म-सिद्धान्त का विपुल वर्णन और विवेचन के कारण आचार्यश्री अपनी सिद्धान्तचक्रवर्ती, उपाधि को अक्षरशः अन्वर्थ करते हैं तथा 'सारस्वताचार्य' की गरिमा का भी अधिकारपूर्वक संवहन करते हैं। सिद्धान्तचक्रवर्तीजी ने 'गोम्मटसार' के कर्मकाण्ड में मूल और उत्तर प्रकृतियों के नोकर्मद्रव्यकर्म का सोदाहरण विवेचन विशद रूप में विस्तार के साथ किया है, जो कर्म-सिद्धान्त की मीमांसा का एक प्रामाणिक सन्दर्भ बन गया है। इनका यह विवेचन न केवल धार्मिक या दार्शनिक महत्त्व रखता है, अपितु इसका वैज्ञानिक मूल्य भी है। यह बताना नहीं होगा कि जैनदर्शन एक वैज्ञानिक दर्शन है और इस दर्शन को यह वैज्ञानिक दृष्टि नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती जैसे शलाकापुरुषोपम मनीषियों की सूक्ष्मेक्षिकापूर्ण आन्वीक्षिकी से प्राप्त हुई है। 'गोम्मटसार' का कर्मकाण्ड कर्म-सिद्धान्त का पार्यन्तिक ग्रन्थ है, जिसमें इसके पूर्ववर्ती कर्म-सिद्धान्त विषयक ग्रन्थों का सार एकत्र सुलभ होता है । इसका एक-एक अधिकार पाठक और श्रोता को निर्वाण का सुख देता है। 'सत्त्वस्थानभंग' के बारे में तो स्पष्ट ही उक्त प्रकार की उद्घोषणा आचार्यश्री ने की है - एवं सत्तट्ठाणं सवित्थरं वणियं मए सम्म। जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ णिव्वुदिं सोक्खं ॥395॥गो.क. ___पी. एन. सिन्हा कॉलोनी भिखना पहाड़ी पटना - 800006

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