Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 42
________________ जैनविद्या - 19 वाक्यों तथा द्रव्यप्रमाणानुगम में अनेक स्थलों पर जो गणितीय निर्वचन आए हैं उनमें प्रतीकों की प्रतीति नहीं होती है। यही कारण है कि आचार्य वीरसेन से पूर्ववर्ती आचार्य भी टीकाएं सूत्रबद्ध ही करते रहे हैं। गणितीय प्रसंगों में प्रतीकबद्ध सामग्री नेमिचन्द्र के परवर्ती आचार्यों द्वारा की गई टीकाओं में ही मिलती है। गोम्मटसार ग्रन्थ अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। जीव तत्त्व एवं कर्म-सम्बन्धी विवेचना उसका मुख्य प्रतिपाद्य है। जीवकाण्ड में जीवन-वर्णन के अतिरिक्त जीव से सम्बद्ध अनेक प्रकरणों का भी वर्णन है। इसमें जीवों के भेद-प्रभेद बतलाते हुए उनके एक से दस तक, चौदह, उन्नीस, सत्तावन और अट्ठानवे भेद कहे हैं । इन्हें वे जीव-समास कहते हैं । टीकाकार ने गणित का उपयोग करते हुए 190, 380, 570 तथा 406 जीव समास भी गिनाए हैं । जीवकाण्ड में किए गए प्रतिपादन के अनुसार शरीर-पर्याप्ति के पूर्ण नहीं होने तक जीव निवृत्य पर्याप्ति (रचना की अपूर्णता) एवं योग्य पर्याप्तियों के पूर्ण नहीं होने से अन्तमुहूर्त में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले जीव को लब्धि-अपर्याप्त कहा गया है । जीवकाण्ड में प्राणसम्बन्धी विवरण के साथ-साथ पर्याप्तियों का विवेचन भी किया गया है। अन्य ग्रन्थों में जहाँ चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है, वहाँ जीवकाण्ड में तीन प्रकार की आकृतियों के साथ नौ गुण-योनियों और तीन जन्म-प्रकारों का भी विशद वर्णन किया गया है। इसी प्रकार आयु और अवगाहना सम्बन्धी विवरण के साथसाथ कुल कोटियों एवं संज्ञाओं का वर्णन भी मिलता है। जीवकाण्ड में लगभग 500 गाथाओं में चौदह मार्गणाद्वारों के माध्यम से जीवों का विशद निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रीति-विहीनता, तिर्यक्ता, मन-कर्म-कुशलता, ऋद्धि-सुख-दिव्यता एवं जन्म-मरण रहितता के आधार पर पांच गतियों में जीवों के प्रमाण का विवरण है। मनुष्य जीवों के विषय में बतलाया गया है कि उनमें तीन चौथाई मानुषियाँ होती हैं। मानुषियों से तीन-सात गुने सर्वार्थसिद्धि के देव होते हैं । पर्याप्ति मनुष्यों की संख्या 3x1028 बतलाई गई है। इस प्रकार जीव से सम्बद्ध अनेक प्रकरणों का वर्णन जीवकाण्ड में किया गया है। इसकी एक विशेषता यह है कि प्रायः प्रत्येक विवरण में संख्यात्मकता या गणितीय संदृष्टियाँ पाई जाती हैं । इससे यह सुस्पष्ट है कि जीवकाण्ड का सम्पूर्ण प्रतिपाद्य विज्ञजनों के बोधार्थ है, सामान्यजनों के नहीं। - इसके अतिरिक्त मनुष्य के स्वोपार्जित कर्मों के कारण उसकी आत्मा को विभिन्न प्रकार के सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश-अपयश आदि भोगना पड़ता है। आत्मा को विभिन्न योनियोंगतियों में जन्म लेना पड़ता है और उसका शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है। इसके मूल में जो भाव है वह है - लेश्या। लेश्या-सम्बन्धी विस्तृत वर्णन गोम्मटसार के जीवकाण्ड में किया गया है जो जैनधर्म के मौलिक चिन्तन की ओर संकेत करता है । जीवकाण्ड में लेश्या सम्बन्धी विवेचन उसकी मौलिक विशेषता है। लेश्या क्या होती है या लेश्या किसे कहते हैं - इसका समाधान करते हुए आचार्य प्रवर कहते हैं कि कषायों के उदय से रंजित योग-प्रवृत्ति का नाम लेश्या है । लेश्याएँ जीव के औदयिक भाव हैं क्योंकि लेश्याएँ योग और कषायों के उदय से होती हैं। गोम्मटसार के जीवकाण्ड में लेश्या का लक्षण निम्न प्रकार से प्रतिपादित किया गया है -

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