Book Title: Jain Vidya 19 Author(s): Kamalchand Sogani & Others Publisher: Jain Vidya Samsthan View full book textPage 6
________________ प्रकाशकीय दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजी द्वारा संचालित जैनविद्या संस्थान की शोध पत्रिका 'जैनविद्या' का यह उन्नीसवाँ अंक 'नेमिचन्द्र विशेषांक' के रूप में प्रस्तुत है। नन्दिसंघ देशीयगण के आचार्य नेमिचन्द्र विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के प्रतिभासम्पन्न, अध्यात्मवेत्ता, कर्म सिद्धान्त के पारगामी आचार्य थे। आचार्य नेमिचन्द्र ने वृहत्काय सिद्धान्तग्रन्थों का, जिनका अध्ययन-स्वाध्याय सामान्यजन के लिए दुष्कर प्रतीत होने लगा था, सार लिपिबद्ध किया। इन्होंने गोम्मटसार (जीवकाण्ड व कर्मकाण्ड), लब्धिसार, क्षपणासार व त्रिलोकसार ग्रन्थों की रचना की। इनके सारे ग्रन्थ इतने मौलिक और तात्विक हैं कि वे स्वतंत्र ग्रन्थों के रूप में समादृत हैं। इनके सैद्धान्तिक योगदान के लिए ही इन्हें 'सिद्धान्तचक्रवर्ती' की उपाधि से विभूषित किया गया। जिन विद्वानों ने अपनी रचनाएँ भेजकर इस अंक को कलेवर प्रदान किया, हम उनके आभारी हैं। इस अंक के सम्पादक, सहयोगी सम्पादक एवं सम्पादक मण्डल धन्यवादार्ह हैं। प्रकाशचन्द्र जैन मंत्री नरेशकुमार सेठी अध्यक्ष प्रबन्धकारिणी कमेटी, दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजीPage Navigation
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