Book Title: Jain Vidya 19
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 29
________________ 20 जैनविद्या - 19 व्यवस्था का फलित अर्थ यह होता है कि कर्म-बंध के बाद एवं उदय के पूर्व, आबाधा-काल की अवधि में जीव चाहे तो अपने सम्यक पुरुषार्थ से उस कर्म-बंध को समाप्त कर सकता है। यह आत्मस्वरूप के प्रति निरंतर जागरूकता का महत्व दर्शाता है। आगे कर्मों की निषेक रचना अर्थात् खिरने की पद्धति का वर्णन है। अनुभाग-बंध - कर्मों के हीनाधिक फल देने की शक्ति को अनुभाग कहते हैं । इनका वर्णन गाथा 163 से 184 तक किया है। अनुभाग बंध का सूत्र है - विशुद्ध परिणामों से शुद्ध प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बंध और अशुभ प्रकृतियों का जघन्य अनुभाग बंध होता है। तथा संक्लेश परिणामों से शुभ प्रकृतियों का जघन्य और अशुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग-बंध होता है। अन्य प्रकृतियों में भी इसी प्रकार होता है। पुण्यरूप 42 प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग-बंध विशुद्धतावाले जीव को होता है तथा पापरूप 82 प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग-बंध संक्लेश परिणामवाले मिथ्यादृष्टि जीव को होता है। उससे तत्व-अभ्यासरूप विशुद्ध परिणामों की उपादेयता सिद्ध होती है । घातिया कर्मों की फल देने की शक्ति लता, काठ, हड्डी और पत्थर जैसी क्रमागत कठोरपने की है, जिसके उदय से आत्मगुण प्रगट नहीं होते। अघातिया कर्मों की शुभ प्रकृतियाँ गुड़, खांड, मिश्री और अमृत जैसी तथा अशुभ प्रकृतियां नींब, कांणीर, विष और हलाहल जैसी संसार को सुख-दुख देती है। प्रदेश-बंध - मिथ्यात्वादि के निमित्त से कर्मरूप पुद्गलों का आत्म-प्रदेशों के साथ सम्बन्ध को प्रदेश-बंध कहते हैं । यहाँ प्रदेश का अर्थ संख्या से है। गाथा 185 से 218 तक मूल प्रकृतियों और उत्तर प्रकृतियों का प्रदेश-बंध एवं गाथा 219 से 261 तक प्रदेश-बंध के कारणभूत योग के भेद-प्रभेद आदि का विस्तृत वर्णन किया है। एक समय में ग्रहण किये कर्म परमाणुओं का विभाजन आठों कर्मो में होता है । इसमें आयु कर्म का थोड़ा हिस्सा होता है। शेष कर्मों में, कर्म परमाणुओं के बँटवारे के निश्चित अनुपात का विधान है। कर्म-उदय - कर्म-बंध हुए कर्मों का उदय में आना लगा हुआ है, जो आबाधा काल के बाद कर्म-स्थिति पर्यंत होता रहता है। किस गुणस्थान और मार्गणास्थान में कौन-कौन से कर्म उदय में आयेंगे, कितने कर्मों का कहाँ उदय, कहाँ व्युच्छिति होगी, कितनों का अनुदय होगा इसका तथा उदीरणा, उदीरणा-व्युच्छिति तथा अनुदीरणा का वर्णन गाथा 261 से 332 तक किया है। आहारक शरीर व आहारक अंगोपांग का उदय प्रमत्त गुणस्थान में होता है। तीर्थंकर प्रकृति का उदय सयोगी-अयोगी केवली को ही होता है। मिश्र मोहनीय का उदय तीसरे गुणस्थान में होता है। सम्यक्त्व मोहनीय का उदय अव्रत सम्यग्दृष्टि आदि चौथे गुणस्थानवर्ती वेदक सम्यग्दृष्टि को ही होता है। सयोग केवली एवं अयोग केवली को क्रमशः 42 और 12 कर्मों का उदय होता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म-उदय से कर्म-बंध नहीं होता। एकत्व-ममत्व न होने के कारण दुःख भी नहीं होता। प्रथम गुणस्थान में मिथ्यात्व, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण इन पाँच की उदय-व्युच्छिति होती है। दूसरे गुणस्थान में 9, तीसरे में 1 और चौथे में

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