Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 63
________________ बड़ा संतोष बोध। [५२ ] सुर मिलावे चंद को, चंद मिलावे सूर । यह निज भेद विचारसों, ताहै मिले गुरु पूर ॥ जाहै पवन पर चंदा बसें, तेहि नहि ग्रासे काल । नो यह भेद विचारही, सोई जौहरी लाल ॥ पानीमें पावक बसें, अति धन बर्षे मेघ । तीनों अधर अकास हैं, कौन पवन को थेघ । महिमा है वह नाम की, ऐन कहं आपस कीन्ह । जो यह भेद बताई हैं, सीस अरप तेहि दीन्ह ॥ धर्मदास वचन । साहेब कहौ भेद टकसारा, जेहिते जीवन होय उबारा । नवों तत्व के भेद बतावौ, सकल कामना मोर मिटायौ । पांच तत्व खेल मैदाना, चार तत्व वे रहे ठिकाना । छै तत्वनको भोजन केता, जाके चीन्हे आगम चेता। सतगुरु वचन। छठवें तत्व . निरंजन नाऊं, नयनन बीच बसायेऊ गांऊं । नाभी कवल शब्द उठ नाला, नयनन बीच निरंजन काला । ताहि कँवलको नाम बताई, चार बरण होय रूप दिखाई। लखे शब्द सो जानें भेदा, राता पियरा श्याम सुपेदा । कँवल एक बानी है चारी, बैठ निरंजन आसन मारी। सावी-ताहे कँवल को छोडके, कीजो शब्द विचार । पांचों तत्त्व सम्हारहूं, उतरो भवजल पार ।। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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