Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 27
________________ ज्ञान स्वरोदय । [ १६ चंद्र सुरज दोउ सम करै, दृढ कर ध्यान लगाय । षट चक्रन को वेधि करि, शून्य शिखर को जाय ॥१०६।। डंगला पिंगला साधिके. सपमन में करै वास । परम ज्योति नहां झिलमिलै, पूजै मन विश्वास ॥१०७॥ जिन साधन आगे किया, तासों सब कुछ होय । जब चाहै जावै तहां, काल बचाव सोय ॥१०८॥ तरुन अवस्था योग करे, बैठ रहै मन जीत । काल बचाव साधको, अन्त समय जम जीत ।।१०९।। सदा आपमें लीन रहि, करि करि योगाभ्यास । आवत देख काल जब, गगन मंडल करै बास ॥११०॥ समय समय साधन कर, राखे प्राण चढाय । पूरा योगी जानिये, ताको काल न खाय ॥१११।। पहिले साधन ना कियो, गगन मंडल • जान । आवत देखै काल जब, कहा करै अज्ञान ॥११२।। योग ध्यान कीया नहि, तरुन अवस्था मीत । आवत देखें काल जब, कैसे के वे जीत ॥११३॥ काल जीत हंसा मिले, शून्य मंडल अस्थान । आगे जिन साधन किया, तरुन अवस्था जान ॥११४॥ कालअवधि बीत जब, भीत हि भीत समाय । योगी प्राण उतारही, लेहि समाधि लगाय ॥११५॥ काल जीति जगमें रहै, मृत्युक व्यापै नाँहि । दसों द्वार को फेरिके, जब चाहै तब जांहि ॥११६॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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