Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 21
________________ जैनविद्या - 19 स्पंदित होते हैं, जो कर्म-वर्गणा के ग्रहण में निमित्त होती है । यह परिणामों के अनुसार शुभ और अशुभ रूप होती है। आत्म- प्रदेशों की चंचल रूप प्रवृत्ति से कर्मों का आगमन एवं एक क्षेत्रावगाह रूप सम्बन्ध होता है, वह स्पंदन योग कहलाता है। गाथा 216 से 270 तक मन योग, वचन योग और काय योग स्वरूप भेद-प्रभेद, योग का काल, प्रवृत्ति, स्थिति एवं योगरहित आत्मा का वर्णन है। 12 (5) वेद मार्गणा - ' वेदनं वेद:' जो वेदा जाये, अनुभव किया जाये, उसे वेद कहते हैं । इसका दूसरा अर्थ है लिंग या चिह्न । वेद नाम के मोहनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होनेवाले जीव के वेद्यभाव होते हैं जिससे वे काम-विकार को प्राप्त होते | वेद तीन प्रकार का है - पुरुष वेद, स्त्री वेद और नपुंसक वेद । गाथा 271 से 281 तक भाव एवं द्रव्य वेद का विधान, लक्षण, तीनों वेदों के जीवों की संख्या, अवेदी जीव का वर्णन आदि किया है। वेदभाव 9 वें गुणस्थान के दूसरे भाग तक होता है । सिद्ध भगवान वेदरहित, अवेदी हैं। वे आत्मा के अतीन्द्रिय, अनंत ज्ञान दर्शन, सुख आदि के भोक्ता हैं । (6) कषाय मार्गणा - आत्मा के राग-द्वेषरूप कलुषितभाव को कषाय कहते हैं । सुखदुःखरूपी नाना प्रकार के धान्य को उत्पन्न करनेवाले क्षेत्र को जो कर्षण करती है, अर्थात् फल उत्पन्न करने योग्य करती है, उन्हें कषाय कहते हैं । लक्षण की अपेक्षा अर्थ में 'कपंतीति कषायाः' अर्थात् जो कसे, हंते या घात करे वह कषाय है। मूल कषाय चार हैं - क्रोध, मान, माया और लोभ । इनमें क्रोध और मान द्वेषरूप हैं तथा माया और लोभ रागरूप हैं । आसक्ति अर्थात् अनुभाग की तीव्रता - मंदता की दृष्टि से ये कषायें चार प्रकार की हैं - अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन कषाय । इस प्रकार चारों कषायें इन चारचार भेदों से सोलह प्रकार की हैं। ये कषायें चारित्र मोह - परिवार की है, जिनका उदय-स्थान असंख्यात लोकप्रमाण होने से कषाय-भाव भी असंख्यात लोकप्रमाण होते हैं । लेश्यास्थान की दृष्टि से 14 और आयु, बल, बंध, अबंध की दृष्टि से 20 कषायें हैं । अनंतानुबंधी क्रोधादि तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप सम्यक्त्व (स्वरूपाचरण चारित्र) को घातते हैं, और अनंत संसार का कारण मिथ्यात्व तथा अनंत संसार अवस्थारूप काल से अनुबंध कराते हैं । अप्रत्याख्यानावरण कषाय अणुव्रतरूप देश- चारित्र को घातती है / आवृत्त करती है। प्रत्याख्यानावरण कषाय महाव्रत रूप सकल- चारित्र को घातती है / आवृत्त करती है, तथा संज्वलन कषाय, सकल कषाय के अभावरूप यथाख्यात चारित्र को घातती है/दहन करती है। गाथा 282 से 298 तक कषाय का स्वरूप, भेद-प्रभेद, चार गतियों की प्राप्ति में भिन्न-भिन्न कषायों का योगदान एवं जीवों की संख्या, काल का वर्णन आदि किया गया है। कषाय मार्गणा में एकेन्द्रिय, मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अपूर्वकरण गुणस्थान तक क्रोधादि चारों कषायें पाई जाती हैं। क्रोध, मान और माया क्रम से घटती हुई अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में दूसरे-तीसरे और चौथे भागपर्यंत हैं और लोभ सूक्ष्म सांपराय- पर्यंत है । इस प्रकार क्रोध, मान, माया नौवें गुणस्थान तक तथा लोभ दसवें गुणस्थान तक होता है । सिद्ध भगवान सर्व कषायरहित-अकषायी होते हैं।

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