Book Title: Gyan Swaroday
Author(s): Kabir Sadguru
Publisher: Kabir Dharmvardhak Karyalay

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Page 48
________________ [ ३७ ] पवन स्वरोदय । जो चंदा सुर चलत हो, तो निज गहु तलवार । आवन दीजे शत्रुको, हो जगमें यश सार ॥९४॥ दूर युद्ध को चंद्र सुर, दिशा पक्ष तिथि वार । मोतिदास जल तत्त्व ले, डेरो डग धर वार ॥१५॥ खेत मांझ जब जाइये, सूरज सुर ले बीर । जीत होय हारे नहीं, रहे फौज में मीर ॥१६॥ चलते सुर दिशि आयके, पूले चलती श्वास । पूछनवारो जीति है, होय शत्रु का नाश ॥९७॥ बंद सूर दिशि आयके, बंदइ सुर पूछंत । पूछनवारो हारि है, घरे बैठ निहचिंत ॥९८॥ ऊंचे नीचे सामने, बाँये पूछे कोय । चार चंद्र घर जानिये, पूरे अक्षर होय ॥९९॥ पीछे नीचे दाहिने, तीन सुरज घर जान । ऊने अक्षर वचनके, कारज सिद्ध बखान ॥१००॥ शून्य दिशा हो पूंछही, पृथ्वी तत्व जो होय । घाव लगो कहुँ ओद्रमें, युद्ध प्रश्न करे कोय ॥१०१॥ पूंछत में जल तत्त्व होय, लगो पांव में घाव । अग्नि घाव हृदये कहो, मोतिदास सतभाव ॥१०२॥ घाव हाथ में भाषिये, वायु तत्व को देख । सिरमें घाव जु जानिये, तत्व अकाश को पेख ॥१०३।। शत्रु फौज नहि घेरिये, दहिने पूंछे कोय । सूर्य सुर कहो जीत है, जाय लडो रन सोय ॥१०४॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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