Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 56
________________ जैनविद्या - 19 ___47 ___ जो जीव अरिहंत-सिद्ध की प्रतिमा, तप, शास्त्र, गुरु, धर्म और संघ के प्रतिकूल होकर इनका विरोध और निन्दा करे वह जीव दर्शन मोह कर्म बाँधता है, फलस्वरूप वह सतत भव-भ्रमण करता है । भव-भ्रमण की कहानी लम्बी है । जिसके श्रद्धान और सम्मान में इन सभी प्रतिकूलताओं के प्रति कोई किंचित् लगाव नहीं होता ऐसे जीवों के लिए दर्शन मोहनीय कर्म-बंध का निवारण संभव है। जिन जीवों की चर्या में तीव्र कषाय-क्रोध,मान, माया और लोभ तथा हास्य, रति, अरति आदि अल्प कषाय हैं और जिनकी चर्या राग-द्वेष से संतप्त है उनके चारित्र गुण का घात होता है। इसके विपरीत आचरण करने से चारित्र मोहनीय कर्म-बंध का निवारण सम्भव है। आत्मिक गुणों को घातनेवाले कर्म-बंधों में अन्तराय कर्म-बंध का स्थान अन्तिम और उल्लेखनीय है। जो जीव अपने या पर के प्राणों की हिंसा करने में लीन हो तथा जो भगवान् की उपासना और मोक्षमार्ग में विघ्न करनेवाले हों उनको वस्तुतः अन्तराय कर्म का बंध होता है। इस कर्म-बंध के उदय से मनोरथ और अभिप्रेत प्राप्ति में बाधा और व्यवधान होता है। उपर्यंकित कारणों के विपरीत आचरण करने से इस प्रकार के कर्म-बंध का निवारण कहलाता है। घातिया कर्मबंध की भाँति अघातिया कर्मबंध के कारण और निवारणपरक तथ्य पर विचार किया जा सकता है। इस क्रम में सर्वप्रथम हम यहाँ आयु-कर्म-बंध के कारण पर विचार करते हैं । जो जीव मिथ्यादृष्टि हो, अति आरम्भी हो, शीलरहित हो, तीव्र लोभी हो, रौद्र परिणामी हो और पाप करने में पटु हो; वह वस्तुतः नरकायु का बंध बाँधता है । इसके विपरीत आचरण करने से इस बंध का निवारण होता है। नरक गति के साथ ही जब जो जीव विपरीत मार्ग का उपदेशक हो, सम्यक् मार्ग का विनाशक हो, जो मायाचारी हो, अर्थात् गूढ़ हृदयी तथा रहस्यमयी हो, दुर्जन हो और माया-मिथ्यात्व तथा निदान शल्यवाला हो, ऐसा जीव तिर्यंच गति का बंध बाँधता है। इसके विपरीत आचरण करने से इसका निवारण होता है।" मनुष्य गति की अपनी महिमा है। इस गति को पाने के लिए प्राणी में अनेक गुणों को जगाने की आवश्यकता होती है। वह प्राणी जो मंदकषाय स्वभाववाला होता है, दानी होता है, शील और संयम की अपेक्षा और आकांक्षा रखता हो तथा जो मध्यम गुण-सम्पन्न हो, वह मनुष्य आयु का बंध बाँधता है। ___ मनुष्य गति पाने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं। इसका मूल कारण है कि इसी गति को प्राप्त कर प्राणी तप और संयम-साधना करने का सुयोग प्राप्त करता है ताकि वह जन्म-मरण से मुक्त्यर्थ अपने कर्म-कुल को क्षयकर मोक्ष प्राप्त कर सके। ___ इस दृष्टि से मनुष्य गति के बंध के निवारण का कोई औचित्य नहीं है, तथापि भव-भ्रमण के प्रत्याशी अज्ञानी जीव इसके विपरीत कार्य करने से मनुष्य गति-बंध से मुक्त हो सकता है।

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