Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 37
________________ 28 जैनविद्या - 19 लिंपइ अप्पीकीरई लिंपइ अप्पीकीरई एदीए णिय अप्पुण्णपुण्णं च। जीवोत्ति होदि लेस्सा लेस्सागुणजाणयक्खादा॥489॥ जोगपउत्ती लेस्सा कसायउदयाणुरंजिया होइ। तत्तो दोण्णं कजं बंधचउक्कं समुद्दिटुं॥490॥ किण्हा णीला काऊ तेऊ पम्मा य सुक्कलेस्सा य। लेस्साणं णिदेसा छच्चेव हवंति णियमेण ॥493॥ वण्णोदयेण जणिदो सरीरवण्णो दु दव्वदो लेस्सा। सा सोढा किण्हादी अणेयभेया सभेयेण॥494॥ छप्पयणीलकवोदसुहेमंबुजसंखसंणिहा वण्णे। संखेज्जाऽसंखेज्जाऽणंतवियप्पा य पत्तेयं ॥495॥ ___ गोम्मटसार (जीव.) - जिसके द्वारा जीव आत्मा को कर्मों से लिप्त करता है वह लेश्या है। कषाय के उदय से अनुरंजित मन-वचन-काय की प्रवृत्ति लेश्या है। 'लिम्पति' अर्थात् इसके द्वारा जीव अपने पुण्य-पाप को अपनाता है। द्रव्य और भाव के आधार से लेश्या दो प्रकार की है - 1. द्रव्य लेश्या और 2. भाव लेश्या। लेश्या के मुख्यतः छः भेद हैं - 1. कृष्ण, 2. नील, 3. कापोत, 4. तेज, 5. पद्म और 6. शुक्ल। - वर्ण नामकर्म के उदय से उत्पन्न शरीर का वर्ण द्रव्यलेश्या है। द्रव्य लेश्या के भी कृष्ण नील आदि छः भेद हैं और अवान्तर भेदों से अनेक भेदवाले हैं। वर्णरूप में कृष्ण-नील आदि लेश्या क्रमशः भौंरे, नीलम, कबूतर, स्वर्ण, कमल और शंख के समान होती है। अर्थात् जिनके शरीर का वर्ण भौंरे के समान काला है उनके 'कृष्ण' द्रव्यलेश्या है। नीलम के समान वर्णवालों की द्रव्यलेश्या 'नील' है। कबूतर के समान वर्णवालों की द्रव्यलेश्या 'कापोत' है । स्वर्ण के समान पीतवर्णवालों की द्रव्यलेश्या 'पीत' है। कमल के समान वर्णवालों की द्रव्यलेश्या 'पद्म' होती है और जिनका शरीर का रंग शंख के समान सफ़ेद होता है उनकी द्रव्यलेश्या 'शुक्ल' है। सं.-डॉ. आ. ने. उपाध्याय, पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री

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