Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 54
________________ जैनविद्या - 19 अप्रेल - 1997-1998 गोम्मटसार में कर्मबंध : कारण और निवारण - विद्यावारिधि डॉ. महेन्द्रसागर प्रचंडिया जड़ और चेतन का समवाय संसार है । संसरणशीलता संसार का मूल स्वभाव है। इस स्वभाव को कर्म सक्रिय रखते हैं । दर्शनावरणीय, ज्ञानावरणीय, मोहनीय, अन्तराय, आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय नामक इन वसु कर्मों में संसार के अन्य सभी कर्मकुल अन्तर्भुक्त हो जाते हैं । जीव इन्हीं कर्मों के कारण सांसारिक चक्रमण में अनादि काल से सक्रिय है। जन्म-मरण के दारुण दुःखों को भोग रहा है। कर्म-जाल में फंसकर प्राणी उससे निकलने का बार-बार प्रयास करता है पर इससे निकल पाना इतना सरल और सुगम नहीं है। इससे निकलने का एकमात्र उपाय कर्म-जाल काटना ही है। सिद्धान्तचक्रवर्ती आचार्य श्री नेमिचन्द्रकृत 'गोम्मटसार' के अनुसार 'वसुकर्म बंध के कारण और निवारण' विषयक संक्षिप्त चर्चा करना हमारा यहाँ मूलाभिप्रेत है। ___ जीव और उसकी पर्याय-शरीर का सम्बन्ध कृत नहीं प्राकृत है और इसीलिए वह कहलाता है - प्रकृति । प्रकृति को शील और स्वभाव से भी अभिहित किया जाता है। जिस प्रकार सोने में मल का अनादिकालीन सम्बन्ध है उसी प्रकार जीव और शरीर का सम्बन्ध भी अनादि है। इस सम्बन्ध का कोई कर्ता नहीं है। इसकी यह दशा स्वयंभू है।'

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