Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 51
________________ जैनविद्या - 19 जिसका अर्थ है कि सिद्धान्तरूपी उदयाचल के तट पर उदित निर्मल नेमिचन्द्र की किरण द्वारा उठी गुणरत्नभूषणरूपी अम्बुधि (सागर) की बेला (मतिरूपी लहरें) भुवनतल को पूरित करें। इस ग्रन्थ के टीकाकारों ने भी इस ग्रन्थ का कर्ता नेमिचन्द्र को माना है। इन टीकाओं से विदित होता है कि गंग राजवंश के मुकुटमणि राजसर्वज्ञ अनेक गुणनामवाले श्रीमद् राचमल्ल देव महाराज के महामात्य श्रीमत् चामुण्डराय, जिनकी रणरंगमल्ल, असहाय पराक्रम, गुणरत्नभूषण, सम्यक्त्व रत्ननिलय आदि सार्थक नामों से ख्याति थी, के द्रव्यानुयोग प्रश्नों के अनुरूप शिष्यजनों को प्रबोधित करने के लिए श्रीमत् नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने महाकर्मप्रकृतिप्राभृत से उद्धृत प्रथम सिद्धान्त-ग्रन्थ के जीवस्थान आदि छह खण्डों के प्रमेयांश का उद्धार करके गोम्मटसार अपरनाम पञ्चसंग्रह की रचना की थी। इन टीकाओं से यह स्पष्ट है कि ग्रन्थ की रचना चामुण्डराय के निमित्त हुई थी। अतः चामुण्डराय, जिनका घरेलू नाम गोम्मटराय था और जिनका उस घरेलू नाम से ही कदाचित् उनका बालसखा होने के कारण ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ में कई स्थानों पर सादर उल्लेख किया है, के निमित्त रचना करने के कारण इस ग्रन्थ का नाम ग्रन्थकार ने 'गोम्मट संग्रह', 'गोम्मट संग्रह सूत्र' और 'गोम्मट सूत्र' अर्थात् गोम्मटराय के निमित्त बनाया गया संग्रह सूत्र दिया है। इसी प्रकार टीकाकारों द्वारा दिये गये नाम 'गोम्मटसार' का आशय गोम्मटराय के निमित्त सार-रूप में रचे गये सिद्धान्त ग्रन्थ से है, यद्यपि उन्होंने चामुण्डराय के नाम और विरुदों के साथ गोम्मटराय नाम का उल्लेख नहीं किया है। टीकाकारों द्वारा इस ग्रन्थ के लिए प्रयुक्त 'पञ्चसंग्रहशास्त्र' और 'पञ्चसंग्रहप्रपञ्च' नामों की सार्थकता की विवेचना करते हुए पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री ने अपनी उक्त प्रस्तावना में सूचित किया है कि वर्तमान में 'पञ्चसंग्रह' नाम के चार ग्रन्थ हैं - दो प्राकृत में और दो संस्कृत में। प्राकृत में एक पञ्चसंग्रह दिगम्बर परम्परा का है और एक श्वेताम्बर परम्परा का। संस्कृत के दोनों पञ्चसंग्रह प्राकृत पञ्चसंग्रह के रूपान्तर हैं। दिगम्बर प्राकृत पञ्चसंग्रह वीरसेन स्वामी की धवला टीका से भी प्राचीन है। इस पञ्चसंग्रह में पाँच प्रकरण हैं - जीवसमास, प्रकृति समुत्कीर्तन, कर्मस्तव, शतक और सप्तिका। धवला में इस प्राकृत पञ्चसंग्रह की बहुत-सी गाथाएँ उद्धृत हैं। सत्प्ररूपणा की धवला टीका में उद्धृत लगभग 125 गाथाएँ जीवसमास नामक अधिकार की हैं तथा कुछ गाथाएँ पञ्चसंग्रह के अन्य अधिकारों की भी उद्धृत हैं । चूँकि इसी धवला टीका के आधार पर आचार्य नेमिचन्द्र ने गोम्मटसार का संग्रह किया था, अतः पञ्चसंग्रह से परिचित उसके टीकाकारों ने उसे पंचसंग्रह नाम देकर उचित किया है। ___डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन ने जीवकाण्ड पर अपने सम्पादकीय में अन्तक्ष्यिों और बहिर्साक्ष्यों के आधार पर इसका रचनाकाल 983-984 ई. अनुमानित किया है। इस ग्रन्थ पर रची गई प्रमुख टीकाएँ पाँच हैं - (1) चामुण्डराय द्वारा उसी काल में कन्नड में रची 'वीरमार्तण्डी टीका' जो अब अनुपलब्ध है; (2) अभयचन्द्र सूरि सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा संस्कृत में रचित 'मन्दप्रबोधिका टीका'; (3) केशववर्णी द्वारा संस्कृत मिश्रित कन्नड में रचित 'कर्णाटवृत्ति जीवतत्त्वप्रदीपिका; (4) केशववर्णी की टीका के आधार पर भट्टारक नेमिचन्द्र (1515 ई.) द्वारा चित्तौड़ में संस्कृत

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