Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 23
________________ 14 जैनविद्या - 19 आगम में प्रसिद्ध हैं। गाथा 465 से 481 तक संयम के भेद-प्रभेद, उत्पत्ति का कारण ग्यारह प्रतिमा, इंद्रियों के विषय तथा संयत-असंयत जीवों की संख्या आदि का वर्णन किया गया है। असंयम-भाव, चारित्र मोहनीय कर्म के उदय-उदीरणा से होते हैं, जिससे जीव की प्रवृत्ति स्वच्छंद होकर संसार-दुःख का कारण बनती है। समितियों के साथ व्रतों का पालन संयम कहलाता है। समितियों के बिना व्रत, विरति कहलाता है। असंयम-पहले मिथ्यात्व गुणस्थान से चौथे अविरत सम्यक्त्व गुणस्थान तक होता है। संयमासंयम पाँचवें गुणस्थान में होता है। सामायिक एवं छेदोपस्थापनासंयम प्रमत्तसंयम से अनिवृत्तिकरण गुणस्थानों में होता है। परिहार-विशुद्धि संयम प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानों में होता है। सूक्ष्म सांपरायसंयम सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान में ही होता है तथा यथाख्यातसंयम उपशांत मोहादिक चारों गुणस्थानों में होता है । सिद्ध भगवान को इंद्रिय संयम और प्राणी संयम नहीं होता, वे स्वरूपलीनतारूप निश्चय संयम के धारक होते हैं। (9) दर्शन मार्गणा - पदार्थ के सामान्य सत्तावलोकन का नाम दर्शन है । इसमें जाति, क्रिया, गुण आदि विशेष को ग्रहण नहीं करते। पश्यति दृश्यतेऽनेन दृष्टिमात्र वा दर्शनम्' जो देखता है, जिसके द्वारा देखा जाये अथवा देखनामात्र ही दर्शन है। इसके चार भेद हैं - चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन। गाथा 482 से 488 तक दर्शन के स्वरूप, भेद, जीवों की संख्या आदि का वर्णन किया गया। चक्षुदर्शन - चार इंद्रिय जीव से लेकर बारहवें गुणस्थान तक होता है। अचक्षुदर्शन स्थावर काय मिथ्यादृष्टि जीव से लेकर बारहवें गुणस्थान तक होता है। अवधिदर्शन चतुर्थ गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक होता है। केवलदर्शन अयोग-सयोग केवली गुणस्थानों में एवं गुणस्थानातीत सिद्धदशा तक होता है। (10) लेश्या मार्गणा - 'लिपति एतयाइति लेश्या' जो लिंपन/लिप्त करती है वह लेश्या है, अर्थात् जो जीव को कर्मों से लिप्त करती है उसे लेश्या कहते हैं । कषाय के उदय से अनुरंजित जीव की मन-वचन-कायरूप योग की प्रवृत्ति का नाम लेश्या है। लेश्या दो प्रकार की है - भाव लेश्या और द्रव्य लेश्या। जिससे चार प्रकार के कर्मों का बंध होता है, उसे भाव लेश्या कहते हैं । शरीर का कृष्णादि वर्ण द्रव्य लेश्या है। लेश्या छः प्रकार की है - कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल । इनमें कृष्ण, नील और कापोत अशुभ लेश्या है और पीत, पद्म और शुक्ल शुभ लेश्या कहलाती है। कषाय व योग के उदय से उत्पन्न होने से लेश्या औदयिक भाव है। योग व कषाय की प्रवृत्ति तीव्र, मंद एवं मंदतर होती है। जिसके अनुसार जीव की पुण्यपाप-रूप प्रवृत्ति होती है। लेश्या कषायों की तीव्रता-मंदता की सूचक है। गाथा 489 से 556 तक लेश्या का स्वरूप भेद-प्रभेद, स्वामित्व आदि का विस्तृत वर्णन (1) निर्देश, (2)वर्ण, (3) परिणाम, (4) संक्रम, (5) कर्म, (6) लक्षण, (7) गति, (8) स्वामी, (9) साधन, (10) संख्या, (11) क्षेत्र, (12) स्पर्शन, (13) काल, (14) अंतर, (15) भाव और (16) अल्प-बहुत्व - इन सोलह अधिकारों में किया गया है, जो मूलतः पठनीय है।

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