Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay
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दुर्लभ योग।
[५ ] आशा तृष्णा छांड तजै सब झूठ ब्यौहारा । रहै निरंतर लाग सो योगी ततसारा ।। काया बस करे मोह तजे अरु ममछा पीवे । ऐसा अवधू जान मरे नहीं युग युग जीवे ॥ लालच लोभ निवार आतमा अस्थिर लावो । बाजे अनहद तूर नूर का दरशन पावो । कूआ बावडी बाण ना कर बाड़ी बागा। आसन मढी मसान तजे सब बाद विवादा ।। जंत्र मंत्र टाना टुमन जड़ी बूटी नहिं जाने । अविगति नाम अराध और मिथ्या करि जाने ।। परहरु पांच पचीस दोये तजि इक पहिचाने । सतगुरु के परताप ऐसी गति बिरला जाने ।। जाने वाळू सुख नहि दुःख मगन व्है गगन समावे । रहे निरंतर लाग ताते अनभे पद पावे ।। यह निज ज्ञान विचार रहे उनमुनि लौ लाई । कहै कबीर विचार तहाँ कछु अंतर नाहीं ।।
साप मरै बंबी उठे, बिन कर डमरू बाजे । कहैं कबीर जो विष जीते, प्रान पडे (तो) सतगुरु लाजे ॥ गुन गाये गुन ना हटे, कटे (न) नाम बिन रोग। सत्तनाम जाने बिना, (क्यौं) पावै दुर्लभ योग । साधु सँगत गुरु ज्ञान धन, धीरज धर्म संतोष । सत्तनाम सुमिरन भजन, येही भक्तिको मोक्ष ।
॥ इति दुर्लभ योग संपूर्ण ।
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