Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 14
________________ [३] ज्ञाम स्वरोदय । भेद स्वरोदय सो लहै, समुझे साँस उसाँस । भली बुरी तामें लखै, पवन सुरत परकास ॥७॥ धर्मदास वचन । सतगुरु हम पर दया करि, दियो स्वरोदय ज्ञान । जबसे येही जानि परि, लाभ होय की हानि ॥८॥ सत्कबीर वचन । कहैं कबीर सुन धर्मनि, चितवत हो जग ईस । येहि वचन ब्रह्मज्ञान को, मानो बिस्बावीस ।।९।। धर्मदास वचन । धर्मदास विनवै करजोरी, साहिब सुनिये विनती मोरी। दम उनमान कहो समुझाई, कहाँसे उपजै कहाँ समाई ॥ __सत्कबीर वचन। निस वासरका यहि विस्तारा, छसौ आगे इकबीस हजारा । जो यह भेद रहे लौलाई, सतगुरु मिले तो देहि बताई ।। पांच तत्व आवै अरु जाई, घटका भेद कहो समुझाई । तत्व तत्व का भेद है न्यारा, चंद सुरज ताके संग धारा ॥ सात मुनी सातों विस्तारा, सातों भेद है न्यारा न्यारा ॥ पांच तत्व का भेद गहीजै, देह उनमान साधना कीजै ।। साधे लहर समुद्र सनेहा, सब सुख पावै या जम देहा ।। महिनत कर रहे लौलीना, तत्व सनेही होय न छीना। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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