Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 44
________________ जैनविद्या - 19 गोम्मटसार (जीवकाण्ड) में प्रतिपादित तथ्यानुसार भाव लेश्या के अनुसार ही यह जीव शुभाशुभ कर्मों का बन्ध करता है । यथा - . लिंपई अप्पीकीरई एदीए णियअपुण्णपुण्णं च। जीवोत्ति होदि लेस्सा लेस्सागुण जाणयक्खादा ॥489॥गो.जी. अर्थात् जिन भावों से यह आत्मा पुण्य-पाप का बंध करता है उन्हीं भावों को आचार्यों ने लेश्या कहा है। लेश्या के प्रभाव से जीव में कौन-कौन से शुभाशुभ भाव उत्पन्न होते हैं-इसका वर्णन विस्तार से गोम्मटसार के जीवकाण्ड में किया गया है। छहों लेश्याओंवाले जीवों की पहचान के लिए उन लेश्याओंवाले जीवों के कार्य का समुचित वर्णन गोम्मटसार के जीवकाण्ड की गाथाओं में किया गया है। कृष्ण लेश्यावाले जीव के निम्न लक्षण बतलाए गए हैं - चण्डो णं मुच्चई वेरं भंडणसीलो य धरमदयरहियो। दुट्ठो णं य एदि वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स॥ 509 ॥गो.जी. . अर्थात् कृष्ण लेश्यावाला जीव तीव्र क्रोध करता है, वैर को नहीं छोड़ता है, युद्ध (लड़ाई झगड़ा) के लिए सदैव तत्पर रहता है, धर्म-दया से रहित होता है, दुष्ट होता है और किसी के वश में नहीं आता है। नील लेश्यावाले जीव के निम्न लक्षण होते हैं - मंदो बुद्धिविहीणो णिव्विण्णाणी य विसयलोलो य। माणी माई य तहा आलस्सो चेव भेज्जो य॥510॥ णिदावंचणबहुलो धणधण्णे होदि तिव्वसण्णा य। लक्खणमेयं भणियं समासदो णीललेस्सस्स ॥ 511॥गो.जी. अर्थात् जो जीव मन्द, बुद्धि से रहित, अज्ञानी, विषयों की लोलुपतावाला (इन्द्रियों के विषयाधीन), मानी, मायावी, आलसी, अभिप्राय को छिपानेवाला, अति निद्रालु, ठग और धनधान्य की लोलुपतावाला होता है वह जीव नील लेश्यावाला बताया गया है। कपोत लेश्यावाले जीव के निम्न लक्षण बतलाए गए हैं - रुसई जिंदई अण्णे, दूसइ बहुसो य सोयभयबहुलो। असुयइ परिभवइ परं पसंसये अप्पयं बहुसो॥512॥ णं य पत्तियइ परं सो अप्पाणं यिव परं पि मण्णंतो। थूसई अभित्थुवंतो ण य जाणइ हाणि वड्ढि वा॥513 ॥ मरणं पत्थेइ रणे, देइ सुबहुंगपि थुव्वमाणो दु। ण गणइ कज्जाकजं लक्खणमेयं तु काउस्स ॥ 514॥गो.जी. अर्थात् रुष्ट होनेवाला, दूसरों की निंदा करनेवाला, दूसरों को दोषी कहनेवाला, अत्यधिक . शक्ति और भय करनेवाला, दूसरे की सम्पत्ति पर ईर्ष्या करनेवाला, दूसरे का तिरस्कार करनेवाला,

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