Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 14
________________ जैनविद्या - 19 पाकर बँधा हुआ असातावेदनीय कर्म साता वेदनीयरूप परिणत हो जाता है। किस-किस कर्मप्रकृति में कौन-कौन भागहार सम्भव है और किस-किस भागहार के अन्तर्गत कौन-कौन प्रकृतियाँ हैं यह सब भी कथन किया गया है। साथ ही चूँकि पाँचों भागहार एक भाजक राशि के तुल्य हैं अतः उनका परस्पर में अल्पबहुत्व भी बतलाया गया है। 'दशकरण चूलिका' में बन्ध, उत्कर्षण, अपकर्षण, संक्रमण, उदीरणा, सत्ता, उदय, उपसम, निधत्ति और निकाचना इन दस करणों का स्वरूप कहा गया है और बतलाया गया है - कौन करण किस गुणस्थान तक होता है। करण नाम क्रिया का है - कर्मों में ये दस क्रियाएँ होती हैं । कर्मप्रकृति में इन करणों का स्वरूप बहुत विस्तार से वर्णित है। 'बन्धोदय सत्वयुक्त स्थान समुत्कीर्तन' में आठों मूलकर्मों को लेकर और फिर प्रत्येक कर्म की उत्तर प्रकृतियों को लेकर बन्धस्थानों, उदयस्थानों और सत्वस्थानों का कथन किया गया है। 'प्रत्ययाधिकार' में कर्मबन्ध के कारणों का कथन है । मूलकारण चार हैं - मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग। इनके भेद क्रम से पाँच, बारह, पच्चीस और पन्द्रह-कुल सत्तावन होते हैं। गुणस्थानों में इन्हीं मूल और उत्तर प्रत्ययों का कथन इस अधिकार में किया गया है कि किस गुणस्थान में बन्ध के कितने प्रत्यय होते हैं और उनके भङ्गों का भी निर्देश किया है। 'भावचूलिका' में औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक और पारिणामिक इन पाँच भावों का तथा इनके भेदों का कथन करके उनके स्वसंयोगी भंगों का कथन गुणस्थानों में किया गया है। 'त्रिकरणचूलिका' में अध:करण और अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन तीन करणों का स्वरूप कहा गया है। इस अधिकार की विशेषता यह है कि इसमें पहले दोनों करणों के स्वरूप को अंक संदृष्टि के द्वारा समझाया गया है। कर्मस्थितिरचनाअधिकार' में प्रतिसमय बँधनेवाले कर्मपरमाणुओं का आठों कर्मों में विभाजन होने के पश्चात् प्रत्येक कर्मप्रकृति को प्राप्त कर्मनिषकों की रचना उसकी स्थिति के अनुसार आबाधाकाल को छोड़कर हो जाती है अर्थात् बन्ध को प्राप्त हुए वे कर्मपरमाणु उदयकाल आने पर खिरने प्रारम्भ हो जाते हैं और अन्तिम स्थिति पर्यन्त खिरते रहते हैं। उनकी रचना को ही कर्मस्थिति कहते हैं उसी का कथन इस अधिकार में है। त्रिलोकसार एक हजार अठारह गाथाओंवाला 'त्रिलोकसार' करणानुयोग का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का आधार 'तिलोयपण्णती' और 'तत्त्वार्थवार्तिक' है। यह ग्रन्थ लोक-सामान्याधिकार, भवनाधिकार, व्यन्तरलोकाधिकार, ज्योर्तिलोकाधिकार, वैमानिकलोकाधिकार, मनुष्यतिर्यकलोकाधिकार नामक छह अधिकारों में विभक्त है। इस ग्रन्थ में जम्बूद्वीप, लवणसमुद्र, मानुषक्षेत्र, भवनवासियों के रहने के स्थान, आवास, भवन, आयु, परिवार आदि का विस्तृत वर्णन किया है । ग्रह, नक्षत्र, प्रकीर्णक, तारा, सूर्य एवं चन्द्र के आयु, विमान, गति, परिवार आदि का भी सांगोपांग वर्णन पाया जाता है । स्वर्गों के सुख, विमान एवं वहाँ के निवासियों की शक्ति आदि का भी कथन आया है। त्रिलोक की रचना के सम्बन्ध में सभी प्रकार की जानकारी इस ग्रन्थ से प्राप्त की जा सकती है। लब्धिसार यह आचार्य नेमिचन्द्र की गाथाबद्ध तीसरी रचना है। इसके दो संस्करण - एक रायचन्द्र शास्त्रमाला बम्बई से और दूसरा हरिभाई देवकरण ग्रन्थमाला से प्रकाशित हैं । इस ग्रन्थ में छह

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