Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 74
________________ [ ६३ ] बड़ा संतोष बोध। चौपाई। सतगुरु मिले तो भेद बतावे, नातौं योनी संकट आवै । साखी-अंकुर नाम वह शब्द है, कीन्हा सकल पसार । कहैं कबीर धर्मदास सौं, सुनौ बचन टकसार ।। चौपाई। राई भर है वस्तु हमारी, अर्ध राई अस्थूल सुधारी । लहर लहर वह भीतर होई, पुरुष मूल निज जानहु सोई । उन कहां सौंप दीन्ह सिर भारा, वै जीवनका करें उबारा । भाखौं शब्द पृथ्वी भहराई, फूट अकाश शब्द होय जाई । विष भाखत जो छूट शरीर, आवै लोक अस कहैं कबीर । तत्व प्रवान अधर है धामा, तत्व अंस औ अज्र अनामा । तौंन नाम लै हंस उडाई, छटत पिंड काल नहि पाई। माग्वी-पवन भेद मैं भाखेऊ, कह्यौ भेद टकसार । पचासी पवन हैं बाहेरे, इनमों काल पसार ।। पचासी पवन के बाहेरै, अच शब्द निजसार । धर्मदास प्रतीत के, सुमरहु नाम हमार ।। चौपाई। सुमर नाम औ हंस उबारो, नाम पान औ सुर्त सम्हारौ । साखी-दीजो अपने बंसको, शब्द करै सम्हार । गुप्त नाम गहि राखही, हंस उतारै पार ।। चौपाई। कहौं अधर तुम सुनौ ठिकाना, जाहे अधर मों जीव समाना । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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