Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 23
________________ ज्ञान स्वरोदय। [१२] होय कलेश पीडा कछु, जो कहे कोई जाय । सुपमन चलत न चालिये, कहैं कबीर समुझाय ॥६२॥ योग करो सुषमन चलै, की आतम को ध्यान । और काज जो कोइ करै, तो आवै कछु हान ॥६३॥ उत्तर पूरब मत चले, बांये स्वर परकास । हानि होय बहुरै नहीं, नहि आवन की आस ॥६४॥ दहिने चलत न चालिये, दक्षिण पश्चिम जान । जो जावै बहुरै नहीं, होय तहँ कछु हान ॥६५॥ दहिने स्वर में चालिये, उत्तर पूरव राज । सुख संपति आनंद करे, सबै होय शुभ काज ॥६६॥ बांयें स्वर के चलत ही, दक्षिण पश्चिम देश । फल आनंद मंगल करै, जो जावै परदेश ॥६७।। दहिने सूरज बहि चले, दहिनो पग जु होय । बांये स्वर में चालिये, वामा पग धर जोय ॥६८॥ वामा पग पहिले धरे, होय चंद के चार । बांयें सुर में तीन डग, दहिना पहिले धार ॥६९॥ दहिने स्वर में चलत ही, दहिने डग भर तीन । बांचे स्वर में चार डग, बांयें कर परवीन ||७०॥ दहिने सेती आय कर, बांयें पूछ कोय । जो बांया स्वर बंध है, सुफल काज नहि होय ॥७१॥ बांयें स्वर ते आय के, दहिने पूछ कोय । भानु बंध चंदा चलै, तबही काज नसाय ।।७२॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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