Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 41
________________ 32 जैनविद्या - 19 लब्धिसार में उन्होंने निम्न प्रकार से प्रतिपादन किया है - वीरिंदणंदिवच्छेणप्पसुदेण भयणंदिसिस्सेण । दंसण चरित्तलद्धी सु सूयिया णेमिचंदेणं ॥ 652 ॥ 1 आचार्य नेमिचन्द्र (11वीं शताब्दी) के समय यद्यपि सिद्धान्त - ग्रन्थों की पर्याप्तरूपेण उपलब्धता थी, किन्तु वे बृहत्काय और जनसामान्य के लिए न केवल दुर्लभ अपितु दुरूह भी थे। इसके अतिरिक्त तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार वे ग्रन्थ उस युग में सुरक्षा की दृष्टि से रूपेण संरक्षित किए जाते थे । अतः सिद्धान्त-ग्रन्थों के स्वाध्याय की लोकोपयोगिता की दृष्टि सारभूत ग्रन्थों की आवश्यकता का अनुभव उस समय तीव्रता से किया जा रहा था। जनसामान्य द्वारा बृहत्काय ग्रन्थों का अध्ययन - स्वाध्याय दुष्कर प्रतीत हो रहा था। जिससे प्रेरित होकर आचार्य नेमिचन्द्र जैसे विद्वत्प्रवर ने बृहत्काय सिद्धान्त-ग्रन्थों का सार लिपिबद्ध किया । प्रमुख सिद्धान्त-ग्रन्थों में आचार्य गुणभद्र द्वारा रचित 'कषायपाहुडसुत' तथा आचार्य पुष्पदन्त व भूतबलि द्वारा रचित 'षट्खण्डागम' ईसा की द्वितीय शताब्दी तक प्रामाणिकरूप से प्रतिष्ठापित और प्रसिद्धि को प्राप्त कर चुके थे। इन्हें द्रव्यानुयोग और करणानुयोग-विषयक परम्परा में प्रमुख माना जाता है। परवर्ती आचार्यों द्वारा इन ग्रन्थों पर समय-समय पर टीकाएँ लिखी गईं जो सहस्रों श्लोकप्रमाण थीं। ग्यारहवीं शताब्दी तक वे टीकाएँ उपलब्ध रहीं, किन्तु उसके पश्चात् अनेक विलुप्त हो गईं। पाँचवीं शताब्दी के आचार्य यतिवृषभ के कुछ ग्रन्थ उपलब्ध हैं जिनमें 'तिलोयपण्णत्ति' मुख्य है। इस ग्रन्थ में तीनों लोकों की बृहद् चर्चा करते हुए गणित के आधारों को पुष्ट किया गया है। इस प्रकार गणित, न्याय, प्रमाण, नय और निक्षेप से ओत-प्रोत विशाल सामग्री आचार्य नेमिचन्द्र के समय समुपलब्ध थी । आचार्य नेमिचन्द्र द्वारा लिखित ग्रन्थों का प्रतिपाद्य विषय कर्मसिद्धान्त की विवेचना लिये गणितीय उपक्रम है। उन्होंने विभिन्न स्थलों पर गणित का आधार लेते हुए सिद्धान्तों की विवेचना की है तो अनेक स्थलों पर गणित का दिग्दर्शन भी किया है । षट्खण्डागम के प्रथम पाँच खण्ड से 'गोम्मटसार जीवकाण्ड' की रचना की होगी और अन्तिम खण्ड महाबंध से 'कर्मकाण्ड' की रचना की होगी। इन ग्रन्थों से गणितीय आधार का निर्माण करना उनकी मौलिक विशेषता है । इसी प्रकार उन्होंने तिलोयपण्णत्ती आदि ग्रन्थों से 'त्रिलोकसार' का निर्माण किया होगा तथा यतिवृषभादि आचार्यों के कषाय प्राभृत् चूर्णिसूत्र आदि ग्रन्थ के पश्चिम स्कन्ध से 'लब्धिसार' की रचना की होगी। आचार्य नेमिचन्द्र ने जीव - सिद्धान्त और कर्म - सिद्धान्त पर आधारित 'गोम्मटसार' ग्रन्थ की रचना की जो गणितीय उपक्रम एवं गणितीय संदृष्टियों से परिपूर्ण है । यह विशेषता अन्य ग्रन्थों में देखने को नहीं मिलती है। गणितीय निर्वचन सामान्यतः अंक-पद्धति पर आधारित होते हैं । वे बिना प्रतीकों के सुगम्य और सुबोध नहीं हो सकते। ऐसा प्रतीत होता है कि मौलिक एवं स्वतन्त्ररूप से नेमिचन्द्राचार्य के समय से ही चामुण्डराय आदि के द्वारा गणितीय प्रतीकों का सूत्रपात किया गया। क्योंकि नेमिचन्द्राचार्य के पूर्ववर्ती वीरसेनाचार्य की टीका में शब्दों और

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