Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 53
________________ 44 — - जैनविद्या - 19 लक्खणमेयं चंडो ण मुचइ वेरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ । दुट्ठो ण य एदि वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स ॥ 509 ॥ ****... मंद बुद्धिविहीणो णिव्विण्णाणी य विसयलोलो य । माणी माई य तहा आलस्सो चेव भेज्जो य ॥ 510 ॥ णिद्दावचनबहुलो धणधणे होदि तिव्वसणा य । लक्खणमेयं भणियं समासदो णीललेस्सस्स ॥ 511 ॥ रूसइ दिइ अण्णे दूसइ बहुसो य सोयभयबहुलो । असुयइ परिभवइ परं पसंसये अप्पयं बहुसो ॥ 512 ॥ णय पत्तियइ परं सो अप्पाणं यिव परं पि मण्णंतो । थूसइ अभित्थुवंतो ण य जाणइ हाणि वड्ढि वा ॥ 513 ॥ मरणं पत्थेइ रणे देइ सुबहुगंपि थुव्वमाणो दु । ण गणइ कज्जाकज्जं लक्खणमेयं तु काउस्स ॥ 514 ॥ गोम्मटसार (जीव ) तीव्र क्रोधी हो, वैर न छोड़े, लड़ाई-झगड़ा करने का स्वभाव हो, दया-धर्म से रहित हो, दुष्ट और निर्दय हो, किसी के वश में न आता हो ये कृष्ण लेश्यावाले के लक्षण हैं। 509 | स्वच्छन्द अथवा कार्य करने में मन्द हो, बुद्धिहीन हो, वर्तमान कार्य को न जानता हो, अज्ञानी हो, स्पर्शन आदि इन्द्रियों के विषय में लम्पट हो, अभिमानी हो, कुटिल वृत्तिवाला मायाचारी हो, कर्त्तव्य कर्म में आलसी हो, दूसरों के द्वारा जिसका अभिप्राय न जाना जा सके- ये सब भी कृष्ण लेश्या के लक्षण हैं। 510 | बहुत सोता हो, दूसरों को खूब ठगता हो, धन-धान्य की तीव्र लालसा हो- ये संक्षेप में नील श्यावाले के लक्षण हैं। 5111 दूसरों पर बहुत क्रोध करता हो, दूसरों की बहुत निन्दा करता हो, दूसरों को बहुधा दोष लगाता हो, बहुत शोक करता हो, बहुत डरता हो, दूसरों को अच्छा न देख सकता हो, अन्य की निन्दा और अपनी बहुत प्रशंसा करता हो, दूसरों का विश्वास न करता हो, दूसरों को भी अपनी ही तरह अविश्वास करनेवाला मानता हो, प्रशंसा करनेवाले पर परम प्रसन्न हो, अपनी और पर की हानि - वृद्धि की परवाह न करता हो, युद्ध में मरने को तैयार हो, अपनी स्तुति करनेवाले को बहुत कुछ दे डालता हो, कार्य-अकार्य को न जाने ये सब कपोत श्यावाले के लक्षण हैं। 512-514। सं. - डॉ. आ. ने. उपाध्याय, पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री

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